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‘हराम की बोटी’…भारत में महिला खतना की अमानवीय प्रथा पर अब सुप्रीम कोर्ट ने लगाया बैन  

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भारत समेत दुनिया के कई हिस्सों में मुसलमानों के दाऊदी बोहरा समुदाय में बच्चियों का खतना यह मानकर किया जाता है कि इससे वे बड़ी होने पर पति के अलावा किसी दूसरे पुरुष से शारीरिक संबंध नहीं बनाएंगी. इस परंपरा के मुताबिक, महिला को शारीरिक संबंध का आनंद लेने का अधिकार नहीं है. यदि उसका खतना होता है तो वह अपने पति के प्रति वफादार रहेगी और घर के बाहर नहीं जाएगी.लड़कियों का खतना करने की प्रथा भारत के बोहरा संप्रदाय के साथ साथ अफ्रीका के कई देशों में है. खतने के दौरान न सिर्फ बहुत तकलीफ होती है यह लड़कियों के साथ स्वास्थ्य के लिए भी खतरनाक हो सकता है.

महिलाओं का खतना कई देशों में नई बात नहीं है. यूनीसेफ की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में जितना अनुमान लगाया गया था उससे 7 करोड़ ज्यादा महिलाएं इसकी चपेट में हैं. इंडोनेशिया की आधी महिलाएं इससे प्रभावित पाई गईं.

यूनीसेफ की ताजा रिपोर्ट 90 देशों में किए गए सर्वे पर आधारित है. महिलाओं के जननांगों की विकृति के मामले तीन देशों में सबसे ज्यादा आम हैं. दुनिया भर में होने वाले महिलाओं के खतना के आधे मामले मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया में पाए गए. इंडोनेशिया ऐसा देश पाया गया जहां आधे से ज्यादा महिलाओं को इससे गुजरना पड़ा है. दुनिया भर इससे प्रभावित करीब 4.4 करोड़ लड़कियां 14 साल से कम उम्र की हैं. यूनीसेफ की उप कार्यकारी निदेशक गीता राव गुप्ता मानती हैं, “हर मामले में महिलाओं के जननांगों की विकृति महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों का उल्लंघन है.” उनके मुताबिक इस कुप्रथा को खत्म करने के लिए इसकी गंभीरता को निर्धारित करना बेहद जरूरी है.

इंडोनेशिया में महिलाओं के जननांगों की विकृति के बारे में सुनी सुनाई जानकारी पहले से थी लेकिन इसका स्तर कितना गंभीर है यह एक ताजा रिपोर्ट में सामने आया. यूनाइटेड नेशंस चिलंड्रेंस फंड के मुताबिक इंडोनेशियाई सरकार के राष्ट्रीय सर्वे डाटा से पता चलता है कि करीब 6 करोड़ महिलाओं के जननांगों को विकृत किया जा चुका है. दुनिया भर में खतना से प्रभावित महिलाओं की संख्या 13 करोड़ से बढ़कर 20 करोड़ होने में इंडोनेशिया के मामलों का बड़ा हाथ है.

जननांगों की विकृति की परंपरा

आधिकारिक रूप से लगी रोक के बावजूद कई अफ्रीकी देशों में महिलाओं के जननांगों को विकृत किया जाना बंद नहीं हुआ है. घुमक्कड़ जीवन जीने वाले केन्या के पोकोट कबीले में लड़कियों को आज भी ये दर्दनाक रस्म सहनी पड़ती है.

सबके लिए एक ही ब्लेड

केन्या की रिफ्ट घाटी में यह महिला अब तक चार लड़कियों का खतना कर चुकी है, वो भी एक ही रेजर से. पोकोट लोगों की मान्यता है कि खतने किसी लड़की के महिला बनने की प्रक्रिया का प्रतीक है. कई देशों में इस पर पाबंदी लगी होने के बावजूद आज भी कुछ ग्रामीण इलाकों में चलन जारी है.\

समारोह’ की तैयारी

खतने की रस्म वाली एक ठंडी सुबह को पोकोट महिलाएं और बच्चे आग के आस-पास इकट्ठे होकर गर्म होते हैं. जिन महिलाओं का खतना ना हो उनकी शादी होना मुश्किल हो जाता है. अगर कोई खतने के लिए मना करे तो उस पर भारी दबाव डाला जाता है और कई बार समुदाय से बाहर भी निकाल दिया जाता है.

