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*मेरा कोना -विवेक मेहता* 

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   शिक्षक दिवस 

        अपुन जहां मास्टरी करता है उस संस्था का साज संभाल यानी नियंत्रण ट्रस्ट करता हैं। एक जमाने में जब ट्रस्ट बनाया गया था तब उद्देश्य सेवा का था। अब तो ट्रस्ट बनाने वालों के बाल बच्चे कमाने के लिए, खर्च निकालने के लिए, सम्मान और ट्रस्ट से जुड़ी संपत्ति के भोग के लिए ट्रस्ट का संचालन करते हैं। हवाई जहाज से आते हैं, आला होटलों में ठहरते हैं ट्रस्ट के पैसों पर ठाट करते हैं। कभी-कभी अपने रिश्तेदारों पर एहसान करने के लिए उन्हें पे-रोल पर भी रख लेते। विद्या एक ऐसा व्यवसाय है जहां बात तो नैतिकता की करना होती है पर कमाने के लिए हर अनैतिक हथकंडे को अपनाना होता है। अपुन शायद विषय से भटक रहा है। तो बात यह थी कि अपुन के संस्थान का संचालन ट्रस्ट ने ऐसे लोगों को सौंप रखा था जिनके मुंह में दांत नहीं थे पेट में आंत नहीं थी। पांव कबर में लटके थे। बस शासन करने की उमंग और उत्साह उन्हें वहां जाने से रोके हुए था। उनकी दूर की सोच बस इतनी होती थी कि आज का दिन शांतिपूर्वक गुजर जाये और जिम्मेदारी इतनी कि ऊपर वालें खुश रहें। 

       दो चार दिन पहले ट्रस्ट के प्रशासक सवेरे सवेरे अपने ऑफिस में आकर बैठें।आदत के अनुसार उन्होंने कैलेंडर पर नजर दौडाई तो 5 सितंबर दिखाई दिया। लाल धब्बे वाला। ध्यान आया- अरे शिक्षक दिवस आ रहा है! ट्रस्ट को शिक्षकों के लिए कुछ करना चाहिए। सोचा मीटिंग बुलाते हैं, कार्यक्रम तय करते हैं। फटाफट ट्रस्ट के सभी कॉलेजों के प्राचार्य को फोन गया मीटिंग के लिए।

       साल भर मास्टरों को दुत्कारने वाले प्रशासक ने मीटिंग में कहा- “ शिक्षक दिवस पर हमें शिक्षकों का मारल बूस्ट करना चाहिए। यह हमारी ड्यूटी हैं। हम सोच रहे हैं कि इस बार मोटिवेशनल स्पीच का अरेंजमेंट हो जाए उसके बाद कुछ शिक्षकों का सम्मान जिन्होंने कुछ अचीव किया हो और फिर लंच रख लेते हैं। मौज मस्ती के लिए हाउजी का खेल भी हो जाए। कैसा रहेगा?” 

          गुड बुक में रहने की इच्छा वाले गर्दन हिलाने लगें। एक प्राचार्य की जगह एक सीनियर व्यक्ति इस मीटिंग में आया था। बोल पड़ा- “अभी दो-तीन दिन पहले ही हमारे प्राचार्य का सम्मान और इसी बहाने हम सबका सम्मान एक छात्र ने किया। उनकी गलती बस इतनी थी कि उन्होंने कालेज के समय के बाद मस्ती कर रहें उस छात्र को कैंपस छोड़ने के लिए कहा था। उनका वह वीडियो सारे शहर में वायरल हुआ था जिसमें छात्र ने उन्हें चांटा मारा था। आपने सुरक्षा, अनुशासनात्मक कार्रवाई के कदम ना उठाकर शिक्षकों को मोटिवेट करने का काम ही तो किया है! ऊपर से आपने हमारे प्राचार्य को डांट भी लगाई थी- कॉलेज के बहुत सारे छात्र इस घटना के विरोध में जुलूस बनाकर शहर में कैसे घूमें? यदि कुछ अवांछित हो जाता तो! इससे ज्यादा मोटिवेशनल क्या हो सकता है!!” 

        अपुन को लगा कि साला रीढ़ की हड्डी वाला बड़ा खतरनाक होता है। सकते में आए बुढ़ाऊ प्रशासक को याद आ गया घटना के बाद का- मंत्री/नेताजी का फोन। लड़के पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। बच्चे हैं गलती हो जाती है। माफ करना बड़ों का बड़प्पन है। क्या करते? मामला तो लपेटना ही था। उस घटना का ध्यान रहा नहीं। गलती हो गई। अन्यथा यह मीटिंग बुलाते ही नहीं और यह खरी-खरी सुनना भी नहीं पड़ती। मास्टरों की औकात ही क्या है? एक बार शिक्षक दिवस न भी मना तो क्या हो जाएगा? बिना निर्णय पर पहुंचे उन्होंने मीटिंग कैंसिल कर दी।

Ramswaroop Mantri

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