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उस ‘धोखे’ को भूल नहीं पाए एनडी तिवारी

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नदीम

बात मार्च 1987 की है। तब उत्तराखंड यूपी का ही हिस्सा हुआ करता था और यूपी विधानसभा की एक सीट हुआ करती थी काशीपुर। हालांकि यह विधानसभा सीट अभी भी है लेकिन अब उत्तराखंड राज्य का हिस्सा है। यह विधानसभा सीट उस वक्त कांग्रेस के कद्दावर नेताओं में गिने जाने वाले नारायण दत्त तिवारी की ‘होम कॉन्स्टिट्यूएंसी’ कहलाती थी। राजनीतिक गलियारों में कहा जाता था कि इस विधानसभा क्षेत्र में नारायण दत्त तिवारी की मर्जी के बगैर पत्ता भी नहीं हिल सकता। रेकॉर्ड भी ऐसा ही बोलते थे। 1969 में उन्होंने यहां से पहला चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। इसके बाद 1974 और 1977 के चुनाव में भी वह यहीं से जीते। 1980 में जब वह सांसद हो गए तो उन्होंने इस सीट पर अपने ‘यस मैन’ कहे जाने वाले सत्येंद्र चंद्र गुड़िया को टिकट दिलवाया और उन्हें भी विधायक बनवा दिया। 1985 में नारायण दत्त तिवारी ने फिर से काशीपुर से चुनाव लड़ा और विधायक हुए। साथ ही यूपी के मुख्यमंत्री भी हुए लेकिन बीच में उन्हें फिर केंद्र जाना पड़ गया, जिसकी वजह से यह विधानसभा सीट रिक्त हुई और यहां मार्च 1987 में उपचुनाव कराना पड़ा।

N.D. Tiwari was the only politician to rule two states, but his personal  life eclipsed that

अमूमन उपचुनाव के नतीजे सत्तारूढ़ दल के ही साथ जाते हैं। उस वक्त यूपी में कांग्रेस की सरकार थी। नारायण दत्त तिवारी के केंद्र जाने के बाद वीर बहादुर सिंह मुख्यमंत्री बन चुके थे। राज्य में विपक्ष भी बिखरा हुआ था लेकिन कांग्रेस और गांधी परिवार से अलग हुईं मेनका गांधी के नेतृत्व में बना राष्ट्रीय संजय मंच नई अलख जगाने की कोशिश में था। मेनका गांधी के साथ अकबर अहमद डंपी हुआ करते थे। संजय गांधी और मेनका गांधी से उनके दोस्ताना संबंध थे। संजय मंच बनाने के पीछे उन्हीं का दिमाग माना जाता था। उस वक्त वह यूपी में फायरब्रांड युवा नेता के रूप में जाने जाते थे। हालांकि इन दिनों वह सक्रिय राजनीति में नहीं हैं।

