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मुशायरा ! देश के मुख्तलिफ शहरों से सुखनवर आये सारे के सारे युवा थे

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● चंद्रशेखर शर्मा

टीम ‘मुख्तलिफ’ ने कल रात अभिनव कला समाज में मुशायरा सजाया था। खास बात यह कि देश के मुख्तलिफ शहरों से सुखनवर आये थे और सारे के सारे युवा थे ! उनमें दो जनानी भी शुमार थीं। 

निजामत यानी सूत्र इंदौर के मशहूर शायर राहत इंदौरी के शायर सुपुत्र सतलज राहत के पास थे, जिन्हें अपन ने अरसे बाद देखा और वो गर्मजोशी से मिले। उनके पहले माइक इंदौर के जांबाज सूत्रधार विनीत शुक्ल के हाथ में था और शायरों का बहुत अपनत्व और एहतराम से परिचय देने के अलावा उन सभी का और अतिथियों का स्वागत व दीप जलाने की औपचारिकता उन्हीं ने सम्पन्न करवाई। 

बहरहाल मुशायरा शुरू था। सतलज ने सबसे पहले पंजाब से आये मीत को पुकारा। क्रिकेटर नवजोतसिंह सिद्धू की तर्ज पर इन्होंने मुशायरे को ऐसी वाह वाह सलामी (ओपनिंग) से नवाजा, जिसकी कदाचित किसी को उम्मीद न थी। गोया उन्होंने पॉवर प्ले में ही इतने रन कूट दिए कि बाद में आने वाले शायरों पर उस मोमेंटम का प्रेशर पड़ने के हालात पैदा हो गए। यद्यपि उनको सुनकर सबको तस्कीन मिली होगी कि मुशायरे में आकर उन्होंने रविवार की रात जाया नहीं की। उनके बाद एक दूसरे शायर की बारी थी। उसने मरहूम डॉ. राहत इंदौरी को याद करते हुए उन्हीं के अंदाज, मिजाज और तेवर का एक बहुत अच्छा शेर पेश किया। सुनकर अपन को भी मंच पर शेर पढ़ते डॉ. राहत इंदौरी का तसव्वुर आये बिना न रहा। 

उनके बाद उत्तरप्रदेश से तशरीफ़ लाये केशव त्रिपाठी की बारी थी। इन महाशय को जाने क्या सूझा कि अपनी शायरी से इन्हीं के प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी जी और केंद्र सरकार को लताड़ने लगे। अपनी निगाह में यह वाह वाह आगाज से उठे मुशायरे का पक्का बेड़ा गर्क था ! ये बस नाम के केशव साबित हुए और जैसे ही ये माइक से हटे, अपन रवाना थे। हालांकि जब ये योगी जी और केंद्र सरकार पर अपनी शायरी का घी राखोड़ी कर रहे थे तब सुनने वालों में एक जमात ऐसी भी थी जो यह राखोड़ी फांककर वाह वाह और दाद की दुर्गन्धयुक्त उलटी कर खूब खुश हो रही थी ! अपन तुरंत रवाना थे। 

लौटते में ख्याल आया कि शायरी या कविता करने के लिए इतने विषय हैं, फिर भी कवि और शायर इस बेहद उम्दा विधा को अपनी निजी राजनीतिक भड़ास की गटर में क्यों बहा देते हैं ? ठीक है कोई शासक या राजा आपको नापसन्द है, लेकिन आप अपना हुनर उसी नापसन्दगी या नफरत में होम करके खुद को बहुत बड़ा सूरमा या सिकंदर समझते हो तो अपन को ऐसे सूरमा और सिकंदरों पर दया आती है और उनकी कविता और शायरी पर तरस !

खैर। वहीं अनुराग अर्श नाम के एक शायर ने कई अच्छे शेर पढ़े। जरा देखिए, “नयन के कोर गीले हो रहे हैं, किसी के हाथ पीले हो रहे हैं, यहां मय भी नहीं चढ़ती है साहब, वहां शर्बत नशीले हो रहे हैं !’ सतलज राहत की निजामत ने भी उनके स्वर्गीय पिताजी की याद दिलाई। वही चुटकियां, चिरके और जुमले, कभी जो उनके पिताजी की अदा में शुमार होते थे और जिन पर एक खास वर्ग के श्रोता रीझ-रीझ जाते थे। लौटने के बाद बस यह मलाल है कि अपन दोनों जनानियों में से किसी को न सुन सके। केशव त्रिपाठी हाय हाय !

Ramswaroop Mantri

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