विरोध है नामुमकिन

खतने से पहले लड़कियों के कपड़े उतरवाए जाते हैं और उन्हें नहलाया जाता है. सबको पता होता है कि इस रस्म के बाद वे कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित रहेंगी. जैसे उनकी मांएं पूरे जीवन सिस्ट, संक्रमण और बच्चे को जन्म देने से जुड़ी तकलीफें झेलती रही हैं. खतने की परंपरा 28 अफ्रीकी देशों में जारी है. यूरोप में रह रहे इन इलाकों के आप्रवासियों में भी ये किया जाता है.

डरावना इंतजार

पोकोट समुदाय की लड़कियां रिफ्ट वैली के बारिंगो काउंटी की झोपड़ी में बैठी उस दर्दनाक घड़ी के पल गिनती हैं. केन्या में इसे 2011 में बैन कर दिया गया था. यूनीसेफ बताता है कि देश की 15 से 49 साल के बीच की उम्र वाली करीब 27 फीसदी महिलाओं का खतना हो चुका है. आमतौर पर खतना बेहोशी की दवा दिए बिना ही किया जाता है. साफ औजारों का इस्तेमाल ना होने के कारण महिलाएं जीवन भर कई तरह के संक्रमण झेलती हैं.

सूक्ष्म पर्यवेक्षण

लड़कियों को बिना चीखे चिल्लाए उनके जननांगों को विकृत किए जाने का दर्द सहना होता है. डब्ल्यूएचओ के अनुसार, इस प्रक्रिया के दौरान करीब 10 फीसदी लड़कियां तुरंत दम तोड़ देती हैं, जबकि दूसरी 25 फीसदी इससे पैदा हुई तकलीफों के कारण कुछ समय बाद मारी जाती है. मौत के असली आंकड़े इससे कहीं ज्यादा होने का अनुमान है.

पत्थर पर खून

अलग अलग कबीलों में खतने के तरीकों में अंतर है. पोकोट समुदाय में योनि का मुंह सिल दिया जाता है. डब्ल्यूएचओ ने तीन तरह के तरीकों का उल्लेख किया है. पहले में क्लिटोरिस को निकाल दिया जाता है, दूसरे में लेबिया माइनोरा को भी काट देते हैं और तीसरे तरीके में लेबिया मेजोरा को भी निकाल दिया जाता है और केवल एक छेद छोड़कर बाकी घाव को सिल देते हैं.

सफेद रंग की पुताई

पोकोट परंपरा में लड़की का शरीर सफेद रंग से रंगा जाता है. ये पहले से ही मान के चलते हैं कि इस प्रक्रिया के कारण लड़की की मौत होने की काफी संभावना है. कई देशों में इस बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं. 2014 में केन्या में एक स्पेशल पुलिस टुकड़ी बनाई गई और इन मामलों की रिपोर्ट देने के लिए हॉटलाइन भी बनी है.

जीवन भर का सदमा

इस दर्दनाक प्रक्रिया के बाद सदमे से ग्रस्त लड़की को ले जाकर जानवर की खाल में लपेटा जाता है. पोकोट अब इस लड़की को शादी के लायक मानते हैं. ऐसी लड़की के मां बाप उसकी शादी के लिए ऊंची कीमत मांग सकते हैं. इनका मानना है कि इससे महिला ज्यादा साफ, ज्यादा बच्चे पैदा करने लायक और पति के लिए ज्यादा वफादार हो जाती है.

मां से बेटी को?

कोई लड़की कभी वह दर्दनाक अनुभव नहीं भूल सकती. ये छोटी सी लड़की जो खुद खतने को मजबूर थी क्या अपनी बेटी को बचा पाएगी? कुछ देशों में बहुत छोटे बच्चों का खतना किया जाता है. ऐसा इसलिए क्योंकि कई जगहों पर इसे गैरकानूनी घोषित कर दिया गया है और जब एक छोटा बच्चा रोता है तो वह कम ध्यान खींचता है.

महिला खतना को अंग्रेजी में फीमेल जेनिटल म्यूटेशन कहते हैं. इसमें योनि के क्लिटोरिस के एक हिस्से को रेजर या ब्लेड से काट दिया जाता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, यह खतना चार तरह का हो सकता है- क्लिटोरिस के पूरे हिस्से को काट देना, कुछ हिस्सा काटना, योनि की सिलाई या छेदना. इस दर्दनाक और अमानवीय प्रथा से कई बार यौन संक्रमण संबंधी बीमारियां हो सकती है. मानसिक पीड़ा का असर सारी उम्र रहता ही है.

