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देश की लगभग 70 फ़ीसदी संख्या खेती पर निर्भर :फिर भी किसने किया जीवन दूभर?

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अभय दुबे

भारत कृषि प्रधान देश है और देश की आधी से अधिक आबादी कृषि पर निर्भर है। इसके बावजूद किसानों की स्थिति इस देश में उतनी ही भयावह है, जितनी किसी महामारी के समय लोगों की हो जाती है। देश के कई इलाके, जहाँ जीवन पूरी तरह खेती-बाड़ी पर निर्भर है, वहाँ किसानों और उनके परिवारों की हालत इतनी दयनीय है कि किसान आत्महत्या करने पर भी उतारू हो जाते हैं। आखिर सरकार की योजनाएँ किन दस्तावेज़ों में रखी रह जाती हैं कि जिन तक इन योजनाओं की सबसे अधिक ज़रूरत है, वहाँ तक उनकी पहुँच ही नहीं हो पाती?

अगर किसानों को श्रेणियों में बाँटा जाए (उच्च, मध्यम और निम्न) – तो इन तीनों श्रेणियों में आने वाले किसानों की स्थिति बहुत हद तक खराब है। इनमें विशेष रूप से निम्न वर्ग के वे किसान, जिनके पास भूमि कम है, उनकी स्थिति तो इतनी भयावह है कि वे अगर कुछ उपजाते भी हैं, तो उसे औने-पौने दामों में बेचकर अपनी लगाई हुई पूँजी भी वापस नहीं निकाल पाते। इस वर्ग के घरों की स्थिति इतनी दयनीय है कि यदि उनकी आमदनी सही तरीके से नहीं हो पाती, तो दो जून की रोटी के लिए भी उन्हें मोहताज होना पड़ता है, जिसके कारण बाद में वे आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर हो जाते हैं।

इस वर्ग के किसान हर काम के लिए कर्ज़ तले दबे रहते हैं- लड़कियों की शादी के लिए कर्ज़, बच्चों की पढ़ाई के लिए कर्ज़, दवाई के लिए कर्ज़। भारत को आज़ाद हुए 78 साल हो चुके हैं। देश आज़ादी का अमृत काल महोत्सव भी मना रहा है, लेकिन आज भी अख़बारों में ऐसी ख़बरें छप रही हैं कि बेटी की शादी के लिए पैसों का इंतज़ाम न होने के कारण कानपुर में एक किसान ने आत्महत्या कर ली।

बैतूल में किसान ने खेत में कीटनाशक पी लिया।

संभल में किसान ने फाँसी लगाकर जान दे दी।

खेत में फंदे से लटका मिला किसान।

कर्ज़ में डूबे किसान ने फाँसी लगाकर दी जान।

अख़बारों की ये सभी सुर्खियाँ वर्ष 2025 की हैं, न कि दस साल पहले की। अगर अख़बारों के पन्नों से ऐसी ख़बरों की सुर्खियाँ एक जगह इकट्ठा की जाएँ, तो दस–पंद्रह नहीं, बल्कि एक ही साल में हजारों किसान आत्महत्या कर लेते हैं। देश के हर राज्य में किसानों की स्थिति यही है- कहीं मौत है, तो कहीं गरीबी के बोझ तले कर्ज में डूबा हुआ जीवन।

भारत के महाराष्ट्र राज्य का पूर्वी और उत्तर-पूर्वी हिस्सा विदर्भ कहलाता है, जिसके अंतर्गत महाराष्ट्र के 11 ज़िले आते हैं- नागपुर, अमरावती, चंद्रपुर, अकोला, वर्धा, बुलढाणा, यवतमाल, भंडारा, गोंदिया, वाशिम और गढ़चिरौली। इन ज़िलों के किसानों की स्थिति तो छोड़िए, देश का यह वही क्षेत्र है जहाँ एक साल में लगभग 800 के करीब किसान आत्महत्या कर लेते हैं। द वायर की एक रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र में 2025 के पहले नौ महीनों में कर्ज़, फसल खराब होने और अत्यधिक बारिश की वजह से 781 किसानों ने आत्महत्या की है।

जब बात इनके मुआवज़े की आती है, तो उसे देने के लिए देश के पास पैसा ही नहीं रहता। 29 दिसंबर 2025 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित एक रिपोर्ट- “फसलों के नुकसान का मुआवज़ा व कर्ज़माफी के इंतज़ार में बीता साल”- इस बात को साफ़ तौर पर उजागर करती है कि किसानों के लिए इस देश में सत्ताधारियों के पास कभी पूँजी नहीं होती, मगर पूँजीपतियों के लिए ख़ज़ाना हमेशा खुला रहता है।

