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*टूटे विकास मॉडल की दर्शनीय लौ है  नाइट क्लब में लगी आग*

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अल्बर्टीना अल्मीडा

बर्च बाइ रोमियो लेन नाइट क्लब में लगी आग, जिसने 25 जानें ले लीं भारत के उस टूटे विकास मॉडल की दर्शनीय लौ है जो पलायन को मजबूर करता है, भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है और शक्तिशाली लोगों की सेवा करता है। एक प्रवासी कर्मचारी के अंतिम संस्कार में आहों और कराहों के साथ-साथ उसके गृह प्रदेश में खराब सड़कों के और नौकरियों के अभाव की भी बातें होती हैं। हालांकि, अनगिनत प्रवासी श्रमिकों की यही कहानी है। 

गोवा में कई प्रवासी श्रमिक झोपड़ियों में रहते हैं, उनके हालात मानसून में और बिगड़ जाते हैं। हाल में बिहार चुनाव के पहले कुछ ने इस तरह अपनी भड़ास निकाली, “हमारे पास चावल, गेहूं, दाल, चना, मसूर, मटर, मूंग हैं – तुम्हारी तरह केवल चावल और नारियल नहीं। और मछली भी है रोहू और दूसरी ताज़ा पानी की मछली।”

“फिर पलायन क्यों?” “क्योंकि हमारे पास रोजगार नहीं है।” एक श्रमिक जो बिहार में मछुआरा था, ने समझाया, “वहाँ कर जमींदारी है। हम संभाल नहीं पाए और दूसरों ने हमारा पानी छीन लिया।” 

यह इस स्तर की पहली त्रासदी नहीं है। 4 जनवरी 2014 को चौड़ी कानाकोना में रूबी रेज़िडन्सी इमारत गिरने में 31 श्रमिक, अधिकांश प्रवासी, मारे गए थे। कई झारखंड से थे। गोवा में वहाँ से काफी श्रमिक हैं। परिवारों को न्याय में देरी से भुगतना पड़ा। इसके बावजूद, उस घटना को खबरों में उतनी जगह नहीं मिली क्योंकि पीड़ित गरीब श्रमिक थे, पर्यटक नहीं, वह लोग नहीं जो नाइट क्लब जाते हों। 

जिम्मेदारी तय करने के लिए कमिशन ऑफ इन्क्वायरी ऐक्ट के तहत गठित झा आयोग ने सरंचनात्मक खामियों,  टाउन एंड कन्ट्री प्लैनिंग विभाग और स्थानीय निकाय इकाई की प्रशासनिक खामियों का हवाला दिया। यह रिपोर्ट कहीं दबी पड़ी है। कुछ अधिकारियों को निलंबित किया गया, फिर बहाल किया गया। अब अर्पोरा आग के लिए मैजिस्ट्रैटी जांच के आदेश दिए गया है। क्या इसका भी वही हश्र होगा? इन मौतों, जिन्हें संस्थानिक हत्याएं कहा जाना चाहिए, के लिए जिम्मेदार कौन है? 

यहीं “बाहरियों” के सवाल पर दोबारा गौर करने की जरूरत है। गरीब प्रवासियों को बाहरी करार दिया जाता है लेकिन वास्तविक बाहरी वह शक्तिसंपन्न लोग हैं जो दागी पैसा लाते हैं (और इनमें कुछ स्थानीय बड़े कारोबारी भी शामिल हैं) और एक समय अपनी ईमानदारी के लिए मशहूर गोवा की प्रशासनिक प्रणालियों को भ्रष्ट करते हैं।

दिल्ली के लूथरा, बर्च बाइ रोमियो लेन के मालिकों, ने ज़ोनिंग, ध्वनि प्रदूषण और लाइसेन्सिंग कानूनों का उल्लंघन किया है, सत्ता में शामिल लोगों के साथ मिलीभगत में। मंजूरियाँ दी गईं, नियम मोड़े गए, जवाबदेही से बचा गया। 

गोवा में जो लोग यह मुद्दे उठाते हैं उन्हें सुविधाजनक तरीके से ज़ेनोफ़ोबिक करार दिया जाता है। गोवावासी जो पुर्तगाली नागरिकता के तहत आए -चाहे मेजबान स्थल पर हों या गोवा में – अपने ओसीआई कार्ड खोने के खतरे को लेकर विकास नीतियों के खिलाफ आवाज नहीं उठा सकते। नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 के तहत रद्द करने की प्रक्रिया का विचार प्रतिबंधकारक है।

गोवा में प्रवासी श्रमिक को भी इसी तरह खामोश किया जाता है। सपोर्ट सिस्टम न होने के कारण वह गोवा श्रमिकों के मुकाबले कमज़ोर पड़ते दिखाई देते हैं, जो उन्हें रोजगार के अवसर या श्रम स्तर कम करने के वाला मानते हैं। इस दरार का लाभ समृद्ध प्रवासियों और उनके राजनीतिक सरंक्षकों को मिलता है और यह निरंकुश विस्तार पाते हैं। 

इस तरह अर्पोरा आग महज स्थानीय त्रासदी नहीं है। यह राष्ट्रीय विकास नीति की विफलताएं, प्रशासन के भ्रष्टाचार और सबसे कमजोर के शोषण को दिखाने वाला आईना है। प्रवासी श्रमिक खामोश मौत मरते हैं और आयोगों की सुझाई जवाबदेही कहीं दफन कर दी जाती है। 

(अल्बर्टीना अल्मीडा का लेख इंडियन एक्सप्रेस से साभार। अनुवाद : महेश राजपूत)           

Ramswaroop Mantri

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