यहां आज भी होता है महिलाओं का खतना

फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (एफजीएम) या आसान भाषा में कहें तो महिला खतना पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोक के बावजूद दुनिया के कई देशों में यह एक हकीकत है. इसमें क्या होता है और यह कितने देशों में फैला हुआ है, चलिए जानते हैं.

Stephanie Sinclair - Gewinnerin des Anja Niedringhauspreis 2017

करोड़ों का खतना

दुनिया भर में लगभग 20 करोड़ महिलाओं और लड़कियों का खतना हुआ है. माना जाता है कि अफ्रीका में हर साल तीस लाख लड़कियों पर इसका खतरा मंडरा रहा है.

Elfenbeinküste Mädchen bei Information Aufklärung gegen weibliche Genitalverstümmelung Female Genital Mutilation / Cutting (FGM / C) der UNICEF (picture-alliance/dpa/Unicef/Asselin)

कौन कौन प्रभावित

समझा जाता है कि तीस अफ्रीकी देशों, यमन, इराकी कुर्दिस्तान और इंडोनेशिया में महिला खतना ज्यादा चलन में है. वैसे भारत समेत कुछ अन्य एशियाई देशों में भी इसके मामले मिले हैं.

Infografik Life Links Female genital mutilation prevalence map

पुरानी बेड़ियां

औद्योगिक देशों में बसी प्रवासी आबादी के बीच भी महिला खतना के मामले देखे गए हैं. यानि नए देश और समाज का हिस्सा बनने के बावजूद कुछ लोग अपनी पुरानी रीतियों को जारी रखे हुए हैं.

Stephanie Sinclair - Gewinnerin des Anja Niedringhauspreis 2017 (IWMF/Stephanie Sinclair)

यहां होता है सबका खतना

जिन देशों में लगभग सभी महिलाओं को खतना कराना पड़ता है, उनमें सोमालिया, जिबूती और गिनी शामिल हैं. ये तीनों ही देश अफ्रीकी महाद्वीप में हैं.

Guinea-Bissau Initiationsfeier Frauen (DW/B. Darame)

ऐसे होता है महिला खतना

महिला खतना कई तरह का होता है. लेकिन इसमें आम तौर पर क्लिटोरिस समेत महिला के जननांग के बाहरी हिस्से को आंशिक या पूरी तरह हटाया जाता है. कई जगह योनि को सिल भी दिया जाता है.

Infografik Life Links Female genital mutilation types

खतने की उम्र

लड़कियों का खतना शिशु अवस्था से लेकर 15 साल तक की उम्र के बीच होता है. आम तौर पर परिवार की महिलाएं ही इस काम को अंजाम देती हैं.

तस्वीर: Getty Images/AFP/A. Berry

Indonesien Weibliche Genitalverstümmelung (Getty Images/AFP/A. Berry)

खतने के औजार

साधारण ब्लेड या किसी खास धारदार औजार के जरिए खतना किया जाता है. हालांकि मिस्र और इंडोनेशिया जैसे देशों में अब मेडिकल स्टाफ के जरिए महिलाओं का खतना कराने का चलन बढ़ा है.

Symbolbild FGM (picture alliance/dpa/EPA/UNICEF/HOLT)

धार्मिक आधार?

महिला खतने का चलन मुस्लिम और ईसाई समुदायों के अलावा कुछ स्थानीय धार्मिक समुदायों में भी है. आम तौर पर लोग समझते हैं कि धर्म के मुताबिक यह खतना जरूरी है लेकिन कुरान या बाइबिल में ऐसा कोई जिक्र नहीं है.

Weibliche Genitalverstümmelung in Deutschland - Bündnis der islamischen Gemeinden (picture alliance / dpa)

खतने का मकसद

माना जाता है कि महिला की यौन इच्छा को नियंत्रित करने के लिए उसका खतना किया जाता है. लेकिन इसके लिए धर्म, परंपरा या फिर साफ सफाई जैसे कई और कारण भी गिनाए जाते हैं.

