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महिला सशक्तीकरण: नया अध्याय, नए आयाम

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कश्मीर की ‘नमदा’ दस्तकारी में फूंकी नई जान
आरिफा जान

Beat the challenges with a daunting challenge salute the spirit of Arifa  today will receive the Nari Shakti Award on International Womens Day

अ‌ब तक कश्मीर में महिलाएं परदे के पीछे रहकर जिंदगी गुजारती आई हैं, लेकिन आरिफा का चेहरा अब उस कश्मीर को
दिखाता है, जहां युवा महिलाएं आजादी के साथ सफलता की नई कहानियां गढ़ रही हैं। आरिफा की कहानी श्रीनगर की
संकरी गलियों से शुरू होती हैं जहां वह एक सपना बुनती हैं। आरिफा जान ने 7 साल पहले क्राफ्ट मैनेजमेंट का कोर्स किया
था। इसके बाद ही वे बाजार से गायब हो रही कश्मीर की नमदा कालीन को फिर से बाजार में लाने के लिए एक मिशन में
जुट गईं। नमदा ऊन से बना हुआ एक कालीन है। कश्मीर विश्वविद्यालय से काॅमर्स में ग्रेजुएशन करने के बाद उसने दो साल
का क्राफ्ट मैनेजमेंट प्रोग्राम किया। लेकिन उसके पास इतने रुपये नहीं थे कि इसे आगे बढ़ा पाती। उन्होंने मार्केट के नए ट्रेंड
देखे। नए डिजाइन बनाए और नई दिल्ली में आयोजित प्रदर्शनी में हाथ से बने नमदा प्रदर्शित किए। बस यह उसके लिए
टर्निंग प्वाइंट था। इसके बाद बुनकरों को मनाया और कई नए डिजाइन बनाए। पहले उन्हें दिन में काम करने के 175 रुपये
मिलते थे, लेकिन आरिफा ने बुनकरों की दिहाड़ी 450 रुपये कर दी। धीरे-धीरे उसके काम को यूएस ने भी सराहा। आज
विदेशों में भी उसके बनाए नमदा की मांग है।

वाराणसी के गंगा घाटों को नवजीवन देने वाली
तेमसुतुला इमसोंग

The banks of the Ganges resonated with the chants of Har Har Gange - हर-हर  गंगे के जयघोष से गुंजायमान हुए गंगा तट


आ‌पने अक्सर अपने आसपास गंदगी देख लोगों को प्रशासन को कोसते देखा होगा। लेकिन तेमसुतुला इमसोंग उन विरले
लोगों में है, जिन्होंने गंदगी देखकर प्रशासन और सरकार को कोसने की जगह सफाई का जिम्मा अपने हाथों में ले लिया। इस
काम में उन्हें दर्शिका शाह का साथ मिला। मूलत: नागालैंड की रहने वाली तेमसुतुला निस्वार्थ भाव से वाराणसी में गंगा के
घाटों को साफ कर रही हैं। उनके काम के बारे में लोगों को तब पता चला, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने एक ट्वीट में
उनका नाम लिया। कॉलेज की पढ़ाई खत्म करने के बाद तेमसुतुला ने साकार सेवा समिति नामक स्वयंसेवी संगठन की
स्थापना की। शुरुआती दिनों में वह दिल्ली से ही काम करती थीं, लेकिन बाद में वह वाराणसी चली आईं। वर्ष 2013 में
वाराणसी शहर से दूर स्थित शूल टंकेश्वर घाट की सफाई का काम शुरू किया और इस तरह एक मिशन का आगाज हो गया।
इसके बाद उन्होंने प्रभुघाट की सफाई का जिम्मा लिया और उसे भी चमका दिया। पहले दिन जब उन्होंने प्रभुघाट की सफाई
की तो वहां की हालत इतनी खराब थी कि 2 मिनट भी खड़े रहना दूभर हो गया। जगह-जगह मानव मल बिखरा हुआ था।
जैसे-तैसे सफाई की। लेकिन दूसरे दिन लोगों ने फिर गंदगी फैला दी। लोगों को रोकतीं, तो वह धमकाते, कहते-तुम कौन होती
हो रोकने वाली? लेकिन तेमसुतुला और उनकी टीम ने हार नहीं मानी। तेमसुतुला के काम से प्रभावित होकर जुलाई 2015 में
प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय में मिलने के लिए भी बुलाया था।

