शशिकांत गुप्ते
मानवीयता की सीख देने वाला कोई भी धर्मशास्त्र, शस्त्र उठाने के लिए नहीं कहता है। शास्त्र अपने आप में एक बहुत बड़ा मानवीय शस्त्र है,बशर्ते धर्मशास्त्र के अनुसार मानव आचरण करने लग जाए।
पन्द्रहवी सदी के आध्यात्मिक संत नरसिंह मेंहता जी का भजन है।
यह भजन गांधीजी को बहुत प्रिय था।
वैष्णव जन तो तेने कहिये जे
पीड़ परायी जाणे रे
पर दुख्खे उपकार करे तोये
मन अभिमान ना आणे रे
वैष्णव जन तो तेने कहिये जे
पीड़ परायी जाणे रे
सकळ लोक मान सहुने वंदे
नींदा न करे केनी रे
संत नरसिंह मेहताजी के भजन में जो मानवीय आचरण की उपदेशात्मक सीख है,इसी सीख को संत कबीरसाहब अपने दोहे के माध्यम से कहतें है।
कबीर सोई पीर है, जो जाने पर पीर।
जो पर पीर न जानई, सो काफिर बेपीर।।
भावार्थ: संत कबीर कहते हैं कि सच्चा संत (पीर) वही है,जो दूसरे की पीड़ा को जानता हो, उसे समझता हो | जो दूसरे के दुःख को नहीं समझते, वे बेदर्द हैं, निष्ठुर हैं और काफिर हैं |
संतो ने धर्मशास्त्र के आधार पर स्वयं मानवीय आचरण करते हुए, आमजन को उपदेश दिया है।
महाराष्ट्र के संत इस सूक्ति का उच्चारण अपने प्रवचनों दौरान हमेशा करते थे।
तात्पर्य संतो के कथनी करनी अंतर नहीं होता है।4त
आधी केले मग सांगितले
अर्थात दूसरों को उपदेश देने के पूर्व संतो ने स्वयं आचरण किया,और बादमे उपदेश दिया।
आध्यात्मिक संतो ने हमेशा मानवीय आचरण की सीख दी है।
संत आमजन में संवेदनाएं जागृत करने के लिए प्रयत्नशील रहतें हैं।
आध्यात्मिक संत सभी धर्मों के धर्मग्रन्थ पढतें हैं। संत सभी धर्मग्रन्थो में लिखे उपदेशात्मक तथ्यों को अपने प्रवचनों दौरान संदर्भ के साथ सम्मिलित करतें है।
मज़हब नहीं सिखाता आपसे में बेर रखना।
विनोबाजी कहते थे।
कभी भी एक धर्म की दूसरें धर्म लड़ाई नहीं होती है,हमेशा अधर्म की धर्म से लड़ाई होती है।
इसी बात को उर्दू भाषा में इस तरह कहा है।
हमेशा वहशते आपस मे टकराती है,तहजीबे कभी भी नहीं टकराती है।
उपर्युक्त कथन का सारांश यही है कि, कोई भी धर्म कभी भी हिंसा की अनुमति नहीं देता है।
हिंसा करना और हिंसा के लिए लोगों को उकसाना कायरता है।
उक्त कथन के लिए महात्मा गांधीजी स्वयं जींवत उदाहरण है।
इकहरे शरीर के कदकाठी के व्यक्ति सत्य और अहिँसा को प्रेरित करने वालें विचारों से कट्टरपंथी इतने भयभीत थे कि, कट्टरपंथी मानसिकता ने गांधीजी पर कायराना हमला कर गांधीजी के शरीर की हत्या की।
गांधीजी के विचार हमेशा जिंदा रहेंगे।
जब मानवों में संवेदनाएं खत्म हो जाती तब वह वहशियाना आचरण करने लगता है। हिंसा वहशी आचरण ही तो है।
सिर्फ वेशभूषा बनाकर और पवित्र कहलाने वाले रंग के वस्त्र परिधान करने से कोई धार्मिक नहीं हो सकता है।
कोई भी धार्मिक व्यक्ति कभी भी हिंसा की बात करेगा ही नहीं।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





