भोपाल
मध्यप्रदेश की प्रशासनिक और आर्थिक राजधानी (भोपाल-इंदौर) में अंग्रेजों के जमाने का पुलिस सिस्टम लागू किया गया है, लेकिन पुलिस को पावर देने के मामले में कंजूसी की गई। यानी बीच का रास्ता। पिछले 40 साल में कई बार इस सिस्टम को अमलीजामा पहनाने की कोशिश हुईं, सरकारें बदलीं, लेकिन अंजाम तक कोई नहीं पहुंचा पाया। कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह सिस्टम नहीं भाया होता तो शायद पुलिस वही पुराने ढर्रे पर ही काम करती रहती। इसे लागू करना मुख्यमंत्री के लिए किसी चुनौती से कम भी नहीं रहा। आईएएस लॉबी से भला कौन सीधे पंगा लेता? वजह, प्रशासनिक सिस्टम में फैसले लेने वाले ओहदों पर आईएएस ही काबिज हैं।
यह बिरादरी शुरू से ही इस सिस्टम के खिलाफ में रही है, क्योंकि पंख तो उसके ही कतरे जाने थे। चूंकि ‘सरकार’ ने ठान ही लिया था, अब देरी नहीं करेंगे। चार बार के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी सत्ता संचालित करने के महारथी हैं। सुना है कि इस सिस्टम को लागू करने के लिए उन्होंने जब बैठक की, मुख्य सचिव और डीजीपी, दोनों को बुलाया। साफ है बीच का रास्ता निकालना जरूरी था, क्योंकि किसी को नाखुश कर आगे का सफर कठिन कोई नहीं बनाना चाहता है।
इस सिस्टम को लागू करने से कैसे रोका जाए? रायता फैलाने की कोशिश भी हुई। आईएएस सर्विस मीट स्थगित कर ‘सरकार’ पर दबाव बनाने का प्रयास हुआ। राज्य निर्वाचन आयुक्त बीपी सिंह ने एक बयान देकर इस तरफ इशारा भी किया था। राज्य प्रशासनिक सेवा संघ ने भी अपनी तरफ से प्रयास किए, लेकिन ‘सरकार’ के सामने जाने की हिम्मत किसी की नहीं हुई।
जब इसका ड्राफ्ट तैयार किया जा रहा था, उस दौरान कई बार ‘अधिकार’ घटने-बढ़ने के अनुमान लगाए गए, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। जब इसे लागू किया गया तो पता चला कि यह वह सिस्टम नहीं है, जिसे मुंबई या दिल्ली में कई सालों से चल रहा है। जो पावर कलेक्टर के हैं, उसमें आंशिक कमी की गई, लेकिन पुलिस महकमा जो चाहता था, वह उसे दिया, लेकिन पूरा नहीं। सिस्टम लागू होने के बाद इसके स्वरूप को लेकर एक रिटायर्ड आईएएस अफसर ने कहा- यह शिवराज मॉडल है। न तुम जीते, न हम हारे.. ‘सरकार’ भी खुश।
मौका देखकर लगा दिया चौका
पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू हाेने के बाद यह तय हो गया कि कमिश्नर आईजी रैंक के अधिकारी बनेंगे। यह खबर हाल ही में इंदौर से भोपाल में पदस्थ हुए एक सीनियर आईएएस अफसर को पता चली तो वे सीधे मंत्रालय पहुंच गए और उन्होंने भोपाल एडीजी सांई मनोहर का बंगला खाली होने की प्रत्याशा में अलॉट करा लिया। सुना है कि जैसे ही गृह विभाग ने उन्हें आदेश दिया, उसके कुछ देर बाद ही 5वीं मंजिल (मुख्यमंत्री कार्यालय) से निर्देश आ गए कि भोपाल एडीजी की पोस्टिंग मध्य प्रदेश भवन दिल्ली होना है। सुना है कि यह वही आईएएस अफसर हैं, जो प्रमोशन के बाद उसी विभाग की कमान चाहते थे, लेकिन ऐसा हो न सका। इस बार उन्होंने बंगले के लिए मौका देखकर चौका लगा ही दिया।
मोदी के सामने ‘सरकार’ का प्रेजेंटेशन, वहीं बनाओ, जो वो चाहें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 13-14 दिसंबर को बनारस में बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक लेने वाले हैं। इस दौरान सभी मुख्यमंत्री अपने-अपने प्रदेश में किए गए नवाचरों व केंद्रीय योजनाओं की मौजूदा स्थिति की जानकारी देंगे। मध्य प्रदेश का प्रजेंटेशन तैयार करने में मंत्रालय के अफसर दिन-रात एक किए हुए हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान चुनिंदा अफसरों के साथ बैठक कर प्रजेंटेशन फाइनल कर रहे हैं।