ओडिशा में जागरूकता
की नई पहचान बनीं
मतिल्दा कुल्लू

Matilda Kullu — Odisha ASHA worker on Forbes list who battled Covid,  superstition & casteism

बी‌ते वर्ष जब फोर्ब्स इंडिया ने ताकतवर महिलाओं की सूची जारी की तो इसमें शामिल मतिल्दा कुल्लू के नाम ने पूरे देश का
ध्यान खींचा। ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले की मतिल्दा एक आशा कार्यकर्ता हैं। ‘आशा दीदी’ के तौर पर अपने क्षेत्र में मशहूर
मतिल्दा 15 वर्ष पहले आशा कार्यकर्ता बनीं। उन्होंने देखा कि ग्रामीण बीमार पड़ने के बाद डॉक्टर को दिखाने की बजाय
‘काला जादू करने वाले तांत्रिक’ के पास जाते थे। वो लोगों को अस्पताल जाने की सलाह देती थी तो गांव के लोग उसका
मजाक उड़ाते थे। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई क्योंकि उन्होंने किसी भी बीमारी
को ठीक करने के लिए आवश्यक उपचारों और दवाओं के बारे में लोगों में जागरूकता पैदा करके ग्रामीणों की मानसिकता को
बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ग्रामीण अब तांत्रिक के पास जाने के बजाय इलाज के लिए डॉक्टर से सलाह लेते हैं।
कोविड -19 ने जब भारत में पांव पसारा को मतिल्दा का काम बढ़ गया। इस दौरान बड़ागांव तहसील के गरगड़बहल गांव में
964 लोगों की देखभाल के लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया। इस दौरान उनका दिन शुरू होता है सुबह 5 बजे।
घर के काम खत्म करने के साथ 4 लोगों के लिए खाना बनाने के बाद मवेशियों को चारा डालकर मतिल्दा साइकिल पर
निकल पड़ती हैं। घर-घर जाकर लोगों से स्वास्थ्य संबंधी जानकारी लेती हैं। साथ ही महिला ग्रामीणों को नवजात एवं
किशोरियों के टीकाकरण, प्रसव पूर्व जांच, प्रसव की तैयारी, गर्भवती महिलाओं के लिए पौष्टिक आहार आदि की सलाह देती
हैं।

मोहना, भावना, अवनी
ने दिखाया देश की बेटियां नहीं हैं किसी से भी कम

मोहना, अवनी और भावना ने रचा इतिहास, पहली बार वायुसेना में बतौर महिला फाइटर  प्लेन पायलट हुईं शामिल - avani chaturvedi mohana singh and bhawna kanth  female pilots inducted in ...

