पड़ोसी मुल्क नेपाल के सूरते हाल देखकर एक नुक्कड़ नाटक ‘ जनता पागल हो गई है ‘ की याद आ गई । जहाँ जनता विशेषकर युवाओं के आक्रोश की चरम अभिव्यक्ति देखने को मिली । उनकी हिंसक अभिव्यक्ति ने सब तहस नहस कर दिया । एक अजीब किस्म का पागलपन देखा जा रहा है । हालात को बिगड़ने के लिए सरकार ही जिम्मेदार है जिसने अपनी मनमानी और लूट के जरिये जनता को हलाकान कर दिया . लगता है जनता के पास कोई रास्ता था ही नहीं था.
1981 – 82 में समता युवजन सभा की पिपरिया यूनिट के युवा साथियों ने ‘ जनता पागल हो गई ‘ नुक्कड़ नाटक का पिपरिया जैसे कस्बे में जब प्रदर्शन किया तो यह नागरिकों के लिए एक कौतूहल था । क्योंकि इसके पहले किसी व्यक्ति का नुक्कड़ नाटक शैली से कोई परिचय नहीं था । इसके साथ ही गड्डा नाटक का प्रदर्शन भी किया था । जब नाटक होता था तो मदारी के खेल जैसा मज़मा जुट जाता था । नुक्कड़ नाटक खुले सार्वजनिक स्थानों पर आयोजित किए जाने वाले नाटक होते हैं, जो अक्सर किसी सामाजिक मुद्दे पर जागरूकता फैलाने या सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए किए जाते हैं. इनमें कलाकार बिना किसी मंच के सीधे दर्शकों के बीच प्रदर्शन करते हैं और दर्शकों से सीधे संवाद करते हैं. ये भारत में सामाजिक और राजनीतिक प्रतिरोध के एक प्रमुख साधन के रूप में विकसित हुए हैं. नुक्कड़ नाटकों का मुख्य उद्देश्य सामाजिक सरोकार के मुद्दों जैसे भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता फैलाना होता है. उल्लेखनीय है कि पिपरिया के युवा साथियों को नुक्कड़ नाटक का प्रशिक्षण जाने माने रंगकर्मी Shamsul Islam और नीलिमा शर्मा ने किशोर भारती में आयोजित एक प्रशिक्षण शिविर में दिया था । इस दौरान तीन नाटक तैयार किए गए थे जिनका जगह जगह प्रदर्शन किए गए ।
नुक्कड़ नाटक के बाद हम लोग दर्शकों से नाटक के मुद्दों पर चर्चा करते थे । उनका फीडबैक लेते थे और सहयोग राशि के लिए एक डिब्बा उनके आगे कर देते थे । नुक्कड़ नाटक के प्रमुख किरदार नरेन्द्र कुमार मौर्य ,श्रीगोपाल गांगूडा , बालेन्द्र परसाई ,किशन व्यास , मुकेश पुरोहित ,लक्ष्मी सोनी और विराम अग्रवाल , गोपाल राठी आदि साथी थे । बाद में यही नाटक पिपरिया के महाविद्यालय की सोशल गैदरिंग के सांस्कृतिक कार्यक्रम के मंच पर किया गया था । जिसे छात्रों ने सराहा था ।
जनता पागल हो गई है’ एक महत्वपूर्ण नुक्कड़ नाटक है जिसे शिवराम ने लिखा है, और यह हिंदी के पहले नुक्कड़ नाटकों में से एक माना जाता है, जिसे सबसे अधिक मंचित नाटक होने का सम्मान भी प्राप्त है। इस नाटक में पूंजीवादी व्यवस्था की आलोचना की गई है, और इसे सामाजिक जागरूकता बढ़ाने वाले नाटक के तौर पर जाना जाता है। शिवराम का यह नाटक ‘ जनता पागल हो गई है ‘ , भारतेंदु के ‘ अंधेर नगरी ‘ की तरह सदैव जीवंत और प्रासंगिक रहेगा

. ( गोपाल राठी , पिपरिया )





