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अब सांवरिया के नाम पर बबाल !

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सुसंस्कृति परिहार
मध्यप्रदेश की हवा पिछले माह से कुछ बदली बदली सी नज़र आ रही है कभी पाकिस्तान ज़िंदाबाद की फर्जी सी डी सामने आ जाती है तो कभी चूड़ी वाला और  कबाड़ी प्रकरण। तीनों मामले एक वर्ग विशेष के ख़िलाफ़ नफरत पैदा करने की खा़तिर एक सुनियोजित योजना नज़र आती है।फर्जी सी डी बनाने वाले बेख़ौफ़ आज़ाद है ।उधर चूड़ी वाला जेल में हैं उसे बेल नहीं मिली क्योंकि वह यहां का वाशिंदा नहीं है अदालत को संदेह है, वह भाग सकता है।कबाड़ी ने जय श्री राम कह कर जान बचा ली सिर्फ फजीहत झेलनी  पड़ी।ये सब मालवांचल में ही हो रहा है लगता है इसके पीछे कोई गिरोह सक्रिय है जो संघी  मानसिकता से ओतप्रोत है तथा जिसे सरकारी संरक्षण प्राप्त है ।

The Second Angle (@TheSecondAngle): "Fourth incident of Muslim man  harassment in MP, took place in Depalpur, Indore. This poor Muslim vendor  harrassed for having the name "Sawariya" on the cart in Indore . . #


