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निक भास्कर की शुरुआती पत्रकारिता, और एक विवादित कथा का मीडिया-पाठ

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(नैवेद्य पुरोहित)

भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में कुछ खबरें ऐसी होती हैं जो सूचना देने के साथ अपने समय की राजनीति, समाज और मीडिया के रिश्तों को भी उजागर करती हैं। 1980 के दशक का शाहबानो केस ऐसा ही एक प्रसंग था जिसने भारतीय राजनीति, न्यायपालिका और मीडिया तीनों को एक साथ चर्चा के केंद्र में ला दिया था। इसी दौर में इंदौर से प्रकाशित दैनिक भास्कर के फ्रंट पेज पर दिवंगत सुरेश राठौर साहब एवं स्व. विमल गुप्ता जी की बाइलाइन से छपी एक रिपोर्ट उस समय के विमर्श में एक अलग और विवादित दृष्टिकोण प्रस्तुत करती दिखाई देती है। यहां मैं उनकी रिपोर्ट को जस का तस लिख रहा हूं:- 

शाहबानो – कल तक न्याय के लिए चौखटें चूमती, आज सत्ता की वहशी 

(सुरेश राठौर एवं विमल गुप्ता द्वारा)

इंदौर, ३ अप्रैल। शाहबानो की यह राजनीतिक हवस थी खुद को सांसद बनने का मोह! किसी न किसी तरह राज्यसभा की सीट पाने के लिए उस वृद्ध महिला ने अपनी ही बहू का इस्तेमाल करने की कोशिश की। एक अंतराल से अपने लिए न्याय की भीख के लिए झोली फैलाने वाली शाहबानो सत्ता की भूख मिटाने के लिए, आज कुछ भी करने के लिए घूमती औरत है। उसकी इसी लालसा ने उसकी बहू शेहला को आज उसके घर से निकलवा दिया। न्याय के लिए कनारा तलाशती शाहबानो ने अपने ही घर के अमन के चरागों को तीली दिखा दी। शेहला की त्रासदी और अपने घर से दूर होने की कहानी शाहबानो की खुदगर्जी से पैदा हुई एक कहानी है।

शाहबानो ने ११ मार्च की रात पान बहार का डिब्बा नीचे गिरकर बिखरने जैसी मामूली सी बात को लेकर अपनी बहू शेहला को लात घूसो से मारपीट कर घर से निकाल दिया। शेहला बेचारी इन दिनों अपने दो मासूमों के साथ अपने पिता कुरैशी के घर दिन गुज़ार रही है। नियाज अहमद कुरेशी केंद्रीय उत्पाद शुल्क निरीक्षक है।

घटना की रात शाहबानो और उसके पुत्र जमील अहमद ने जो शेहला का पति है। दोनों ने मिलकर मारपीट की और जब उसे घर से निकाल दरवाजे भीतर से बंद कर लिए तो शेहला गली से निकल कर सड़क पर आई। सड़क पर ऑटो रिक्शा चालक इज्जत नूर ने अपने रिक्शा नंबर एमपी आई ४२९४ के साथ खड़ा था। शेहला को बदहवास और घबराई हुई हालत में देखकर उसने महज ही पूछ लिया क्या बात है भाभी खैरियत तो है? शेहला उसके जवाब में केवल इतना ही बुदबुदा पाई कि मेरी मां की तबीयत ठीक नहीं है मुझे मेरे अब्बा हुजूर के घर (खजराना) पहुंचा दो, ‘भैया’।

इज्जत नूर शेहला और उसके दोनों बच्चों को जूना रिसाला चौराहे से रिक्शा में बैठाकर उसके पिता नियाज़ अहमद के घर ले गया। वहां पहुंचते ही शेहला धड़ाम से जमीन पर जा गिरी नूर यह दृश्य देख ही रहा था कि नियाज अहमद और उनके छोटे भाई राशिद कुरैशी जो उनसे मुलाकात करने गए थे। उसी हालत में शेहला को इज्जत नूर के रिक्शा में बैठकर अपने पुश्तैनी मकान ‘मल्हार पलटन’ ले आए। इस बीच शेहला के चाचा राशिद कुरैशी ने घटना की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज करने की पेशकश की। लेकिन नियाज अहमद ने इसमें इनकार करते हुए कहा कि इत्रल्लाह सब्र माअस्साबैरिन अल्लाह (अल्लाह सब्र करने वालों के साथ होता है)। उन्होंने कहा मेरी बेटी शेहला जिंदा आ गई खुदा का शुक्र है वरना ना जाने क्या गुजरता शेहला के साथ इतना कहकर इस समय नियाज अहमद ने दो रकात नमाज शुक्राने की पढ़ी।