इसी रिपोर्ट में बताया गया है कि विदर्भ क्षेत्र का यवतमाल ज़िला कपास उत्पादन का प्रमुख केंद्र है। इसी कारण यवतमाल को ‘कॉटन सिटी’ के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ प्रति ज़िले में पाँच लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में कपास का उत्पादन किया जाता है। वर्ष 2025 किसानों के लिए पूरी तरह नुकसानदेह साबित हुआ। सरकार द्वारा घोषित किया गया मुआवज़ा किसानों के घावों पर मरहम लगाने में नाकाम रहा। एक साल पूरा हो चुका है, लेकिन किसान आज भी कर्ज़माफी के इंतज़ार में नज़रें गड़ाए हुए हैं।

आज़ादी के 78 वर्षों में देश की लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों की सरकारें आईं और चली गईं, लेकिन किसानों की वास्तविक समस्याओं पर किसी ने भी कोई ठोस और दीर्घकालिक नीति बनाने का ईमानदार प्रयास नहीं किया। वर्तमान की केंद्र सरकार ने भी वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का सपना दिखाया था, लेकिन यह सपना आज तक साकार नहीं हो सका। इसके उलट किसान कर्ज़ के बोझ तले और अधिक दबता चला गया। आज भी देश के नीति-निर्देशकों का ध्यान कृषि क्षेत्र की मूल समस्याओं पर नहीं है, जिसके कारण किसानों की आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भयावह प्रतीत हो रहा है। कृषि उत्पादन में लगने वाली लागत- जैसे खाद, बीज, कीटनाशक, सिंचाई, खेत की तैयारी से लेकर फसल की कटाई तक- कई गुना बढ़ चुकी है। इसके विपरीत फसलों के दाम आज भी कछुआ चाल से आगे बढ़ रहे हैं। कुछ फसलों के दाम तो पहले की तुलना में और भी कम हो गए हैं। ऐसी स्थिति में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) भी किसानों को वास्तविक राहत नहीं दे पा रहा है। जब तक किसानों को लागत से ऊपर लाभकारी मूल्य सुनिश्चित नहीं किया जाएगा, तब तक उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार संभव नहीं है।

देश में नकली खाद, बीज और कीटनाशकों का एक व्यापक और संगठित मकड़जाल फैला हुआ है। किसानों को जो कृषि आदान सामग्री मिलती है, वह अक्सर निर्धारित मानकों पर खरी नहीं उतरती। परिणामस्वरूप किसान पूरी लागत तो चुकाता है, लेकिन अपेक्षित उत्पादन नहीं मिल पाता। स्थानीय स्तर पर गुणवत्ता जाँच की पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण किसान मजबूरन इन्हीं नकली आदानों पर निर्भर रहता है। यह स्थिति न केवल किसानों की आय घटाती है, बल्कि उन्हें कर्ज़ और निराशा की ओर भी धकेलती है। 

रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ ने  राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो का जिक्र करते हुए कहा कि देश में अब तक 4.50 लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। यह केवल संख्या नहीं ,बल्कि किसान पर आया संकट का प्रमाण है, जिसकी लंबे समय से अनदेखी की जा रही है। आगे पी साईनाथ ने कहा कि देश में करीब 15 करोड़ किसानों ने खेती छोड़ दी है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि किसान आत्महत्याओं की त्रासदी केवल कृषि संकट नहीं बल्कि सामाजिक संकट है। यह संकट आर्थिक विफलता का प्रतीक बन चुका है। 

आर्थिक व्यवस्था में सुधार से ही खेती व किसान को बचाया जा सकता है। उन्होंने खेती पर निर्भर रहना और किसान होना, इन दोनों में फर्क की बात कही। यह बात स्वाभाविक भी है क्योंकि किसान होना यानी जोखिम उठाने वाला सबसे असुरक्षित व्यक्ति। किसान बाज़ार के नियंत्रण में नहीं है। लागत ( खाद, कीटनाशक, बीज और डीजल)  दिन पर दिन बढ़ रही है परन्तु किसान फसल का कीमत तय नहीं कर पाता ।

1990 के उदारीकरण के बात जितना उद्योग और कॉर्पोरेट को प्राथमिकता दी गई लेकिन कृषि निवेश, सिंचाई, भंडारण और समर्थन मूल्य को नजरअंदाज किया। आज भी जब किसानों के द्वारा मेहनत से फसल उपजाया जाता है और उपज अच्छी हो जाए तो उसके भंडारण के लिए देश में उपलब्धता नहीं है जिससे उन्हें अपने मेहनत से उपजाए गए फसलों को औने पौने दामों में बेचना पड़ता है। “198 किलो प्याज के ₹ 22” यह अखबार में प्रकाशित एक रिपोर्ट का शीर्षक है जिससे किसानों की स्थिति समझ में आ जाएगी।

छात्र, जनसंचार विभाग,

 महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा

Ramswaroop Mantri

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