Sierra Leone Mädchen bei Theaterstück gegen Genitalverstümmelung (picture-alliance/Plan International)

विरोध की सजा

बहुत से लोग मानते हैं कि खतने के जरिए महिलाएं पवित्र होती हैं, इससे समुदाय में उनका मान बढ़ता है और ज्यादा कामेच्छा नहीं जगती. जो लड़कियां खतना नहीं करातीं, उन्हें समुदाय से बहिष्कृत कर दिया जाता है.

Bildergalerie Afrika Genitalverstümmelung (Reuters/S. Modola)

खतने के खतरे

महिला खतने के कारण लंबे समय तक रहने वाला दर्द, मासिक धर्म से जुड़ी समस्याएं, पेशाब का संक्रमण और बांझपन जैसी समस्याएं हो सकती हैं. कई लड़कियों की ज्यादा खून बहने से मौत भी हो जाती है.

Afrika Kinderheirat

बड़ी कीमत

खतने के कारण उस महिला को मां बनने के समय बहुत सी जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है. इसके कारण कई तरह की मानसिक समस्याएं और अवसाद भी हो सकता है.

Somalia Genitalverstümmelung (Getty Images/AFP/N. Sobecki)

कमजोर कानून

बहुत ही अफ्रीकी देशों में महिला खतने पर प्रतिबंध है. लेकिन अकसर इस कानून को सख्ती से लागू नहीं किया जाता है. वहीं माली, सिएरा लियोन और सूडान जैसे देशों में यह कानूनी है.

Bildergalerie Afrika Genitalverstümmelung (Reuters/S. Modola)

यूएन का प्रस्ताव

महिला खतने से कई अंतरराष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन होता है. 2012 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने महिला खतने को खत्म करने के लिए एक प्रस्ताव स्वीकार किया था.

अपनी हालिया टिप्पणी में सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं का अपने शरीर पर अधिकार की वकालत की. केंद्र ने इस प्रथा पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका का समर्थन किया. कोर्ट में इस समुदाय के प्रतिनिधियों की पैरवी करते हुए सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि यह इस समुदाय की बुनियादी परंपरा है और कोर्ट इस समुदाय के धर्म से जुड़े अधिकार में हस्तक्षेप नहीं कर सकता. इस दलील का अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने विरोध किया. वेणुगोपाल ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की बेंच से कहा, “इस प्रथा पर अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और कई अफ्रीकी देशों में रोक लग चुकी है. इस पर कानूनी प्रतिबंध लगना चाहिए.” 

चीफ जस्टिस ने कहा कि अगर महिलाएं किसी प्रथा को स्वीकार न करें तो क्या उन पर उसे थोपा जा सकता है? उन्होंने कहा, “अगर वे इसके विरोध में हों तो क्या आप उन पर इसे थोप सकते हैं?” जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, “अपने शरीर की अखंडता के महिला के अधिकार का हनन क्यों हो?” बेंच ने कहा कि वह इस मामले पर जुलाई में ही फिर सुनवाई करेगी और आदेश देगी.

साहियो नाम की एक गैर सरकारी संस्था महिला खतने के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुहिम चला रही है. भारत में साहियो की सह संस्थापक और पत्रकार आरेफा जोहरी सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को आशा की किरण मानती है. डॉयचे वेले से बातचीत में उन्होंने कहा, “हमें उम्मीद है कि महिलाओं के पक्ष में की गई कोर्ट की टिप्पणी फैसले में बदलेगी. खतना प्रथा एक गैर वैज्ञानिक और गैर जरूरी प्रथा है जिसे महिलाओं पर थोपा गया है. जो महिलाओं के शुद्धिकरण के नाम पर इसकी वकालत करते हैं, वे मूर्ख बना रहे हैं.” 

यूनिसेफ के आंकड़े बताते हैं कि दुनियाभर में हर साल 20 करोड़ महिलाओं का खतना होता है जिनमें अधिकतर की उम्र 14 वर्ष या उससे कम होती है. इंडोनेशिया में आधी से अधिक बच्चियों का खतना हो चुका है. भारत में दाऊदी बोहरा एक छोटा सा समुदाय है, लेकिन महिला खतना को लेकर वह अकसर सुर्खियों में रहता है. सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी ने इस प्रथा के खिलाफ आवाज उठा रहे लोगों को एक उम्मीद दी है.

Ramswaroop Mantri

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