शेहला के निकाह की दास्तां भी महत्वपूर्ण है शेहला के परिवार वाले उसका निकाह जमील अहमद के साथ करना ही नहीं चाहते थे। इसकी दो वजहें थी एक तो शेहला और जमील की आयु में १५-१६ वर्ष का अंतर दूसरा उन्होंने शाहबानो के बारे में पहले ही पता था। शाहबानो ने किसी तरह शेहला के परिवार पर दबाव डाला और १७ जनवरी ८१ को अपने ३६ वर्ष बेटे जमील के साथ मासूम शेहला का निकाह कर लिया। निकाह के मात्र ६ माह बाद ही शेहला के साथ शाहबानो और जमील अहमद ने अपमानजनक व्यवहार शुरू कर दिया। पहले सब कुछ सहती रही और निकाह के ठीक ९ माह बाद नवंबर ८१ में उसने एक बेटे को जन्म दिया जिसका नाम शकील है और आज वह ४ वर्ष का हो गया है। मां बनने के बाद भी शेहला के साथ होने वाला अपमानजनक व्यवहार धीरे-धीरे मारपीट में परिवर्तित होता गया। 

शेहला बताती है कि इसकी वजह यह थी कि जब शाहबानो प्रकरण सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली और इंदौर स्थित न्यायालय में चल रहा था तो उसमें काफी कुछ खर्च हो रहा था। इसलिए शाहबानो और जमील उस पर अपने पिता से आर्थिक सहयोग दिलाने का दबाव बना रहे थे। इतना ही नहीं इन लोगों ने उसे यहां तक कहा कि उसके पिता नियाज अहमद सेंट्रल एक्साइज इंस्पेक्टर है उनके विभाग में अनेक रंगीन टीवी बरामद होते रहते हैं। कुछ घर आ ही जाते होंगे उनमें से एक रंगीन टीवी लेकर आए। 

जब सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय शाहबानो के पक्ष में हो गया और शाहबानो हिंदुस्तान ही नहीं अपितु अखबारों तथा पत्रिकाओं की सुर्खियों में आकर विश्व में चर्चित हो गई तो उसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा जाग उठी। और वह राज्यसभा में जाने के लिए हाथ पैर मारने लगी। इसके साथ ही शेहला का पति जमील अहमद जो सिटीजन अर्बन कोऑपरेटिव बैंक में कार्यरत है कांग्रेस से विधानसभा की टिकट प्राप्त करने के ख्वाब देखने लगा। 

अपनी इस महत्वाकांक्षा को संजोकर शाहबानो और जमील अहमद ने दिल्ली यात्रा की। शेहला बताती है कि दिल्ली में शाहबानो और जमील ने राजनीतिक लाभ उठाने की गरज में उसे आगे धकेल कर उसका उपयोग करने की कोशिश भी की। और जब वह इसके लिए तैयार नहीं हुई तो इन लोगों ने दिल्ली स्थित म.प्र भवन में भी उसके साथ बुरी तरह मारपीट की। यह बात है फरवरी ८६ की जब शाहबानो राज्य सरकार के खर्चे पर स्वास्थ्य परीक्षण के लिए दिल्ली गई थी। 

जब दिल्ली में शाहबानो स्वास्थ्य परीक्षण के साथ-साथ राजनीतिक जमावट कर रही थी। तब जमील अपनी पत्नी शेहला को यह कहकर इंदौर आया था कि शाहबानो जहां जाए तुम भी मेकअप करके साथ जाना। शेहला ने इसका विरोध किया था। वो बताती है कि गत अगस्त माह में दिल्ली से लौटने के बाद इन लोगों ने मुझे इतनी बुरी तरह पीटा था कि मेरा पूरा शरीर नीला पड़ गया था। उस समय मेरा दोष केवल इतना था कि खाना परोसने में थोड़ी देर हो गई थी। यह सब के बावजूद मैंने कभी अपने माता-पिता को उनके अत्याचारों की जानकारी नहीं दी थी। 

