अवधेश पुरोहित
पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की सरकार में जिस तबादला उद्योग को लेकर शिवराज व भाजपा के नेता गंभीर आरेाप लगाया करते थे आज उन्हीं की सरकार में आज से एक महीने के लिये तबादला उद्योग का श्रीगणेश हो गया है हालांकि ऐसा नहीं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया व उनके सहयोगियों द्वारा पाला बदलने के कारण उधार के सिंदूर से सुहागन की तरह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज शिवराज सिंह के चौथे शासनकाल में स्थानान्तरण नहीं हुए हों ऐसा कोई दावा नहीं कर सकता, क्योंकि यह सभी जानते हैं कि मुख्यमंत्री जिनके पास महिला बाल विकास की जिम्मेदारी इमरती देवी के उपचुनाव में पराजय के बाद इस विभाग की कमान शिवराज ने संभाली हुई है, यह सभी जानते हैं कि मुख्यमंत्री के पास इस विभाग के रहते तबादलों का खेल तो चला ही है तो वहीं प्रदेशभर में महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा आंगनबाड़ी के माध्यम से प्रदेश की गर्भवती महिलाओं व बच्चों को पोषण आहार का वितरण किया जाता है,
लॉकडान के दौरान मुख्यमंत्री के अधीनस्थ इस विभाग में हमेशा की तरह पोषण आहार का खेल खेलकर मासूमों के निवाले पर डाका डालने का काम को भी बखूबी अंजाम दिया गया, तो वहीं तबादले के नाम पर भी इस विभाग में जमकर लेदेन होने की खबरे सुर्खियों में हैं, आज से भले ही तबाला उद्योग का श्रीगणेश हो रहा हो लेकिन अभी तक मुख्यमंत्री के कोऑर्डिनेशन के माध्यम से राजनेताओं व सत्ता के दलालों ने जमकर तबादलों का खेल खेला, आज से शुरू हुए तबदाला उद्योग के श्रीगणेश के साथ जैसी की चर्चा का दौर जारी है कि अब यह तबादला उद्योग मंत्रियों, राजनेताओं और सत्ता के दलालों के लिये किया गया, क्योंकि अभी तक तो सिर्फ मुख्यमंत्री और उसके आसपास से जुड़े लोग इस तबादला उद्योग को अंजाम दे रहे थे अब यह मंत्रियों के लिये एक महीने की छूट दी गई है हालांकि मंत्री भी परेशान हैं क्योंकि १५ महीने की पूर्व की कमलनाथ सरकार के कार्यकाल में उनके मंत्रिमण्डल के सदस्यों ने जिस प्रकार से अपने-अपने विभाग के अधिकारियों व कर्मचारियों के तबादले २५ से ३० लाख तक के लेनदेन किये जाने की खबरें सुर्खियों में रहीं यही नहीं लोक निर्माण विभाग के तत्कालीन मंत्री सज्जन सिंह वर्मा और उनके दामाद और परिवार के लोगों द्वारा तो राजधानी भोपाल की होटलों में डेरा डालकर विधिवत तबादले के लेनदेन को अंजाम दिया जाता था, लोक निर्माण विभाग के सूत्रों के अनुसार उस समय ईई के ट्रांसफर की दर सज्जन सिंह वर्मा ने ३५ लाख तय कर रखी थी, इसमें कितनी सच्चाई है यह तो वर्मा या वह भुक्तभोगी अधिकारी ही बता सकते हैं, लेकिन यह जरूर है कि शिवराज सिंह सरकार और कमलनाथ सरकार के शासनकाल में कलेक्टर से लेकर अधिकारियों व कर्मचारियों के तबादले के नाम पर जमकर गोरखधंधा चला यही नहीं तबादला उद्योग में कलेक्टर से लेकर अधिकारियों व कर्मचारियों की पदवार दरें भी तय हो गई हैं तबादला उद्योग का भले ही आज श्रीगणेश हुआ हो लेकिन अधिकारियों में अब हमेशा की तरह वैसी तबादले में रुचि अब दिखाई नहीं दे रही है क्योंकि कमलनाथ सरकार के १५ महीने और उसके बाद कोरोना को डरो-ना का रूप देकर चौथी बार सत्ता पर काबिज हुए