डॉ. गीता
_"विवाह" शब्द में ३ वर्ण हैं - वि+वा+ह ! इन तीनों का अलग-अलग गहन अर्थ निम्नवत् है :_(१) “वि” के तीन अर्थ-
(क) वि = विस्तार
वर तथा वधू के दाम्पत्य बन्धन में बँधते ही एक का दो में "विस्तार" हो जाता है। वर व वधू दोनों पक्षों में एक दूसरे के सारे नाते रिस्तेदार मिल जाने से दोनों की नाते रिस्तेदारी में दो गुना "विस्तार" हो जाता है। विवाहोत्सव के परिणामस्वरूप वर-वधू दोनों के पास वस्त्राभूषणों, साज-सज्जा आदि का अच्छा-खासा विस्तार हो जाता है और उसमें दिन प्रतिदिन अनेकानेक घर गृहस्थी की छोटी बड़ी सुविधाओं का "विस्तार" होता चला जाता है।
_विवाह के १-२ वर्ष के बाद संतान प्राप्ति से, दो से तीन में और फिर आगे भी परिवार का "विस्तार" होते रहता है। विवाह होते ही दोनों की जिम्मेदारियों, चिंताओं व सुख-दु:खों में भी "विस्तार" हो जाता है, जो आगे विस्तृत होते रहता है।_(ख) वि = विवाद
दाम्पत्य जीवन में एक दूसरे की मत भिन्नता व अहंकार की अधिकता के कारण प्राय: छोटी बड़ी बातों को लेकर पति-पत्नी में “विवाद” होना स्वाभाविक होता है।
(ग) वि = विषाद
दाम्पत्य जीवन में आपसी “विवाद” के कारण या दोनों में किसी एक के, या दोनों के, या संतान के, या दोनों पक्षों के, परिवारों में किसी के रोगग्रस्त होने के कारण अथवा किसी काम में असफलता, कोई हानि, अपयश, निंदित होने, परिवार में या बाहर किसी से लड़ाई झगड़ा हो जाने, किसी प्रिय के बिछोह हो जाने आदि अनेकानेक कारणों से मानसिक “विषाद” की परिस्थितियाँ भी जीवनपर्यन्त आती रहती हैं।
(२) “वा” :
विवाह के दूसरे वर्ण “वा” में “व”+ (“ा” ) आ की मात्रा है।
“व” के दो अर्थ हैं-
(क) व = वर
(ख) व = वधू
“व” के साथ “आ” की मात्रा (ा) वर तथा वधू दोनों के परस्पर प्रेम, समर्पण व आत्मीय लगाव का प्रतीक है।
(३) “ह” :
‘विवाह” शब्द का जो तीसरा वर्ण-“ह” है, उसके दो परस्पर विरोधी अर्थ हैं – एक है “हर्षित” होना एवं दूसरा है- “हताश” होना!
इस “ह” में तथा इससे पहले “व” के साथ लगे “आ की मात्रा (ा)” इन दोनों में ही “विवाह संस्कार” व दाम्पत्य जीवन का सारा दारोमदार छिपा है!
सो कैसे ?
“विवाह” शब्द का जो बीच का वर्ण “वा” है इसमें “व” तो वर व वधू दोनों का प्रतीक है तथा आ की जो मात्रा (ा) है, वह वर तथा वधू दोनों के परस्पर प्रेम, समर्पण व आत्मीय लगाव का प्रतीक है।
जब तक वर व वधू दोनों इस आ की मात्रा(।) से परस्पर जुड़े रहते हैं तथा “वा” बने रहते हैं, तब तक उनके जीवन में वा+ह से मिलकर = “वाह”
(खुशी) बनी रहती है, चाहे उनके जीवन में “वि” से “विस्तार” की परिस्थिति हो, या “वि” से “विवाद” की परिस्थिति हो अथवा “वि” से “विषाद” की परिस्थिति हो!
परन्तु “व” से “वर” तथा “व” से “वधू” ने यदि आ की मात्रा (ा) (अर्थात् परस्पर प्रेम, समर्पण व आत्मीय लगाव) से “वा” बने हुए दम्पत्ति में से, किसी एक ने भी, स्वयं को अलग कर दिया तो वह “आ” की मात्रा (ा) “ह” से हर्षित करने के बजाय “ह” से पहले जुड़ कर उनके जीवन में “आह” और “हताशा” जोड़ देती है, जो कदम कदम पर उनके बीच कलह, क्लेश, लड़ाई-झगड़े, मार- पीट, हत्या आत्म- हत्या या विवाह- विच्छेद तक की दु:खद परिस्थितियाँ पैदा कर देती है!
अस्तु! भारतीय संस्कृति (हिन्दू धर्म) के प्रमुख २५ आधार तत्वों में एक यह जो “अतुलनीय विवाह पद्धति व दाम्पत्य जीवन” है.
इसमें “विवाह” शब्द के रहस्य व महत्व को भलीभाँति समझते हुए सफल दाम्पत्य जीवन जीने की कला को सीखना और जीवनभर उस पर कायम रहना हर महिला व पुरुष के लिए अनिवार्य है!
वास्तविक अर्थवता मे आज विवाह कहीं भी साकार नहीं है. विवाह प्रेम मे से नहीं निकल रहा है. विवाह प्यार नहीं, व्यापार का पर्याय है. विवाह यौन-भोग, यौन-शोषण का एक लाइसेंसी औज़ार मात्र है.
(चेतना विकास मिशन)