शेहला की मां को उसकी पिटाई की पहली बार जानकारी उस घर में निकलने के करीब १५ दिन पूर्व उस समय मिली थी। जब वह मल्हार पलटन में अपने देवर राशिद कुरैशी के घर से लौटते समय शेहला से मिलने अचानक उसके घर पहुंची थी। उस दिन शाहबानो और जमील अहमद ने शेहला की मां को आश्वस्त किया था कि भविष्य में शेहला के साथ कभी मारपीट नहीं करेंगे। इसके बाद भी इन लोगों ने शेहला के साथ मारपीट गाली गलौज करना बंद नहीं किया और ११ मार्च की रात शेहला को शाहबानो ने हरामजादी, कुत्तिया, सूअर की बच्ची जैसी गंदी गालियां दी। तथा जमील ने बाल पकड़कर तीन कमरों से घसीटते हुए शेहला को निकालते समय इतना तक कहा कि, चली जा यहां से मुंह काला कर नहीं तो तेरे हाथ पैर तोड़ दूंगा। उसने नाक काटने की धमकी दी उस समय शहला का ४ वर्षीय बेटा शकील यह सब देखकर रो रहा था। आठ माह की मासूम बेटी आयशा भी रो रही थी और शाहबानो मुंह में पान दबाई शॉल उठाकर पास ही किसी रिश्तेदार के घर बतियाने के लिए खिसक गई थी। लेकिन जब शाहबानो के सलाहकारों ने उन्हें समझाया कि शेहला को यदि वापस घर मना कर नहीं लाया गया तो बहुत बदनामी होगी और उन्हें (शाहबानो) को राज्यसभा का तथा जमील अहमद को विधानसभा का टिकट नहीं मिल पाएगा। इस सलाह पर 21 मार्च को जमील अहमद स्वयं शेहला को मनाने के लिए ससुराल पहुंचा लेकिन उनके ससुर नियाज़ अहमद ने उनसे कोई बात नहीं की। जमील वहां से निराश होकर लौटा तथा तीसरे दिन २३ मार्च और २४ मार्च को मुस्लिम समाज के प्रमुख मुफ्ती ए मालवा हबीब यार खान, हाजी अब्दुल सफर नूरी तथा आर्किटेक्ट कुरैशी।

इसके आगे की रिपोर्ट मेरे पास उपलब्ध नहीं है। फिर भी यह कहा जा सकता है कि इस रिपोर्ट ने उस दौर की पत्रकारिता की कार्यशैली, साहस और वैचारिक टकराव का उत्कृष्ट उदाहरण पेश किया है। उस समय के प्रचलित नैरेटिव से अलग एक दावा सामने रखा। यह दृष्टिकोण उस समय के मुख्यधारा विमर्श से बहुत अलग था, क्योंकि अधिकांश मीडिया संस्थान उस मामले को केवल न्यायिक और धार्मिक विवाद के रूप में प्रस्तुत कर रहे थे। ऐसी रिपोर्टें लिखना बहुत जोखिम भरा था क्योंकि मामला राष्ट्रीय स्तर पर संवेदनशील था। राजनीतिक और धार्मिक दबाव दोनों तरफ से मौजूद थे। किसी भी खबर पर तीखी प्रतिक्रिया आ सकती थी। इसके बावजूद यह रिपोर्ट फ्रंट पेज पर प्रकाशित हुई, जो यह दिखाती है कि उस समय की संपादकीय नीति में भी वैकल्पिक दृष्टिकोण को भी जगह दी जाती थी।

दैनिक भास्कर के शुरुआती दौर की पत्रकारिता

इंदौर में भास्कर के शुरुआती वर्षों में पत्रकारों की एक ऐसी टीम थी जो सीमित संसाधनों के बावजूद साहसिक रिपोर्टिंग के लिए जानी जाती थी। उस दौर में खबरें केवल प्रेस रिलीज़ या राजनीतिक बयान तक सीमित नहीं रहती थीं। रिपोर्टर व्यक्तिगत स्तर पर जांच-पड़ताल करते थे, लोगों से मिलते थे और कई बार विवादित तथ्यों को भी सामने लाते थे। इसी परंपरा में स्वर्गीय सुरेश राठौर साहब जैसे पत्रकारों की रिपोर्टें उस समय की पत्रकारिता की जीवंतता का उदाहरण बनती हैं।

(अगली किस्त में पढ़िए: किस्सा एक ऐसी रिपोर्ट का जो भ्रष्टाचार और ग्रामीण संघर्ष की जीती-जागती तस्वीर है। उस रिपोर्ट में एक जगह शब्दों के चयन और तीखे प्रहार वाली लेखन शैली को पढ़कर ऐसा आभास हुआ मानो यह मेरे दादाजी की ही लेखनी हो, उनकी कलम की वो परिचित धार इसमें साफ महसूस होगी। लेकिन, जब नजर ‘बायलाइन’ पर जाती है, तो वहाँ स्तंभ ‘आस-पास’ के नीचे दिवगंत पत्रकार सुरेश राठौर साहब का नाम दर्ज मिलता है। शायद यही उस दौर की पत्रकारिता की खूबसूरती थी जहाँ शब्द साझा थे, सरोकार साझा थे और मिशन था सिर्फ और सिर्फ ज़मीनी मुद्दों को उठाना।) 

Ramswaroop Mantri

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