भा‌रतीय वायुसेना में महिलाएं तो लंबे समय से शामिल रही हैं पर लड़ाकू भूमिका से उन्हें हमेशा दूर ही रखा गया। लेकिन
जून, 2016 में नया इतिहास लिखा गया, जब फ्लाइंग ऑफिसर माेहना सिंह, फ्लाइंग ऑफिसर भावना कंठ और फ्लाइंग
ऑफिसर अवनी चतुर्वेदी ने संयुक्त स्नातक परेड में हिस्सा लेकर महिला लड़ाकू पायलट बनने का गौरव हासिल किया। सशस्त्र
बलों में महिलाओं को महत्वपूर्ण भूमिका देने की इस शुरुआत ने न सिर्फ देश का गौरव बढ़ाया, बल्कि लाखों बेटियों को नई
राह भी दिखाई। 2018 में फ्लाइंग ऑफिसर अवनी चतुर्वेदी अकेले मिग-21 बाइसन विमान उड़ाने वाली देश की पहली
महिला फाइटर बन गईं। राजस्थान की रहने वाली मोहना सिंह के पिता और दादा ने में भी देश की सुरक्षा में अपनी सेवाएं
दीं, इसी ने मोहना को प्रेरित किया तो मध्य प्रदेश के सतना की अवनी ने फ्लाइंग क्लब में विमान उड़ाने के बाद वायुसेना में
आने का फैसला किया। बिहार के दरभंगा की रहने वालीं भावना कंठ अपनी मर्जी से आसमान को छूना चाहती थीं। इन तीनों
की सफलता के बाद रक्षा मंत्रालय ने भारतीय वायुसेना में महिला लड़ाकू पायलटों की प्रायोगिक योजना को स्थाई योजना
में बदलने का फैसला किया। एक और महत्वपूर्ण कदम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लड़कियों के प्रवेश के लिए अब तक बंद रहे
सैनिक स्कूलों के दरवाजे खोलने की घोषणा की तो इसी वर्ष से राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में महिलाओं के प्रवेश को मंजूरी देकर
नए भारत के केंद्र में नारी शक्ति के संकल्प की शुरुआत हुई है।

हर बेसहारा बच्चे के लिए ममता की मूरत बन गईं
सिंधु ताई

Sindhutai Sapkal: हज़ारों बेसहारा बच्चों की मां, जो भाषण के बदले बच्चों के  लिये मांगती थी राशन » Khabar Satta

ह‌मारे देश में मां को ईश्वर माना जाता है। ऐसे ही महाराष्ट्र की सिंधु ताई हर उस बच्चे की मां बन गईं जो लावारिस सड़कों
पर घूमते हैं। पद्मश्री समेत 750 से अधिक पुरस्कार उन्हें मिले तो पूरे देश में पहचान भी मिली लेकिन यह सफलता आसान
नहीं थी। इसके पीछे था एक लंबा संघर्ष, जिसकी शुरुआत हुई महाराष्ट्र के वर्धा में उनके जन्म के साथ ही। जन्म के बाद
सिंधुताई का नाम चिंदी रखा गया था। चिंदी मतलब, किसी कपड़े का कुतरा हुआ टुकड़ा, जिसका कोई मोल ना हो। परिवार
की गरीबी चरम पर थी, इसीलिए ना अच्छी परवरिश मिली और ना ही शिक्षा। 10 साल की उम्र में इस नन्हीं सी जान की
शादी 30 वर्षीय श्रीहरी सपकाल से कर दी गई। 20 साल की उम्र में चिंदी 3 बच्चों की मां बन चुकी थीं। चौथा बच्चा उसके पेट
में था, जब झूठ के खिलाफ आवाज उठाने पर उसके पति ने उसे घर से निकाल दिया। खुद चिंदी के घर वालों ने भी उससे मुंह
मोड़ लिया। उन्होंने एक बेटी को जन्म दिया। अकेले एक बच्चे को जन्म देना आसान नहीं था। उन्होंने गर्भनाल को पत्थर से
मार मार कर काटा था। इसके बाद सिंधु मे अपनी बेटी के लिए रेलवे स्टेशन पर भीख तक मांगी। इसके बाद मरने का ख्याल
भी मन में आया। यही सोच कर चिंदी ने उस दिन खूब सारा खाना इकट्ठा किया और उसे खाने लगी। उसने ऐसा इसलिए
किया, क्योंकि वो भूखे पेट मरना नहीं चाहती थी। बाकी का बचा खाना उसने अपने साथ बांध लिया और अपनी बच्ची के
साथ रेल की पटरियों की तरफ निकल पड़ी। रास्ते में एक भूखा मिला तो बचा खाना उसे दे दिया। तब से सिंधुताई हर उस
बच्चे की मां बन गयी, जो स्टेशन पर या आसपास कहीं बेसहारा पड़ा मिलता। जब बच्चे बढ़ने लगे तो सिंधुताई ने स्पीच देनी
शुरू कर दी, जिससे डोनेशन मिल सके। इसी वर्ष 4 जनवरी को उनका निधन हुआ तो खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर
कहा, “डॉ सिंधुताई सपकाल को समाज में उनकी नेक सेवा के लिये याद किया जायेगा।”

