शशिकांत गुप्ते
इनदिनों दो परिचित आपस मिलतें हैं, तब आपसी कुशलक्षेम की औपचारिकता के बाद संवाद नहीं बोला जाता है कि, आप कैसे हो? बल्कि यह पूछा जाता है अच्छेदिनों आनंद कैसे उठा रहे हो?
यह सवाल लाज़मी है। अच्छेदिनों को आकर आठ वर्ष हो गए हैं।
सीतारामजी ने बात को आगे बढाते हुए कहा,अच्छेदिनों को प्रमाणित करने के लिए पुख्ता सबूत है। *ना खाऊंगा ना खाने दूंगा* इस स्लोगन को यथार्थ में परिवर्तित होते देख रहें हैं।
अच्छेदिनों का एक ओर साक्ष्य है,पवित्र वस्त्र धारी धार्मिक व्यक्ति के राज्य में चौदह करोड़ लोगों को मुफ्त राशन वितरित किया जा रहा है। यह कितने गौरव की बात है।
विरोधी बार बार पूछतें थे। राम भगवान का मंदिर कब बनेगा,अब सारे विरोधियों का मुँह बन्द हो गया है। भगवानजी का दिव्य भव्य मंदिर निर्मित हो रहा है। भगवान की मूर्ति स्थापित होगी।
देशवासियों को पुण्य कमाने के लिए चारों धाम के बाद यह पाँचवा तीर्थ उपलब्ध होगा।
हिंदुस्तान का दिल कहलाने वाले दिल्ली के मुखिया ने तो पुण्यवान लोगों की संख्या में इज़ाफ़ा करने के लिए मंदिर निर्माण के पूर्व ही मुफ्त यात्रा की योजना घोषित कर दी है। दिल्ली के मुखिया तो मुफ्त वितरण में निपुण है। इनके द्वारा मुफ्त बिजली और पानी वितरण के आगे सारे विरोधी पानी पानी हो जातें हैं।
अच्छेदिनों के लिए प्रमाण जुटाना मतलब हाथ कंगन को आरसी दिखाने जैसा है?
महामारी के दौरान मुफ्त टीकाकरण उपलब्ध करवाया गया। मृतकों को जलसमाधि का पुण्य प्राप्त करवाया, जो लोग अपने परलोक सिधारे परिजनों को मुखग्नि देने में असमर्थ थे,उन्हें पवित्र सरिता से निकली बालुरेत में शवों को दफनाने की सुविधा उपलब्ध करवाई,शवों को ढाकने के लिए रामनामी चादरें मुहैया करवाई। इस पवित्र कार्य की भी विरोधियों ने बहुत आलोचना की।
सीतारामजी ने अपनी बात जारी रखतें हुए कहा,अपने देश में आईपीएल खेल करोडों,अरबों रुपयों खेलें जातें हैं और दूसरी ओर अपने ही देश में बीपीएल कार्डधारियों की संख्या करोडों में है। यह समानता भी हमें गौरवाविन्त करती है।
इसपर भी विरोधी अपना विरोध का राग अलापने में कम नहीं हैं।
अच्छेदिनों का एहसास दिलाने के लिए आठ वर्षों में शहरों, स्मारकों, के नाम बदलो अभियान बहुत ही सक्रियता से सम्पन्न किया जा रहा है। यह भी स्तुति करने योग्य कार्य है। लेकिन इस अभिनव कार्य का भी विरोधियों के द्वारा विरोध किया जाता है।
बेरोजगारों के लिए जो नायाब योजना प्रस्तुत की उसकी भी आलोचना हुई। यदि पकौड़े वाली योजना पर अमल होता तो आज भारत पकौड़े निर्मिति में विश्व ख्याति प्राप्त कर लेता,दुर्भाग्य से विरोधियों को अच्छी और योग्य सलाह मानना ही नहीं है।
आर्थिक स्थिति को लेकर भी विरोधी आलोचना करतें हैं। यह भूल जातें हैं कि, देश में कितनी तादाद में धार्मिक आयोजन हो रहें हैं। जितने भी धार्मिक आयोजन होतें हैं वे देश के धनकुबेरों द्वारा प्रायोजित होतें हैं। धर्म के प्रति श्रद्धा रखने वालें असंख्य श्रद्धालू तीर्थ यात्र कर रहें हैं। जब श्रद्धा जागृत होती है, तब खाना पीना रहने का खर्च कितना भी महंगा हो नगण्य हो जाता है।
यह सब देखते हुए आर्थिक स्थिति कहीं से कहीं तक कमजोर नहीं लगती है।
उपर्युक्त मुद्दों पर गम्भीरता से विचार विमर्श होना चाहिए। विरोधियों को समझना चाहिए।
आवो चलो एक सुर में गाएं।
*दुःख भरे दिन बीते रे भैया*
*अब सुख आयो रे*
*रंग जीवन में नया लायोरे*
साथ ही यह भी गाना चाहिए।
*फरिश्तों की नगरी में मै आ गया हूँ।*
सीतारामजी ने कहा कितना भी समझाओ विरोधी तो यही गाएंगे।
*कोई लौटा दे मेरे बीतें हुए दिन*
शशिकांत गुप्ते इंदौर





