(यथास्थिति पर एक करारा व्यंग्य)
-तेजपाल सिंह ‘तेज’
अक्सर बातचीत में यह सुनने को मिलता है कि देश में कुछ नहीं हो रहा। लोग कहते हैं कि खबरों में कुछ नया नहीं है, सब पहले जैसा ही चल रहा है। लेकिन जब हम ध्यान से देखते हैं, तो साफ पता चलता है कि देश में बहुत कुछ हो रहा है। फर्क बस इतना है कि अब चीजें इतनी तेजी से और इतनी बड़ी मात्रा में हो रही हैं कि लोग उन्हें सामान्य मानने लगे हैं। आज की राजनीति और शासन व्यवस्था की एक बड़ी विशेषता यह है कि वर्तमान की समस्याओं पर बात कम होती है। इतिहास और भविष्य की बातें ज्यादा की जाती हैं। इससे आम आदमी का ध्यान आज की घटनाओं से हट जाता है।
बड़े घोटाले और अलग-अलग न्याय:
देश में आर्थिक अपराधों को लेकर न्याय का तरीका सबके लिए एक जैसा नहीं दिखता। बड़े उद्योगपति और कारोबारी हजारों करोड़ रुपये की धोखाधड़ी के बाद रकम वापस कर राहत पा लेते हैं। अदालतें कई बार कहती हैं कि अगर पैसा वापस आ गया है तो मुकदमा खत्म किया जा सकता है। लेकिन दूसरी तरफ आम आदमी के लिए हालात बिल्कुल अलग हैं। अगर कोई व्यक्ति बैंक की किश्त नहीं चुका पाता, तो उसके लिए कानूनी प्रक्रिया लंबी और कड़ी हो जाती है। इससे लोगों के मन में यह सवाल पैदा होता है कि क्या कानून सबके लिए बराबर है या नहीं।
व्यवस्था में ढील और रोजमर्रा की धोखाधड़ी:
देश में कई जगह ऐसी घटनाएँ सामने आई हैं जो बताती हैं कि सरकारी और सार्वजनिक संस्थाओं में निगरानी कमजोर हो गई है। कहीं बिना डिग्री वाले लोग डॉक्टर बनकर इलाज करते रहे, तो कहीं करोड़ों रुपये की खरीदारी में वर्षों तक किसी ने गुणवत्ता की जांच नहीं की। ये घटनाएँ अकेली नहीं हैं। ये एक बड़े सिस्टम की ओर इशारा करती हैं, जहाँ गलत काम लंबे समय तक पकड़ में नहीं आते, क्योंकि देखने और पूछने वाला कोई नहीं होता।
चंदा, ठेके और राजनीति का रिश्ता:
राजनीतिक चंदे को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। कई रिपोर्टों में यह सामने आया है कि जिन कंपनियों और ठेकेदारों को सरकारी ठेके मिले, उन्हीं से राजनीतिक दलों को मोटा चंदा भी मिला। जब सत्ता में बैठी पार्टी के पास हजारों करोड़ रुपये का फंड हो और विपक्ष के पास उसका बहुत छोटा हिस्सा, तो चुनाव बराबरी का कैसे हो सकता है? यह स्थिति लोकतंत्र की बुनियादी भावना के खिलाफ जाती है।
पैसा बढ़ रहा है, लेकिन सबके लिए नहीं:
देश में अमीर और गरीब के बीच की खाई लगातार बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट बताती हैं कि देश की ज्यादातर संपत्ति बहुत कम लोगों के पास सिमटती जा रही है। आम लोगों की आय बढ़ने की रफ्तार बहुत धीमी है। इसका असर साफ दिखाई देता है। पढ़ाई, इलाज और रोज़मर्रा की ज़रूरतें आम आदमी के लिए महंगी होती जा रही हैं, जबकि बड़े वर्ग की संपत्ति तेजी से बढ़ रही है।
प्रदूषण और सच से बचने की कोशिश:
वायु प्रदूषण आज एक गंभीर समस्या बन चुका है। डॉक्टर साफ-साफ कह रहे हैं कि प्रदूषण की वजह से बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों की हालत बिगड़ रही है। इसके बावजूद सरकार की ओर से अक्सर ऐसे बयान आते हैं जिनसे समस्या की गंभीरता कम करके दिखाई जाती है। जब प्रदूषण के आंकड़े डराने लगते हैं, तो ध्यान समाधान पर नहीं बल्कि मापने के तरीकों पर चला जाता है। इससे आम आदमी भ्रम में रहता है और समस्या जस की तस बनी रहती है।
लोकतंत्र और जवाबदेही की कमी:
लोकतंत्र सिर्फ चुनाव से नहीं चलता। इसके लिए जरूरी है कि संसद और विधानसभाओं में सवाल पूछे जाएं और उनके जवाब मिलें। लेकिन कई बार मंत्री सदन में सवालों का जवाब देने नहीं आते। इससे पूरी व्यवस्था ठप पड़ जाती है। न्यायपालिका को भी कई बार चुनाव आयोग और प्रशासन को यह याद दिलाना पड़ता है कि जमीन पर लोगों को किस तरह की दिक्कतें आ रही हैं।
कर्ज़, किसान और राज्य सरकारें:
कई राज्य सरकारें भारी कर्ज में डूबी हुई हैं। इसका सीधा असर कर्मचारियों, किसानों और आम जनता पर पड़ता है। किसानों की आत्महत्याओं के आंकड़े लगातार सामने आ रहे हैं, लेकिन इन पर गंभीर और स्थायी समाधान की कमी दिखाई देती है।
लोग देश क्यों छोड़ रहे हैं?
पिछले कुछ वर्षों में लाखों भारतीयों ने नागरिकता छोड़ी है। हर कोई मजबूरी में देश नहीं छोड़ता, लेकिन जब बड़ी संख्या में लोग ऐसा करते हैं, तो यह सवाल जरूर उठता है कि उन्हें यहाँ भविष्य सुरक्षित क्यों नहीं दिख रहा।
निष्कर्ष
यह कहना कि देश में कुछ नहीं हो रहा, सच्चाई से भागने जैसा है। असल में देश में बहुत कुछ हो रहा है—लेकिन वह इस तरह हो रहा है कि लोग धीरे-धीरे उसे स्वीकार करने लगे हैं। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब लोग सवाल पूछते रहें, सच को देखने की कोशिश करें और व्यवस्था से जवाब मांगें। अगर ऐसा नहीं होगा, तो “कुछ नहीं हो रहा” कहना एक आदत बन जाएगी—और यही सबसे खतरनाक स्थिति होगी।
(रवीश कुमार: https://youtu.be/6P3P85JXN14?si=VVUauUf4Mbq1wHmS)