हाल ही में इसी क्षेत्र के देपालपुर से एक और घटना सामने आई है जिसमें हाथ ठेले पर बरसों से पानी बतासा बेचने वाले अल्पसंख्यक पर इसलिए हमला हुआ कि वह अपने ठेले पर “सांवरिया पानी बतासे वाला” की तख़्ती लगाए था। हमलावरों ने उस पर आरोप लगाया कि वह अपनी जात छुपाकर बेच रहा जबकि वह व्यक्ति अपनी परम्परागत पोशाक सलवार कमीज़ पहने था जिसे वहां सब बख़ूबी जानते पहचानते थे। लेकिन उसे मारा पीटा गया उसके ठेले को तोड़ डाला गया और सांवरिया को जिसे सज़दापूर्वक ठेले वाला अपना सरमाया बनाये हुआ था उसे ज़मींदोज़ कर दिया। गुनहगार आज़ाद है। पीड़ित परेशान।
 ज्ञातव्य हो  उदयपुर चित्तौड़गढ़ मार्ग पर चित्तौड़गढ़ स्टेशन से महज़ 41कि भी की दूरी पर भादसौड़ा में मशहूर सांवरिया मंदिर है। जिसकी महिमा सदियों  है।कहते हैं कि यहां मीरा बाई के उसी सांवरिया की मूर्ति हैं जिनकी मीरा दीवानी थी और जिसे अपने साथ लिए संतों के साथ घूमती थीं ।इनकी ख़्याति इतनी फैली हुई है कि उनके भक्त वेतन से लेकर व्यापार तक में उन्हें अपना हिस्सेदार बनाते हैं। मान्यता है कि जो भक्त खजाने में जितना देते हैं सांवरिया उससे कई गुना ज्यादा भक्तों को वापस लौटाते हैं. व्यापार जगत में उनकी ख्याति इतनी है कि लोग अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए उन्हें अपना बिजनेस पार्टनर बनाते हैं तथा उन्हें सांवरिया सेठ नाम से पुकारते हैं।यह चलन राजस्थान से जुड़े पश्चिमी मध्यप्रदेश के मालवांचल में भी है। यहां भी सांवरिया सेठ के कई मंदिर  बन गए हैं उनके नाम पर कई प्रतिष्ठान भी हैं शायद इसी की प्रेरणा लेकर सांवरिया पानी बताशा की तख़्ती लगाई गई होगी। इसमें भला बुरा क्या था वह तो रोज सांवरिया का नाम इज्जत से लेता ही होगा। जबरिया नहीं। एक ओर जय श्री राम कहने इस समुदाय के लोगों को बाध्य किया जाता है और यहां सांवरिया याने कृष्ण के नाम पर प्रताड़ित।इस बारे में इतिहास में जाकर देखें तो कई मुसलमान शायर कृष्ण भक्त मिलेंगे। यहां तक कि पाकिस्तान के शायर हफ़ीज जालंधरी तो उनके मुरीद हैं।उनकी तमाम रचनाएं कृष्ण-राधा को ही समर्पित हैं।
मुसलमानों की कृष्ण भक्ति का आरंभ ग्यारहवीं शताब्दी के बाद से ही माना जाता है जब इस्लाम भारत में तेजी से फैला। इसलिए भारत में इस्लाम कृष्ण के प्रभाव से अछूता नहीं रह पाया। इसी वक्‍त चर्चा में सबसे पहले आए अमीर खुसरो। कहा जाता है एक बार हज़रत निजामुद्दीन औलिया के सपने में कृष्‍ण आए। औलिया ने अमीर खुसरो से कृष्ण की स्तुति में कुछ लिखने को कहा तो खुसरो ने मशहूर रचना ‘छाप तिलक सब छीनी रे से मोसे नैना मिलायके’ कृष्ण को समर्पित कर दिया। कृष्‍ण के परम भक्‍तों में से एक हैं रसखान, उनका असली नाम सैयद इब्राहिम था, मगर कृष्‍ण के प्रति उनके लगाव और उनकी रचनाओं ने उन्‍हें रसखान नाम दिया। रसखान यानी रस की खान। कहा जाता है कि रसखान ने भागवत का अनुवाद फारसी में किया था। मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं मिलि गोकुल गांव के। ब्रज के मंदिर के बाहर चबूतरे पर अपनी केशराशि छितराये मुगलानी ‘ताज’ की बहुचर्चित यह कविता ठेठ हिन्दी में ही हैं वे स्पष्ट ही कहती हैं-‘देव पूजा ठानी, मैं नमाज हूं भुलानीतजे कलमा-कुरान, साडे गुनन गहूंगी मैं,नंद के कुमार! कुर्बन तेरी सूरते पैहूं तो मुगलानी, हिन्दुवानी है रहूंगी मैं’  अब इधर अयोध्या जो फैज़ाबाद में है जहां का प्रेम भगवान राम के प्रति जगजाहिर है। मगर वहां से निकले और लखनऊ आकर बसे नवाबों के आखिरी वारिस वाजिद अली शाह कृष्‍ण के दीवाने थे। 1843 में वाजिद अली शाह ने राधा-कृष्ण पर एक नाटक करवाया था। लखनऊ के इतिहास की जानकार रोजी लेवेलिन जोंस ‘द लास्ट किंग ऑफ़ इंडिया’ में लिखती हैं कि ये पहले मुसलमान राजा (नवाब) हुए जिन्होंने राधा-कृष्ण के नाटक का निर्देशन किया था। लेवेलिन बताती हैं कि वाजिद अली शाह कृष्ण के जीवन से बेहद प्रभावित थे ।वाजिद के कई नामों में से एक ‘कन्हैया’ भी था।
रीतिकाल का समय जब खत्म हो रहा था, तब नज़ीर अकबराबादी का कृष्ण प्रेम मिसाल के तौर पर दर्ज होता है। राधा के साथ मीरा के कृष्ण प्रेम की जिस तरह तुलना की जाती है, वैसे ही नज़ीर के कृष्ण काव्य की तुलना रसखान से किए जाने की गुंजाइशें निकाली जाती हैं. उनकी एक प्रसिद्ध कृष्ण प्रेम रचना देखें :तू सबका ख़ुदा, सब तुझ पे फ़िदा, अल्ला हो ग़नी, अल्ला हो ग़नीहै कृष्ण कन्हैया, नंद लला, अल्ला हो ग़नी, अल्ला हो ग़नी
तालिब है तेरी रहमत का, बन्दए नाचीज़ नज़ीर तेरा
तू बहरे करम है नंदलला, ऐ सल्ले अला, अल्ला हो ग़नी, अल्ला हो ग़नी
यही नहीं, बल्कि नज़ीर के लिए कृष्ण पैगंबर की तरह ही दिखते हैं. नज़ीर ने कृष्णचरित के साथ रासलीला के वर्णन के साथ ही ‘बलदेव जी का मैला’ नामक कविता लिखी, जो कृष्ण के बड़े भाई बलराम पर केंद्रित है. ‘कन्हैया का बालपन’ शीर्षक वाली नज़ीर की कविता भी लोकप्रिय रही।

