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*कोई घाटे का सौदा नहीं : नेकियां कमाईये!*

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       ~ राजेंद्र शुक्ला

    “नेकियों की दौलत कमाना महंगा लगता है, यह काम घाटे का सौदा लगता है : लेकिन सिर्फ़ लगता है, है नहीं. नेकियां इस जन्म में सुकून- शांति देती हैं और अगले जन्म के लिए भी उम्दा ऐटमॉस्फीयर क्रिएटर सावित होती हैं. मतलब नेकियों की कमाई हमेशा साथ रहती है : इस जिंदगी के साथ भी, इस जिंदगी के बाद भी. सम्पदा = जो साथ रहे सर्वदा. तो यही वास्तविक सम्पदा है.”

              – डॉ. विकास मानव

       नेकी की हर जगह सराहना होती है, किन्तु वह सज्जनता और भी अधिक सराहनीय है, जिसके साथ नम्रता जुड़ी हुई हो। उद्दण्डता ओछे लोग अपनाते हैं। अहंकार व्यक्त करके किसी का घटियापन ही सिद्ध होता है। नम्रता को दीनता नहीं मानना चाहिए, उसके साथ ऐसी मानवी गरिमा का समावेश होता है, जो निरन्तर मित्रों, प्रशंसकों और सहयोगियों की संख्या बढ़ाती चलती है।

     इसके विपरीत उद्दण्ड लोग अपना गौरव गँवाते और शत्रु समुदाय बढ़ाते चले जाते हैं।

       टेनीसन ने सही कहा है कि “नम्रता एक कल्पवृक्ष है, जिस पर सद्गुणों की टहनियाँ निकलती और विभूतियों की पत्तियांँ उगती हैं।” वेकन कहते थे- “बुरा व्यक्ति तब और भी अधिक बुरा हो जाता है, जब वह सज्जन बनने का ढोंग करता है।”

       सन्त वासवानी कहते थे कि “भयावह सत्य वह नहीं जो वाणी से बोला जाता है, वरन् वह है जो कथन के विपरीत आचरण करके लोगों को भरमाने के लिए प्रस्तुत किया जाता है।” जूलियस कहते थे-” ईमानदार व्यक्ति धूर्तों द्वारा ठगा जा सकता है, पर इसके बदले दूसरों को ठगने का प्रयत्न न करेगा।” 

      परमार्थ के लिए धन सम्पदा का होना आवश्यक नहीं। श्रम, समय, प्रभाव, चिन्तन और परामर्श जैसे कितने ही आधार हैं, जिनकी सहायता से दूसरों की प्रचुर सेवा साधना संभव हो सकती है। ईश्वरप्रदत्त वैभव मनुष्य की काया और चेतना में प्रचुर परिमाण में विद्यमान है। इसे पुण्य प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त करते रह सकना हर उदारचेता के लिए सहज संभव हो सकता है।

       धन भी भ्रम की परिणति है‌। जितना उपकार आर्थिक अनुदानों से हो सकता है, उससे अधिक अनेक गुणा बौद्धिक अनुदानों से हो सकता है। परामर्श और सहयोग का महत्व भी आर्थिक सहायता से किसी प्रकार कम नहीं। लोग आर्थिक कठिनाइयों से ही दुःखी नहीं है। अधिकांँश ऐसे हैं जो भटकाव या अत्याचार से ग्रसित होकर कष्ट सहते हैं।

       नेकी का बदला हाथों-हाथ मिलता है। जिसके साथ भलाई की गई है संभव है वह बदला लेने की स्थिति में न हो, तो भी उस सहायता को देखकर अनेकों को अपनी सज्जनता का पता चलेगा और ये अवसर पाने पर अपने साथ भलाई का ही व्यवहार करेंगे। फिर अपनी आत्मा को जो भी सन्तोष भरी प्रसन्नता होती है, वह भी कुछ कम नहीं कम महत्व की नहीं।

       प्रसन्नता खरीदने के लिए कुछ न कुछ खर्च करना पड़ता है। बिना खर्च किए तो यहांँ किसी को कुछ भी नहीं मिलेगा। यहाँ तक कि बुराई भी श्रम लगाने और समय गँवाने से ही मिलती है। ऐसी दशा में यदि नेकी के निमित्त समय, श्रम या धन लगाया गया है और उसके बदले अपना मनोबल बढ़ा है, तो यह घाटे का सौदा नहीं है।

        भलाई वह बीज है, जो उगे बिना रहता नहीं, उस पर अच्छे और मीठे फल आते हैं, भले ही उसमें कुछ देर लगे।

Ramswaroop Mantri

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