अग्नि आलोक
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*मेरा कोना -विवेक मेहता:बौद्ध कथा और अपुन* 

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                          अपुन को शो बाजी का बहुत शौक है। छोटा सा काम अपुन करता है तो उसे इतना बड़ा दिखलाने का प्रयास करता है कि काम तो लोग भूल जाते हैं और शो बाजी में मग्न हो जाते हैं। यह अलग बात है कि उस शो बाजी असर भी थोड़े-से दिन ही रहता हैं। चर्चा और लोगों के दिमाग में रहने के लिए अपुन को यह चोंचले बाजी बार-बार करना पड़ती है। खैर,इसके लिए कौन सा पैसा अपुन की जेब से लग रहा होता जो चिन्ता करें! इन ओछी हरकतों के कारण एक बार गुरुजी ने यह कहानी सुना कर अपुन को सुधारने का प्रयास किया। सुनते वक्त अपुन को लगा अपुन गलत तरीके अपना रहा हैं। पर आदत तो कुत्ते की पूंछ की तरह होती है। अपुन कहां बदलने वाला! शायद यह कहानी पढ़ कर आप बदल जाओ।

              श्रेष्ठ यज्ञ (कैसा हो राजा का आचरण)

          एक बार कूट दंत नामक ब्राह्मण बुद्ध के पास आया। उसने पूछा- “श्रेष्ठ यज्ञ कौन सा है? और उसकी विधि क्या है?” 

           बुद्ध बोले- “प्राचीन काल में महा विजित नाम का एक बड़ा राजा हो गया। एक दिन उसने सोचा मेरे पास विपुल संपत्ति है यदि मैं इसे महायज्ञ में खर्च करूं तो मुझे बहुत पुण्य मिलेगा। उसने अपना विचार अपने पुरोहित से साझा किया। पुरोहित बोले- महाराज आजकल आपके राज्य में शांति नहीं हैं। गांव और शहरों में डाके पड़ते हैं। लोगों को चोरों से कष्ट हैं। ऐसी स्थिति में ‘यज्ञ कर’ लगाकर आप अपने कर्तव्य से विमुख हो जाएंगे। शायद आप सोचेंगे कि डाकुओं, चोरों को पकड़ कर फांसी दे देने से, कैद करने से अथवा देश निकाला दे देने से शांति हो जाएगी किंतु यह भूल है। इससे अराजकता नष्ट नहीं होगी। अन्य लोग विद्रोह करेंगे। 

राजा ने पूछा- तब इन उपद्रवों को शांत करने के लिए क्या करना चाहिए? 

पुरोहित बोले- हमारे राज्य में जो लोग खेती करना चाहते हैं उन्हें बीज आदि सामग्री देनी चाहिए। जो व्यापार करना चाहते हैं उन्हें पूंजी देना चाहिए। जो नौकरी करना चाहते हैं उन्हें उचित वेतन पर नियुक्त करना चाहिए। सब लोगों को उनके लायक काम मिल जाने से वह उपद्रव नहीं करेंगे। समय पर कर मिलने से आपकी तिजोरी भरी भरी रहेंगी। लूटपाट नहीं होने से बच्चों की इच्छा पूरी कर लोग अपने-अपने घरों में आनंद से रह सकेंगे। 

राजा को पुरोहित का विचार अच्छा लगा। उसने तुरंत ही वैसी व्यवस्था कर दी। थोड़े ही समय में राज्य में समृद्धि बढ़ गई। राजा ने फिर से पुरोहित को बुलाया और कहा- हे पुरोहित मैं अब महायज्ञ करना चाहता हूं। मुझे उचित सलाह दो। 

पुरोहित बोला- महायज्ञ कराने का निश्चय करने से पहले प्रजा की अनुमति प्राप्त करना उचित होगा। अतएव घोषणा पत्र चिपका कर हम जनता की सम्मति प्राप्त करें तो ठीक होगा।

पुरोहित की सलाह के अनुसार राजा ने घोषणा पत्र लगवा दिए। जनता से निवेदन किया कि वह महायज्ञ के लिए अपनी सम्मति निर्भयता पूर्वक, स्पष्टता से प्रकट करें। 

सब ने अनुकूल मत दिए। पुरोहित ने यज्ञ की तैयारी करके राजा से कहा- महाराज यज्ञ करते समय, यज्ञ के दौरान और यज्ञ की समाप्ति पर खर्च संबंधी चिंता, गर्व और प्रसिद्धि के भाव आपके मन में नहीं आना चाहिए। यज्ञ में बुरे भले सब प्रकार के लोग आएंगे किंतु आपको तो केवल सत्पुरुषों पर ही दृष्टि रखकर यज्ञ करना चाहिए। चित को प्रसन्न रखना चाहिए। 

इस यज्ञ में राजा ने पशुओं का वध नहीं किया। पेड़ों को उखाड़ कर उनके स्तम्भ खड़े नहीं किये। अमीर गरीब में फर्क नहीं किया। लोगों को जबरदस्ती काम पर नहीं रखा। यज्ञ के लिए जबरन वसूली नहीं की। 

यज्ञ के दौरान धनी मानी लोग मंहगे उपहार लाये। किंतु राजा ने उनसे कहा- सज्जनों मुझे आपके उपहार की आवश्यकता नहीं। धार्मिक कर द्वारा इकट्ठा किया गया बहुत सारा धन अभी भी मेरे पास है। उसे ही अभी उचित काम में लगाना है। राजा ने जब उपहार नहीं लिये तो उन धनी मानी लोगों ने बेसहारा, अनाथ लोगों के लिए धर्मशाला बनवाने और गरीबों को दान देने में अपना वह सब धन खर्च कर दिया।” 

        सुनकर कूट दंत और अन्य लोग बोले- “बहुत सुंदर यज्ञ”

Ramswaroop Mantri

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