तीन तलाक के खिलाफ लाखों महिलाओं की आवाज
सायरा बानो

shah bano: शाह बानो से लेकर शायरा बानो तक, मुस्लिम महिलाओं का संघर्ष - from  shah bano to saira bano muslim women have fought legal battle | Navbharat  Times

उ‌त्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली रिटायर्ड आर्मी ऑफिसर की बेटी सायरा बानो की शादी 11 अप्रैल साल 2002 में
प्रयागराज के जीटीबी नगर इलाके में रहने वाले रिजवान से हुई थी। सोशल साइंस में मास्टर डिग्री लेने के बाद ब्याह रचाने
वाली सायरा तमाम दूसरी लड़कियों की तरह खुशहाल जिंदगी के हजारों सपनों को लेकर मायके से विदा हुई थीं। लेकिन
कुछ दिन बाद ही प्रापर्टी डीलर पति और ससुराल के दूसरे लोग उसे परेशान करने लगे। दो बच्चे होने के बावजूद सायरा के
साथ मारपीट की जाती थी। उसे ताने दिये जाते और बात -बात पर घर से निकालने की धमकी दी जाती। साल 2015 के
अक्टूबर महीने में सायरा कुछ दिनों के लिए अपने मायके आई तो पति ने एक कागज पर तीन बार तलाक लिखकर उसे
हमेशा के लिए छोड़ने का एलान कर दिया। सायरा की तरह ही यह दंश लाखों महिलाएं झेल रही थीं और आने वाले वर्षों में
करोड़ों और महिलाएं भी झेलतीं लेकिन सायरा ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मई, 2017 में सुप्रीम
कोर्ट ने उनके हक में फैसला सुनाया तो 1985 में शाहबानो मामले में तत्कालीन सरकार की गलती को फौरन अध्यादेश
लाकर ठीक किया गया। इसके बाद तमाम विरोधों के बाद जुलाई-अगस्त में इस कानून को संसद से पारित कर करोड़ों
मुस्लिम महिलाओं को हक दिलाया गया।

नितिका गुप्ता
इंस्टाग्राम पर मार्केंटिंग से तय किया स्टार्टअप तक का सफर

Women to Watch 2021: Ritika Gupta, Reprise | Analysis | Campaign Asia

अ‌गर हौसले बुलंद हों और अपने जुनून का जीने की जिद हो तो फिर कोई राह कठिन नहीं होती। जम्मू-कश्मीर की नितिका
गुप्ता इसका एक शानदार उदाहरण हैं। एआईएफटी से ग्रेजुएशन कर प्रोडक्ट मैनेजर के रूप एक कंपनी में काम कर नितिका
ने हर राज्य की पारंपरिक कला को बेहद करीब से देखा। क्रिएटिविटी यानी रचनात्मकता तो वैसे ही उन्हें बचपन से अपनी
ओर खींचती थी लेकिन नौकरी में रोज के रुटीन में उनकी रचनात्मकता कहीं दब रही थी। कोविड की वजह से जब देश में
सख्त लॉकडाउन लगा तो अपने घर पर वर्क फ्रॉम होम करते हुए नितिका के मन में नई शुरुआत का ख्याल आया। लॉकडाउन
में अधिकतर हैंडीक्राफ्ट कारीगर घर बैठे हुए थे। नितिका ने उनसे संपर्क किया और फिर इंस्टाग्राम पर पाइन कोन के नाम से