सुना है कि मोदी के सामने होने वाले प्रजेंटेशन को पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा की टीम फाइनल करेगी। यह टीम सीनियर आईएएस अफसरों को गाइड कर रही है कि प्रजेंटेशन कैसा बनेगा? इसके चलते बार-बार बदलाव से अफसर परेशान हैं। इसको लेकर एक अफसर ने कहा- ‘सरकार’ ने क्या किया? इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि प्रधानमंत्री क्या देखना चाहते हैं।
दावेदारों का ‘सरकार’ पर दबाव
बीजेपी में केंद्रीय नेतृत्व की नाराजगी के बाद प्रदेश संगठन में धड़ाधड़ नियुक्तियां हुईं, लेकिन सरकार में राजनीतिक पदों पर बैठने के लिए दावेदार परेशान हैं। ‘सरकार’ इतनी व्यस्त है कि वह इस तरफ ध्यान ही नहीं दे रही। पहले उप चुनाव, फिर कोविड, इसके बाद फिर चार सीटों पर उप चुनाव और अब पंचायत चुनाव.. चौथी बार सत्ता मिलने के बाद पौने दो साल ऐसे ही निकाल दिए। वे दावेदार, जिन्हें आश्वासन मिला था, वे शांत बैठने के मूड में अब दिखाई नहीं दे रहे। एक दावेदार ने ‘सरकार’ पर दबाव बनाने के लिए दिल्ली दरबार की शरण ली है। निगम-मंडलों में नियुक्तियां नहीं हो पाने की मुख्य वजह सत्ता-संगठन में नामों को लेकर सहमति नहीं बन पाना है।
प्रदेश अध्यक्ष से लेकर प्रदेश संगठन महामंत्री सुहास भगत की मुख्यमंत्री के साथ कई दौर की बैठकें हुईं, लेकिन नामों को लेकर पेंच नहीं निकल पाया। सुना है कि केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ बीजेपी का दामन थामने वाले नेता पद नहीं मिलने से धीरे-धीरे मुखर हो रहे हैं। एक नेता ने तो मुख्यमंत्री कार्यालय में एक अफसर से यहां तक कह दिया कि यदि और इंतजार कराया तो यह ठीक नहीं है।
बदला लेने का ‘स्मार्ट’ मौका छोड़ा नहीं जाता
लोक निर्माण मंत्री गोपाल भार्गव ने सागर में स्मार्ट सिटी के कामों पर सवाल क्या उठाए, एक सीनियर आईएएस अफसर को अपने घुर विरोधी अफसर से बदला लेने का मौका मिल गया। भार्गव के बयान के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बैठक में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की धीमी चाल पर नाराजगी जताई। इस पर अफसर ने भोपाल स्मार्ट सिटी में हुए एक टेंडर में गड़बड़ी का मामला उठा दिया। यह टेंडर 2019 में कमलनाथ सरकार के दौरान जारी हुआ था। मुख्यमंत्री ने इस अवधि में जितने भी टेंडर हुए, सबकी जांच करने के निर्देश दे दिए। अब जांच होगी तो उस अफसर तक भी जाएगी, जिसने व्यक्तिगत रुचि लेकर एक कंपनी को ठेका दिलाया था। अब देखना है कि रिटायर हो चुके अफसर को जांच के दायरे में लाया जाता है या नहीं?
और.. अंत में: इन्हें सुननी पड़ी खरी-खोटी
आईएएस सर्विस मीट को स्थगित करने के लिए एसोसिएशन ने बैठक बुलाई थी। इस बैठक में पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू किए जाने का विरोध नहीं करने पर कुछ अफसरों ने नाराजगी व्यक्त की। सुना है कि दो जूनियर अफसरों ने मुख्यमंत्री कार्यालय में पदस्थ अफसरों को जमकर खरी-खोटी सुनाई। एक अफसर ने तो यहां तक कह दिया कि आप लोगों के मुख्यमंत्री कार्यालय में पदस्थ होने का कोई फायदा नहीं है।