संजय मंच ने ठोकी ताल
उस वक्त कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के साथ मेनका गांधी के रिश्ते बहुत ही कड़वे थे। कांग्रेस नेतृत्व किसी को भी बर्दाश्त कर सकता था लेकिन मेनका गांधी उसके लिए किसी भी सूरत में कबूल नहीं थीं। इधर मेनका गांधी ने इस उपचुनाव में अकबर अहमद डंपी को संजय मंच का उम्मीदवार बना दिया। उनके इस फैसले ने इस उपचुनाव को हाई प्रोफाइल बना दिया। डंपी के मुकाबले कांग्रेस ने भी मुस्लिम उम्मीदवार उतारने का फैसला किया। जाहिर है, यह नाम ऐसा होना चाहिए था जो वजनी हो ताकि चेहरों की लड़ाई में डंपी के मुकाबले हल्का न मान लिया जाए। उस वक्त कांग्रेस की पॉलिटिक्स में अम्मार रिजवी सबसे बड़ा मुस्लिम चेहरा हुआ करते थे। वह भी अब सक्रिय राजनीति में नहीं हैं लेकिन उस वक्त वह राज्य सरकार में मंत्री भी थे। कांग्रेस ने उन्हें अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया। हताश और निराश विपक्ष को यह उपचुनाव अपने लिए मौका जैसा लगा। उस समय तक बीएसपी बन चुकी थी। बीएसपी तो नहीं मानी लेकिन बाकी दलों ने तय किया कि वे अपना उम्मीदवार नहीं उतारेंगे। बीएसपी ने अपना उम्मीदवार उतार दिया। इस तरह से तीन दलों- कांग्रेस, संजय मंच और बीएसपी के उम्मीदवार के अलावा 18 निर्दलीय उम्मीदवार भी मैदान में थे। यह चुनाव जितना कांग्रेस की प्रतिष्ठा से जुड़ा था, उतना ही नारायण दत्त तिवारी की भी इज्जत का सवाल बना हुआ था। विधानसभा क्षेत्र से तिवारी के रिश्तों को भुनाने के लिए कांग्रेस ने नारा दिया- जात पर ना पात पर, तिवारी जी की बात पर, मुहर लगेगी हाथ पर। बतौर केंद्रीय मंत्री दिल्ली से छुट्टी लेकर एनडी तिवारी ने काशीपुर में डेरा डाल दिया। राज्य सरकार ने भी पूरी ताकत झोंक दी लेकिन डंपी ने अम्मार रिजवी को हराकर कांग्रेस के पैरों तले की जमीन खिसका दी। डंपी को 42 हजार वोट मिले, जबकि अम्मार रिजवी 35 हजार वोट ही पा सके। बीएसपी उम्मीदवार को तो 12 हजार ही वोट मिल पाए थे। उपचुनाव के नतीजे जितना राज्य सरकार के लिए शर्मिंदगी का सबब बने थे, उससे कहीं ज्यादा कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के लिए असुविधाजनक साबित हुए।

तिवारी से हुआ जवाब-तलब
जिस सीट के लिए यह कहा जाता रहा हो कि वहां नारायण दत्त तिवारी की मर्जी के बगैर पत्ता भी नहीं हिलता, उस सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार की हार, वह भी संजय मंच के उम्मीदवार से, कांग्रेस नेतृत्व को हजम नहीं हो रही थी। हार के कारणों को लेकर नारायण दत्त तिवारी से जवाब तलब हुआ। तिवारी ने राजीव गांधी को जवाबी पत्र लिखा, जिसका मजमून कुछ यूं था, ‘आदरणीय राजीव जी, अत्यंत खेद है कि मेरे पूर्ण प्रयास के बाद भी काशीपुर विधानसभा क्षेत्र में पार्टी को पराजय का मुंह देखना पड़ा। हमारे उम्मीदवार अम्मार रिजवी, व पार्टी के अन्य कार्यकर्ताओं ने रात-दिन अथक प्रयास किया और उनकी मेहनत का व्यापक प्रभाव भी पड़ा। अम्मार रिजवी ने पार्टी हित में जो निर्णय व आग्रह स्वीकार किया उसके लिए मैं उनका सदैव आभारी रहूंगा। मुझे इस बात का अत्यंत खेद है कि आपके पूर्ण विश्वास के बावजूद मैं अपने संगठनात्मक दायित्व को नहीं निभा पाया। इसमें संदेह नहीं कि काशीपुर क्षेत्र का समस्त घटनाचक्र और इस अनहोनी पराजय का उत्तरदायित्व मेरा ही है और अपनी इस व्यक्तिगत असफलता को अपने नेता के सम्मुख अर्थात आपके सम्मुख विनम्रतापूर्वक स्वीकार करता हूं। आगे क्या कदम लिए जाएं, इस संबंध में आपसे भेंट करके विचार-विमर्श करना चाहूंगा। इस पराजय में कुछ ऐसे भी कारण रहे हैं जो भविष्य के लिए राष्ट्रव्यापी दृष्टिकोण से चिंताजनक हैं।’ राजनीतिक गलियारों में कहा जाता है कि नारायण दत्त तिवारी को आजीवन यह संदेह रहा कि उस समय के मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने उनके साथ धोखा किया था।

Ramswaroop Mantri

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