पेज बनाकर उनके उत्पादों की मार्केटिंग करने लगीं। थोड़ा वक्त लगा, लेकिन धीरे-धीरे हुई यह शुरुआत दिल्ली में खुद की
कंपनी और दफ्तर तक पहुंच गई। 1 साल में ही टर्नओवर 10 लाख रु. का आंकड़ा पार कर गया। फिलहाल कई राज्यों के 200
से ज्यादा कारीगर उनसे जुड़े हुए हैं। इनमें महिलाएं शामिल हैं जो पहले मुश्किल से गुजारा करती थीं, लेकिन अब खासी
आमदनी हो जाती हैं। वह कई राज्यों की पारंपरिक कला के हैंडीक्राफ्ट उत्पाद बेचती हैं।

सब चाहते थे चूल्हा-चौका करे, पर उसने स्टिक थाम ली
वंदना कटरिया

टो‌क्यो ओलंपिक में जब दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ मैच में भारत की महिला हॉकी टीम को हल्के में लिया जा रहा था,
वंदना कटारिया ने अपनी स्टिक से एक के बाद एक तीन गोल दाग कर देश को खुशियों से झूमने का मौका दे दिया। वह
ओलंपिक के इतिहास में भारत की ओर से हैट्रिक बनाने वाली पहली महिला बन गईं। कटारिया के लिए हॉकी खिलाड़ी बनने
के अपने सपने को पूरा करना इतना आसान नहीं था। वह उत्तराखंड के रोशनाबाद गांव में पली-बढ़ीं। उनके पड़ोसी नहीं
चाहते थे कि वह अपने सपनों को पूरा करें। यहां तक कि उनकी दादी भी चाहती थी कि वह घर के कामों में हाथ बटाए।
लेकिन, पहलवान रहे उनके पिता नाहर सिंह कटारिया ने आगे आकर वंदना का समर्थन किया और पेशेवर रूप से खेल को
आगे बढ़ाने में मदद की। शुरुआती दिनों में उसके पास प्रशिक्षण के लिए उचित उपकरण नहीं थे। वह अपने कौशल को
निखारने के लिए पेड़ की शाखाओं के साथ अभ्यास करती थीं। जब उनके पहले कोच प्रदीप चिन्योती ने उन्हें एक स्कूल
टूर्नामेंट में देखा और पहली बार भारत की तरफ से खेलने में उनकी मदद की। भारतीय टीम में फॉरवर्ड खेलने वालीं वंदना

टीम की कप्तान भी रह चुकी हैं। कई मेडल अपनी देश की झोली में डालने वाली वंदना केंद्र सरकार की टारगेट ओलंपिक
पोडियम स्कीम(टॉप्स) का हिस्सा होने के साथ उत्तराखंड में बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान की ब्रांड अंबेसडर भी हैं।

पलंग के नीचे मशरूम उगा कर ‘मशरूम लेडी’ बनीं
बीना देवी

बिहार की 'मशरूम लेडी' पलंग के नीचे मशरूम उगा कमा रही अच्छा मुनाफा,  राष्ट्रपति के हाथों हो चुकी है पुरस्कृत