श्रीकृष्ण के बारे में कुछ लोग सोचते हैं कि वे भारत आने वाले पैगंबरों में से एक हो सकते हैं. इस संबंध में एक हदीस का वर्णन किया गया है जिसका उल्लेख ‘‘तारिख हमदान‘‘ नामक पुस्तक में  है। 
अमीर ख़ुसरो, रसखान, नज़ीर अकबराबादी और वाजिद अली शाह जैसे कई मुस्लिम मतावलंबियों ने कृष्ण की स्तुति करके दोनों धर्मों के बीच पुल बनाने की कोशिशें की हैं​ वही पिछले दशक में राही मासूम रज़ा के भारत के लोगों ने महाभारत की कहानी सुनी ज़रूर थी, लेकिन राही मासूम रज़ा ने उसे  महाभारत सीरियल के माध्यम से हर घर में पहुंचा दिया।इस समय का एक प्रसंग सदैव याद रखा जाएगा।शुरू में जब बी आर चोपड़ा ने उन्हें महाभारत लिखने का प्रस्ताव दिया तो उन्होंने उसे अस्वीकार कर दिया. लेकिन बात किसी तरह समाचार पत्रों में छप गई ।
जब बीआर चोपड़ा ने घोषणा की कि राही मासूम रज़ा महाभारत के संवाद लिखेंगे, तो उनके पास पत्रों की झड़ी लग गई, जिनका लब्बोलबाब था कि सारे हिंदू मर गए हैं जो आप एक मुसलमान से महाभारत लिखवा रहे हैं। चोपड़ा साहब ने सभी पत्र राही के पास भेज दिए। राही की ये कमज़ोर नस थी।वो भारतीय संस्कृति और सभ्यता के बहुत बड़े अध्येता थे। अगले दिन उन्होंने चोपड़ा साहब को फ़ोन किया, ‘चोपड़ा साहब! महाभारत अब मैं ही लिखूंगा. मैं गंगा का बेटा हूँ. मुझसे ज़्यादा हिंदुस्तान की संस्कृति और सभ्यता को कौन जानता है?'” 
उनके संवादों को कितने लोग सम्मान के साथ सुनते और दोहराते हैं। जिनमें कृष्ण के प्रति अपार मोहब्बत बांटते  हैं उन्हें कौन भुला सकता है? मोहम्मद रफ़ी के भक्तिभाव से गाए गीतों को क्या हम ठुकरा सकते हैं। मध्यप्रदेश के छोटे से नगर दमोह के गांव समन्ना में  एक मुस्लिम कल्लू हाजी ने राधा कृष्ण का मंदिर बनवाया है। यह सब कैसे संभव होता ? यकीनन सांवरिया कहें या कन्हैया हमारी माटी की अमानत हैं जिन पर सभी का बराबर का अधिकार है।ये अधिकार छीनना बड़े जुल्म की तरह है।

लेकिन आज धर्म की आड़ में मजहब के नाम पर कट्टरता फैलाने वालों की इस देश में कमी नहीं है। लेकिन वहीं इस देश में ऐसे भी उदाहरण हैं जो सनातन धर्म और इस्‍लाम के बंटवारे से परे खुद को भगवान कृष्‍ण की भक्ति में डुबोकर भवसागर को पार करने में विश्वास रखते हैं ।देपालपुर की घटना छोटी सी सही किंतु हमारे देश के लिए कलंक की तरह देखी जानी चाहिए। दोषियों को दंड मिले और ठेले वाले को मुआवजा। सांवरिया पानी बताशा की तख्ती प्रशासन को ख़ुद लगवाना चाहिए ताकि सांवरिया के प्रति लगाव की कमी अल्पसंख्यक वर्ग में आने ना पाए।ये हमारी तहजीब भी और संवैधानिक अधिकार भी तथा वक्त की ज़रूरत भी है।

Ramswaroop Mantri

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