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अब विचलित क्यों नहीं करती दुराचार, बलात्कार, भ्रष्टाचार, अत्याचार सरीखी घटनाएं

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 पुष्पा गुप्ता

      हजारों वर्ष के इतिहास में अनेक साम्राज्यों का उदय और अस्त हुआ। मुगल आए, राजवाड़े आए। आखिर में अंग्रेज रहे। बदलाव पर बदलाव हुए लेकिन भारतीय जनमानस की इच्छा शक्ति न कभी बदली और न कभी मरी। लेकिन उसी जनमानस में आज एक ऐसा हार्मोनल चेंज आया है कि अन्याय, अत्याचार, उत्पीड़न और क्रूरता की घटनाएं उसे विचलित नहीं करतीं।

       भ्रष्टाचार, घोटाले उसके चित्त को आंदोलित नहीं करते। बेरोजगारी महंगाई अशिक्षा और बीमारी की विभीषिका उसकी शून्य पड़ गई त्वचा को‌ सहलाने में समर्थ नहीं हैं।‌ 

       देश का स्वतंत्रता आंदोलन और इसके महापुरुष, भारतीय संविधान की रचना, मौलिक अधिकारों की रक्षा और संस्थाओं की स्वतंत्रता आदि के विषय इस जनमानस की मनीषा में जड़ से बेदखल हो चुके हैं। समाज में अब किसी नए महात्मा गांधी अथवा लोक नारायण जयप्रकाश नारायण जैसे समकालीन नेतृत्व का पुनः पनपना असंभव परिकल्पना है। 

हमारी राष्ट्रीय चेतना उत्तेजना में तब्दील हो गई है। मंदिर-मस्जिद हिंदू-मुसलमान और नफरत के नए-नए स्रोत खोज कर असत्य की प्रयोगशाला में नित्य वैज्ञानिक आविष्कार हो रहे हैं।

      यही आज के जनमानस की बौद्धिक भूख है। यही रियल डिमांड है। सोशल मीडिया पर वीडियो एडीटिंग और ट्रोल अभियान, मन: कल्पित इतिहास‌ का प्रचार, गड़ही के पानी जैसे‌ संक्रमित लोकगीत, घाव करने वाली फिल्में, छुद्र सोच वाली अभिनेत्रियों और फूहड़ कलाकारों का बड़बोलापन, अधर्म का संदेश देने वाली धर्मसभाएं आदि नए वेरिएंट की गिरफ्त में आए लोगों की पसंद और उनके दैनिक व्यसन हैं। 

      आस्था के इस अद्भुत नवीकरण में भगवान के नाम‌, मंत्र और स्तुति तक का आतिशबाजी की तरह इस्तेमाल पारस्परिक सौहार्द के बीच धुआं भर रहा है। हमारी सांस्कृतिक विरासत राजनीति की दुकान पर चुनाव सामग्री की तरह सजी सजाई दिखती है।

इन्हीं स्टालों पर जातियों की थोक और फुटकर आपूर्ति अबाध रूप से चल रही है। गठबंधन के रिश्ते इतने पवित्र हैं कि बेतरतीब विचारधाराएं मतलब‌ और खुदगर्जी के सांचे में फटाक से ढल जाती है। 

      इस अभूतपूर्व लोकमानस का अन्तर्मन मुफ्त की चीजों में दौड़कर लग जाता है। मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, मुफ्त का मकान, मुफ्त का राशन, मुफ्त का नमक ऐसी चीजें हैं जिनके लिए इस महान राष्ट्र के अस्सी करोड़ लोग अपने को गरीब कहे जाने के लिए गर्व से फूले नहीं समाते ‌हैं।

       जब इन सुविधाओं का बखान करने वाला मुफ्त का पौष्टिक भाषण इनके निर्जीव स्वाभिमान को रोमांचित करता है तो उन्हें लगता है कि मुल्क में पहली बार कोई ऐसा निजाम है जो उन्हें प्यार से ‘गरीब’ कहकर बुलाता है। 

      अब गरीबदास अपनी भूख के सामने किसी क्रांति का सपना भला कैसे देख सकता है? उसे खुशी होती है जब हर तीन महीने बाद फिर उसे उसके गरीब होने का एहसास कराया जाता है।

इस जनमानस को गांधी नेहरू और आजादी के कथा-वार्ता से क्या लेना देना? अंग्रेज कौन थे, क्या चीज थे, गुलामी किस चिड़िया को कहा जाता था, इस जनवर्ग से इस बात का कोई वास्ता नहीं है। किसने अंग्रेजों से लोहा लिया और किसने उनकी मुखबिरी की, इस खुलासे से न यह चौकता है न ही इसमें उसकी तनिक सी दिलचस्पी है। 

       वीर भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस और बल्लभ भाई पटेल इस विद्वान पीढ़ी को हिंदू महासभा के संस्थापक जान पड़ते हैं। यह सुनकर गरीबी से सिकुड़ा हुआ इसका दिल बाग-बाग हो उठता है कि उक्त नेताओं से गांधी और नेहरू का‌ छत्तीस का आंकड़ा था।

       अपनी अभूतपूर्व सामंजस्य शक्ति से इस जनमानस को ब्रह्मा-विष्णु-महेश, वेद-शास्त्र, ईश्वर की धज्जियां उड़ाने वाले डॉक्टर भीमराव अंबेडकर और कट्टर राम-भक्तों को आपस में घोलकर एक अजूबा मिल्क-शेक परोसा‌ जाता है जो गले के नीचे उतरने लायक न होते हुए भी आसानी से उतर जाता है। 

स्वतंत्रता कालीन भारत की यह तीसरी से पांचवी पीढ़ी चल रही है। इतने कम समय में रक्त की संरचना में इतना बड़ा बदलाव आश्चर्यजनक है। भगवान का शुक्र है कि इस पीढ़ी के पूर्वज अनपढ़, गरीब और पिछड़े होते हुए भी अपने पोते‌ और पर-पोतों जैसे प्रज्ञावान नहीं थे।

     वर्ना अंग्रेजों को हाथ पकड़ कर बैठा लेते और देश छोड़कर जाने ही न देते। फिरंगी भी मुफ्त की चीजें बांटकर आज तक डटे होते। न होता पाकिस्तान न होता कश्मीर और न रहता ३७० का बखेड़ा। गांधी को अफ़्रीका से लौटते ही ट्रेन में वापिस बैठा दिया गया होता और गोडसे को पुण्य कमाने का मौका हाथ आता ही नहीं।

      हम इतनी फिजूल की बातें उन परंपरा-प्राप्त समाज सुधारकों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और राजनीतिक दलों के लिए चेतावनी के तौर पर लिखना चाहते हैं जिनको यह उम्मीद है कि अन्याय, अव्यवस्था और अनहोनी का वातावरण किसी बदलाव का कारण बन सकता है।

आप किसी सरकार से लड़ सकते हैं किसी पार्टी के विरुद्ध संघर्ष कर सकते हैं लेकिन उस जनता से नहीं लड़ सकते जिसकी भलाई आप करना चाहते हैं। उसमें वह सामर्थ्य आ गई है कि सालों तक ऐसी विडंबनाओं में हंसते-हंसते जी लेगी।

     वह अपने उज्जवल भविष्य को परास्त करने के लिए कमर कसकर खड़ी हुई है। 

     या तो इस दर्द को हद तक 

गुजरने दीजिए दवा के लिए।

या चुप कर बैठ जाइए  कुदरत के 

भरोसे उसकी दुवा के लिए।

Ramswaroop Mantri

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