कृ‌षि प्रधान भारत में कृषि ही एक ऐसा क्षेत्र है, जहां महिलाओं की मौजूदगी बेहद कम है। ऐसे ही कृषि क्षेत्र में अपना
महत्वपूर्ण योगदान देने वाली मुंगेर की बीना देवी हैं, जिन्होंने अपने पलंग के नीचे ही मशरूम की खेती कर डाली और आज
पूरे देश में प्रसिद्ध हो चुकी हैं। लेकिन यह सफर आसान नहीं था। बीना देवी के पास मशरूम की खेती करने के लिए न ही कोई
जमीन थी और न खेत। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और दिमाग लगाकर वह जिस पलंग पर सोती थी उस पलंग के नीचे
ही मशरूम का एक किलो बीज मंगा कर इसकी खेती करनी शुरू कर दी। मशरूम की खेती करने के लिए सबसे पहले बीना
देवी ने अपने पलंग को चारों ओर साड़ी से घेर दिया। उनका यह तरीका जब लोगों तक पहुंचा तो तुरंत कृषि विश्वविद्यालय
की टीम उनके घर तक पहुंच गई और उनके इनोवेशन की तस्वीरें और वीडियो बाहर की दुनिया में वायरल हो गई, जिसे
विश्वविद्यालय में दिखाया गया। बीना देवी ने अपने अथक प्रयास से मुगेर के पांच ब्लॉक के 105 गांवों में मशरूम खेती की
अलख जगा दी है, जिसकी वजह से 1500 परिवारों के जीवन-यापन में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। मशरूम की खेती के साथ-
साथ बीना देवी कई सालों से किसानों को ऑर्गेनिक फार्मिग, कम्पोस्ट प्रोडक्शन और ऑर्गेनिक इंसेक्टिसाइड तैयार करने का
गुर भी सिखा रही हैं। बीना देवी के हौसलों की बदौलत आज ग्रामीण महिलाओं में दुग्ध और बकरी पालन के प्रति खास
रुझान देखा जा रहा है। बीना देवी के इस कहानी को पीएम नरेंद्र मोदी ने खुद अपने ट्विटर हैंडल के जरिए साझा किया था।

संती देवी
जिन्होंने पेड़ों को बचाना जीवन का ध्येय बनाया

Basanti Didi Used To Explain To Women To Save Trees - पेड़ों को बचाने के  लिए महिलाओं को समझाती थीं बसंती दीदी - Pithoragarh News

उ‌त्तराखंड की कोसी नदी हजारों लोगों के लिए आजीविका और जीवन यापन का जरिया है। लेकिन वक्त के साथ बढ़ती
जरूरतों के चलते जब पानी कम होने लगा तो इसके किनारे लगे जंगलों के अस्तित्व पर भी प्रश्न चिन्ह लग गया। एक महिला
से यह सब देखा न गया और उसने बीड़ा उठाया नदी को नया जीवन देने के साथ पर्यावरण के प्रति लोगों को सजग करने का।
कौसानी के लक्ष्मी आश्रम में रहने वाली इस महिला को लोग बसंती बहन के नाम से जानते हैं। मात्र 12 साल की आयु में पति
को खो देने वाली बसंती बहन ने जीवन में कभी हार नहीं मानी। पति की मृत्यु के बाद लक्ष्मी आश्रम ही उनका ठिकाना बन
गया। यहीं रहकर 12वीं तक पढ़ाई पूरी की, फिर पूरे जिले में ‘बालवाड़ी’ आश्रम खोलना शुरू किया। यहां वे खुद पढ़ातीं।
कभी बालविवाह का दंश झेल चुकीं बसंती बहन ने घर-घर जाकर लोगों को इसके दुष्परिणाम बताए। 2003 में एक अखबार
में खबर छपी कि जंगलों की कटाई के चलते अगले 10 साल में कोसी नदी सूख जाएगी तो बसंती देवी ने इसे बचाने का बीड़ा
उठाया।‘चिपको आंदोलन’ की धरती से आने वाली बसंती देवी जंगल-जंगल भटकीं और लोगों को समझाया कि पेड़ न काटें
नहीं तो नदी सूख जाएगी। अखबार की कटिंग लेकर वे पेड़ काट रहे हर शख्स को दिखातीं। धीमे-धीमे ही सही, सूरत बदलनी
शुरू हो गई। साल 2016 में बसंती देवी को महिलाओं के लिए देश के सर्वोच्च पुरस्कार, नारी शक्ति पुरस्कार से भी नवाजा
गया था। 2022 के लिए बसंती देवी को पद्मश्री सम्मान दिया गया है।