शिवराज सिंह की सरकार के आते ही प्रदेश में विकास कार्य नहीं हो रहे हैं, शिवराज सिंह व भाजपा के नेता भले ही आत्म निर्भर मध्यप्रदेश के तहत मजदूरों और अप्रवासी मजदूरों को मनरेगा के तहत रोजगार दिलाने का दावा कर रहे हों लेकिन प्रदेश में कहीं भी मजदूरों के माध्यम से मनरेगा का कार्य नहीं हो रहा है, यह सभी जानते हैं कि शिवराज कार्यशैली के चलते जिसमें ऊपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार की गंगोत्री बहने की परम्परा है उसी गंगोत्री में डुबकी लगाकर अधिकारी जो फर्जी आंकड़ों की रंगोली सजाकर जहां शिवराज को तो खुश करने के साथ-साथ अपनी तिजोरी भरने में लगे रहते थे अब वैसा माहौल इस प्रदेश में बनत नजर नहीं आ रहा है तभी तो अधिकांश विभागों के अधिकारियों के द्वारा वीआरएस लेने की भावना पनप रही है यही सब वजह हैं कि जिसके चलते अब कृषि विभाग का अधिकारी या कर्मचारी अपना तबादला कराने के पक्ष में नजर नहीं आ रहा है, हाँ यह जरूर है कि जिस कलेक्टर की तबादला दर एक करोड़ रुपये निर्धारित किये जाने की चर्चायें जोरों पर हैं उस कलेक्टरी को पाने के लिये आबकारी विभाग में वर्षों तक रहे शिवराज सिंह वर्मा जैसे लोग जिन्होंने आबकारी विभाग में रहते नोटिसों के जरिये नोट छापने का कार्य किया वह जरूर बड़वानी जैसे जिले में पदस्थ रहकर लॉकडाउन के दौरान कोरोना जैसी महामारी के उपचार के लिये खरीदी के सामान में सिंहस्थ की तरह भ्रष्टाचार करने का रिकार्ड बनाने में महारथ हासिल कर सकेगा वही अब जिले की कलेक्टरी पाने के लिये राजनेताओं और सत्ता के दलालों से सम्पर्क साधेगा, हालांकि यह सभी जानते हैं कि जबसे शिवराज सिंह ने इस प्रदेश की सत्ता की कमान संभाली है जबसे लेकर आज तक उनके शासन की कार्यशैली बताती है कि उनकी सरकार में सबका साथ सबका विकास के नारे के साथ जमकर जो भ्रष्टाचार की गंगोत्री बही उसी की बदौलत भाजपा के वह नेता जिनकी हैसियत शिवराज सरकार के पहले टूटी साइकल खरीदने तक की नहीं थी आज वह आलीशान भवनों और लग्जरी कारों में फर्राटे भरते नजर आ रहे हैं यही नहीं चौथी बार ज्योतिरादित्य सिंधिया व उनके समर्थकों की मेहरबानी से उधार के सिंदूर से सुहागन बनकर सत्ता पर काबिज हुए शिवराज सिंह चौहान के शासन की कार्यशैली की एक झलक भीकनगांव में हाल ही में जनपद सीईओ द्वारा की गई आत्महत्या के बाद जिन भाजपाई नेताओं का नाम आया है यह तो एक उदाहरण है, प्रदेशभर में ऐसे भाजपा नेताओं की भरमार है जो अधिकारियों पर दबाव बनाकर भजकलदारम् का खेल खेलने में लगे हुए हैं क्योंकि शिवराज के शासनकाल में सबका विकास सबका साथ के नारे का जो अर्थ बताते हैं इसका मतलब जैन धर्म के मतानुसार जिओ और जीने दो की तरह खुद खाओ और सबको खिलाओ की प्रथा प्रचलित रही है उसी प्रथा के चलते प्रदेश में भाजपा नेताओं की हैसियत में फेर दिखाई दे रहा है, ऐसी स्थिति में देखना अब यह है कि एक जुलाई से ३१ जुलाई तक शिवराज सरकार द्वारा तबादला उद्योग का श्रीगणेश के परिणाम क्या निकलेेंगे यह एक माह में तबदला उद्योग में सक्रिय राजनेताओं और सत्ता के दलालों के माध्यम से मैदानी जिलों में पदस्थापना पाये अधिकारियों की पदस्थापना से ही पता चलेगा कि किसने कितना तबादला उद्योग पर दांव लगाकर यह पदस्थापना हासिल की है।





