शशिकांत गुप्ते
आज सीतारामजी स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को स्मरण तात्कालिक पत्रकारिता को याद कर रहे हैं।
स्वतंत्रता संग्राम में पत्रकारों के योगदान और शहादत लंबी फेहरिस्त है।
पत्रकारिता के महत्व लिए देश के प्रथम प्रधानमंत्री के यह सुविचार है।
प्रेस आधुनिक जीवन के महत्वपूर्ण अंगों में से एक है, खासकर लोकतंत्र में. प्रेस के पास जबरदस्त शक्तियां और जिम्मेदारियां हैं. प्रेस का सम्मान किया जाना चाहिए और उसका सहयोग भी
पंडित जवाहरलाल नेहरु
लोकतंत्र में चौथे स्तंभ की प्राथमिकता में बुनियादी समस्याएं होनी चाहिए। आम जन की पीड़ा को उजागर करना चाहिए।
आज बुनियादी सवाल तो हाशिए से ही नदारद हो गए हैं और नीतिहीन मुद्दों को प्रमुखता से दर्शाया जा रहा है,मतलब अनैतिक आचरण को ही तवज्जों दी जा रही है, मतलब High light किया जा रहा है।
शर्म की बात है।
सीतारामजी ने कहा मैं व्यंग्यकार हूं,व्यंग्य लिखना भी तो व्यवस्था के प्रति अपना शाब्दिक क्रोध प्रकट करना ही तो है।
सीतारामजी इतना कहने के बाद एक दम हास्य – व्यंग्य की मानसिकता में आ गए,और उन्होंने मुझे सन 1977 प्रदर्शित फिल्म चाचा भतीजा के गीत की कुछ पंक्तियां सुनाई। इस गीत के गीतकार हैं आनंद बक्षी
कोई माने या न माने सच कह गए हैं लोग पुराने
बुरे काम का बुरा नतीजा क्यों भाई चाचा हाँ भतीजे
जिसने एक रिश्ता तोड़ा वोसौ रिश्ते भी तोड़ेगा
जो अपनों को ठुकराएऔर गैरों से प्यार करे
अपने हाथों से अपनी वो कब्र तैयार करे
पर कितने रोज़ चलेगा धोखे से जो भी काम बना
अंत में पत्रकारिता पर व्यंग्य प्रकट करते निम्न अशआर प्रस्तुत है।
शायर ज़हीर ग़ाज़ीपुरी का शेर मौजू है।
बम फटे लोग मरे ख़ून बहा शहर लुटे
और क्या लिक्खा है अख़बार में आगे पढ़िए
आज सच्चाई को छिपाने की जो कोशिश की जा रही है। इस मुद्दे पर तंज कसते हुए शायर नुसरत ग्वालियारी का शेर प्रस्तुत है।
रात के लम्हात ख़ूनी दास्ताँ लिखते रहे
सुबह के अख़बार में हालात बेहतर हो गए
मैंने सीतारामजी को धन्यवाद दिया और सावधानी बरतने की सलाह दी।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





