बुद्ध और पूर्ण
अपुन तो ठहरा नकारा, निठल्ला। समय काटने के लिए फटे में टांग अड़ाता रहता है। या फिर अखबारों के पन्नों, सोशल मीडिया में समय काटता रहता है। थोड़े दिनों पहले अपुन को जानकारी मिली कि अकबर बड़ा अत्याचारी राजा था। अभी कल परसों समाचारों में पढ़ा उसका कुछ अर्थ यूं था कि मुंबई की कोर्ट में वकील साहब ने कहा- अकबर को समझाना सम्भव था अब तो पालिका के कमिश्नर को समझाना मुश्किल है। वे पर्युषण पर्व के दौरान जीव हत्या रोकने के संदर्भ में दलील दे रहे थे। सावन खत्म हुआ। देव सो रहे हैं। गणपति बप्पा आ रहे हैं। सब और धार्मिक माहौल है। तो अपुन के अंदर का भी संत जाग गया। प्रवचन देने का मन हुआ। इसलिए आप झेलो। इसके बाद अपुन का शवासन लगाने का इरादा है।
खान-पान, रहन-सहन व्यक्तिगत मामला हैं। घर में घर का हर एक सदस्य, सामन्यजस्य बनाते हुए एक दूसरे की इच्छाओं का सम्मान करता हैं तभी शांति, सौहार्द रहता हैं। समाज में भी एक दूसरे की भावनाओं, खुशियों में सहयोग कर खुश रहा जा सकता हैं। घृणा, वैमनस्य और अविश्वास अशांति को जन्म देते हैं। शांति बनाए रखने के लिए मन को सम्हालना पड़ता है। बुद्ध और महावीर समकालीन थे। समाज में व्याप्त ढोंग ढकोसलो, जाति- लिंग के आधार पर चल रहें शोषण के विरुद्ध नए समाज की व्यवस्था में उनका बड़ा योगदान रहा। अहिंसा उनका मार्ग रहा। शुरुआती परेशानियों के बावजूद अपनी बात कहने और उसे जनमानस तक पहुंचाने में वे सफल रहें। आजकल तो जरा जरा सी बात पर खतरनाक प्रतिक्रिया आने लगती है। समय के साथ उनके अनुयायियों का लालच, अहंकार और सत्ता का नशा उनके विचारों को डंसने लगा। विचार, व्यवहार में नहीं झलकने लगे तो उनका प्रभाव खत्म होने लगा। वर्तमान समय में कुछ व्यक्ति मानव चित्त को शांति के रास्ते पर चलने देने की बजाय क्रिया-प्रतिक्रिया के लिए उकसाते से लगते हैं। अंदर के भस्मासुर के जाग जाने से आदमी खुद तो अशांत रहता है समाज में भी अशांति ही आती हैं। ऐसे समय में बुद्ध का यह किस्सा कुछ अलग ही बात सीखता है। अपुन को लगता है की बुद्ध की इस सीख और उनके उस समय के अनुयायियों का आचरण उनके धर्म को जनता तक पहुंचाने और जिंदा रखने में सहायक रहा। हिटलर की घृणा तो उसके जीते जी ही उसको लील गई। बुद्ध से जुड़े इस किस्से को पढ़ना और मनन करना तो बनता है। जीवन में उतारें या ना उतारें आपकी इच्छा-
बुद्ध और पूर्ण
बुद्ध ने पूर्ण नामक एक शिष्य को धर्मोपदेश देने के बाद पूछा- पूर्ण,अब तू किस प्रदेश में जाएगा?
पूर्ण- भगवन, आपका उपदेश ग्रहण करने के बाद मैं सुनापरन्त प्रांत में जाऊंगा।
बुद्ध- पूर्ण, सुनापरन्त प्रांत के लोग बहुत कठोर हैं। बड़ें क्रुर हैं। वे तुझे गालियां देंगे, तेरी निंदा करेंगें तब तुझे कैसा लगेगा?
पूर्ण- हे भगवंत, उस समय मैं यह मानूंगा कि वे लोग बहुत अच्छे हैं क्योंकि उन्होंने मुझ पर हाथ नहीं चलाया।
बुद्ध- अगर वे तुझ पर हाथ चलायें तो?
पूर्ण- मैं यही समझूंगा कि उन्होंने मुझे पत्थरों से नहीं मारा, इसलिए वे अच्छे हैं।
बुद्ध- और अगर वे पत्थरों से मारें तो?
पूर्ण- मैं यहीं समझूंगा कि उन्होंने मुझे डंडों से नहीं पीटा, इसलिए अच्छे हैं।
बुद्ध- और अगर वे ड़ंड़ो से पीटें तो?
पूर्ण- मैं समझूंगा कि वे भले हैं क्योंकि उन्होंने शस्त्र प्रहार नहीं किया।
बुद्ध- और अगर वे शस्त्र प्रहार करें तो?
पूर्ण- मैं समझूंगा कि वे भले हैं, क्यों कि उन्होंने मुझे जान से नहीं मारा।
बुद्ध- और जान से मार दें तो?
पूर्ण- भगवंत कुछ भिक्षु शरीर से दिक आकर(परेशान होकर), ऊबकर आत्महत्या करते हैं। यदि वे ऐसे शरीर का नाश करें तो मैं यह मानूंगा कि उन्होंने मुझ पर उपकार किया और इसलिए समझूंगा कि वे बहुत भले हैं।
बुद्ध- शाबास। पूर्ण, शाबास । इस प्रकार धीरज, समभाव और शांत चित्त की मनोदशा से युक्त होने के कारण तू सुनापरन्त प्रदेश में धर्मोपदेश करने में समर्थ होगा।
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