असम में सशक्तीकरण
की प्रतीक बन गई हैं
लखीमी बरुआ

महिला सशक्तिकरण का उमदा उदाहरण हैं, लखीमी बरूआ

अ‌होम राजाओं की आखिरी राजधानी के रूप में मशहूर है जोरहाट। वही जोरहाट जो अपने चाय के बागानों के लिए भी
जाना जाता है। 1949 में यहां लखीमी बरुआ का जन्म हुआ। लेकिन उन्हें जन्म देने वाली मां चल बसीं। घर की आर्थिक स्थिति
कमजोर थी, पर पिता ने पूरी मेहनत से उसे पाला। बचपन से पढ़ने में अच्छी थीं, लेकिन ईश्वर को कुछ और मंजूर था। 1969
में पिता का साया भी सिर से उठा तो कॉलेज छोड़ना पड़ा। 1973 में शादी हुई तो पति ने फिर से पढ़ने का हौसला जगाया।

लखीमी ने 1980 में ग्रेजुएशन किया और ‘डिस्ट्रिक्ट सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक’ में अकाउंट मैनेजर बन गईं। यहीं से शुरुआत हुई
लखीमी के उस नए जीवन की जिसके लिए आज असम ही नहीं, पूरा देश उन्हें जानता है। नौकरी में उन्होंने देखा गांवों की
गरीब, अशिक्षित औरतें, चाय बागानों में मजदूरी करने वाली महिलाएं घंटों कर्ज के लिए लाइन में लगी रहती थी। काउंटर
तक पहुंचती तो दस्तावेज पूरे न होने की वजह से खाली हाथ लौट जातीं। लाचार औरतें गिड़गिड़ातीं तो आंसू लखीमी के
दिल पर पड़ते। इसी से प्रेरणा लेकर उन्होंने 1983 में जोरहाट में एक महिला समिति बनाई और 1990 में शुरुआत की
कनकलता महिला कोऑपरेटिव बैंक की। रजिस्ट्रेशन के लिए उन्हें 8 वर्षों तक संघर्ष करना पड़ा। दो दशकों से ज्यादा समय से
संचालित इस बैंक की अब 4 शाखाएं हैं, जिनमें अब करीब 45,000 खाताधारक हैं। बैंक में रोजगार भी केवल महिलाओं को
मिलता है। भारत सरकार ने लखीमी बरुआ को 2021 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया है।

मदुरै से दिल्ली तक सामान सप्लाई कर रही हैं
अरुलमोझी

अ‌रुलमोझी सरवणन उन महिलाओं के लिए आज एक उदाहरण बनकर उभरी हैं, जिनके सपने घर की देखभाल और बच्चों
की परवरिश के बीच कहीं दम तोड़ देते हैं। लेकिन तमिलनाडु के मदुरै की रहने वाली अरुलमोझी ने इन्हें समस्या के रूप में
नहीं, बल्कि चुनौती के रूप में लिया। दो बच्चों के कारण वह बाहर काम करने नहीं जा सकती थीं तो सोचा कोई ऐसा बिजनेस
किया जाए कि घर से ही काम कर सकूं। स्टेशनरी के काम से शुरुआत की और गवर्मेंट ई-मार्केट प्लेस(Gem) पोर्टल पर खुद को
रजिस्टर किया। बड़ा ऑर्डर मिला तो सामने आर्थिक समस्या खड़ी थी। लेकिन इसका हल निकला प्रधानमंत्री मुद्रा लोन
योजना से। अरुलमोझी कहती हैं, “केवल आधार कार्ड और एक फोटो पर लोन। इतनी आसानी से लोन मिल जाएगा, क्या
इससे पहले आपने कभी सुना भी था?” अब वह मदुरै से ही सामना सप्लाई कर रही हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर, रक्षा
और विदेश मंत्रालय तक उनका सामान जैम पोर्टल के जरिए पहुंच रहा है। अरुलमोझी ने अपने इस प्रयास में 4 लोगों को
रोजगार भी दिया। अब वह जल्द ही एक बड़ी कंपनी के माध्यम से 40 लोगों को रोजगार देने जा रही हैं। n

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Ramswaroop Mantri

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