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सरकार कोई भी चलाए,राजसत्ता किसी जाति या धर्म की नहीं होती

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*दीपक गौतम

कुछ लोग प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री की कुर्सी को ही राजसत्ता की असली कुर्सी समझते हैं। दलित मुख्यमंत्री/प्रधानमंत्री बन जाता है तो उस सरकार को दलित की सरकार समझते हैं। पिछड़ी जाति का मुख्यमंत्री/प्रधानमंत्री बन जाने पर पिछड़ों की सरकार समझते हैं तथा सवर्ण मुख्यमंत्री/प्रधानमंत्री बन जाने पर उसकी सरकार को सवर्णों की सरकार समझते हैं और मुस्लिम प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बन जाने पर मुस्लिमों की सरकार समझते हैं। ऐसा समझने वाले लोग नासमझ होते हैं। दरअसल राज्यसत्ता को संचालित करने वाली सरकार कोई भी चलाए, मगर राजसत्ता कभी किसी जाति या धर्म की नहीं होती बल्कि राजसत्ता किसी ना किसी वर्ग की ही होती है। जैसे किसी दौर में दास मालिक वर्ग की राजसत्ता थी और उसके बाद में सामन्ती व्यवस्था में राजे-रजवाड़ों और नवाबों की राजसत्ता थी। आज के दौर में कहीं पूंजीपति वर्ग की राजसत्ता है, तो कहीं सर्वहारा वर्ग (मजदूर वर्ग) की राजसत्ता चल रही है।

भारत ही नहीं वरन पूरी दुनिया में दो वर्ग हैं एक शोषक दूसरा शोषित, यानी एक अमीर दूसरा गरीब। इन्हीं दोनों वर्गों में से एक की ही राजसत्ता होती है। राजसत्ता की कुर्सी पर किसी भी जाति या धर्म का कोई भी व्यक्ति बैठ जाए, वर्गीय समाज में राजसत्ता अनिवार्य रूप से किसी ना किसी वर्ग की ही रहेगी। जिस राजसत्ता की प्राप्ति के लिए पूंजीपति वर्ग जनता के लोकतंत्र का नगाड़ा पीट रहा है। पहले उस राजसत्ता की हकीकत को समझना जरूरी है कि क्या मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की कुर्सी में वास्तविक सत्ता है जिसके लिए वह जनता के दिलो-दिमाग में गाय, गोबर, गंगा, हिन्दू-मुसलमान, क्षेत्रवाद, संप्रदायवाद, जातिवाद… का जहर घोल रहा है। जाति, धर्म, छेत्र, भाषा, रंग, नस्ल… के नाम पर मेहनतकश जनता में फूट डालने वाली संसद मार्गी सभी राजनीतिक पार्टियों का मुख्य लक्ष्य राजसत्ता ही है और इस राजसत्ता की प्राप्ति के लिये ये शासक वर्ग किसी भी हद तक चला जाता है और इसके दूसरी तरफ बहुसंख्यक जनता को अपने मुख्य लक्ष्य की समझदारी ही नहीं है अर्थात उन्हें नहीं मालूम है कि राजसत्ता है क्या? 

इन बहुसंख्यक जनता को मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की कुर्सी ही राजसत्ता लगती है क्योंकि यही मेहनतकश जनता को बताया और पढ़ाया जाता है। पर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की कुर्सी नकली राजसत्ता है। यदि हमें अपने मुख्य लक्ष्य की पहचान ही ना हो तो हम अर्जुन की तरह मछली की आंख पर निशाना किस पर लगाएंगे। अतः जाति धर्म के नाम पर ज्यादा उछल कूद करने की बजाय यह समझना जरूरी है कि राजसत्ता है क्या? लेनिन के शब्दों में- “राजसत्ता वर्गीय दमन का हथियार है।”

मौजूदा राजसत्ता बड़े-बड़े पूंजीपतियों की दलाली करने वाले पूंजीपतियों/सामंतों और नौकरशाहों की कठपुतली होती है। वह जैसे चाहे पूंजीपतियों के इशारे पर नचाता रहता है। राजसत्ता की असली चाभी उत्पादन के मुख्य संसाधनों (जल, जंगल, जमीन, कल-कारखाना, खान-खदान, स्कूल, अस्पताल, यातायात के संसाधन, बीमा, बैंक…) के मालिकाने में है। इन उत्पादन के संसाधनों पर जिसका मालिकाना होता है राजसत्ता उसी की होती है और इन उत्पादन के संसाधनों का मालिक ही मुख्यमंत्री/प्रधानमंत्री को अपने हिसाब से संचालित करता है।

यह लेख नया अभियान मासिक पत्रिका के मार्च-अप्रैल संयुक्ताक से लिया गया है।*

Ramswaroop Mantri

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