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सरकारी हिन्दी :दरबारी शिगूफेबाज़ 

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कनक तिवारी 

सरल हिन्दी में लिखा जाने वाला साहित्य लोकोपयोगी होने पर भी घटिया, निम्नतर और तिरस्कृत समझाया जाता है। हिन्दी भाषा, श्रेष्ठ लेखन और हिन्दीदां लेखकों के अभिजात्य कुल समानार्थी हो जाते हैं। गांव और कस्बों में लिखा जाने वाला जनोपयोगी भाषायी सरलता का साहित्य अनुयायियों का प्रलाप कहा जाता है। हिन्दी के कई बड़े स्वनामधन्य, आत्ममुग्ध और अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के लेखकों का भावानुवाद करने वाले हस्ताक्षरों के मुकाबले कवि प्रदीप ने हिन्दी भाषा के जरिए बेहतर बौद्धिक हलचल पैदा की है। उन्हें अच्छे कवियों की जमात में आलोचकों के सिंडिकेट में शामिल ही नहीं किया। कविता के लोकप्रिय मंचों पर भवानीप्रसाद मिश्र, बच्चन और नीरज जैसे कवियों ने दशकों तक भाषा को घर घर परोसने की कोशिश की। विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम, अध्यापन, शोध, फैकल्टियों, अंतर्राष्ट्रीय आदान प्रदान आदि को लेकर ऐसे लेखकों का जमावड़ा कुलीन और सत्ता प्रतिष्ठान का करीबी हो गया है जिनके लेखन को लेकर पड़ोसी तक को इच्छा नहीं हुई कि वह उसे पढ़े। सरल भाषा में सर्वसुलभ लिखे जा रहे साहित्य को घटिया कहने का फतवा तथाकथित कुलीन और आभिजात्य वर्ग के विचारकों को किसने दिया है? 

हिन्दी सम्मेलन में ‘हिन्दी‘ शब्द गौण है। सम्मेलन शब्द मुख्य है। आयोजन में यदि सरकारी धन लग रहा हो तो उसे खर्च करने का जिम्मा सरकारी अफसरों पर ही होता है। जो मुंहलगे होते हैं, उन्हें आयोजन में अनुपातहीन ज्यादा महत्व दिया जाता है। सिद्ध यह किया जाता है कि इनके भगीरथ प्रयत्नों के बिना हिन्दी का विकास संभव ही नहीं है। इनमें से कई भाषावीर गैरलेखक भी होते हैं। वे अपनी निजी जान पहचान, तिकड़म, रसूख या लक्ष्मी पुत्र होने का लाभ होने के कारण सम्मेलनों में जाकर धींगामस्ती भी ज्यादा करते हैं। निजी सम्मेलनों के आयोजक मोटे तौर पर ट्रेवल एजेंट ही होते हैं। विदेशों में सम्मेलन आयोजित करना आसान नहीं होता। वे अपनी व्यापारिक योग्यता के चलते गैरव्यावसायिक मौसम में सस्ते होटलों, सस्ते यातायात के साधनों और कुछ उदार स्थानीय व्यक्तियों से संपर्क कर भारतीय लेखकों को सस्ती यात्राएं तो कराते हैं। वे प्रतिभागियों के आराम और पर्यटन का पूरा ख्याल भी रखते हैं। कई कार्यक्रम मंदिरों, गुरुद्वारों और अन्य धार्मिक सांस्कृतिक भवनों में निःशुल्क भी आयोजित हो जाते है। उनकी उदारता तथा हिन्दी प्रेम के कारण ऐसे गैर लेखक आयोजकों को भी हिन्दी सम्मेलनों और संस्थाओं का अध्यक्ष और महामंत्री वगैरह भी लेखकों की कथित सर्वानुमति से बनाया जाता है। इसमें कोई बुराई नहीं है। हिन्दी का भला हो न हो हिन्दी भाषियों का तो होता है। 

यह तिलिस्म अंगरेजी के मानसिक साम्राज्य का है। हिन्दी भाषा की स्थिति हमारी प्रतिबद्धताओं की जुगाली करने जैसी है। हम अपनी मातृभाषा में सोचते हैं। लिखते हैं। बोलते हैं। दुख और दर्द होने पर हिन्दी ही हमारे लिए मलहम की भाषा है। अय्याशी, घूसखोरी, भ्रष्टाचार, पूंजीवाद, रंगभेद, नस्लभेद वगैरह की अंतर्राष्ट्रीय बढ़ोतरी के लिए अंगरेजी अर्थात यूरोपीय अर्थात यांत्रिक सभ्यता दोषी रही है। तथाकथित सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की सरकार भी इस अभिशाप से देश को बचाने स्वदेशी प्रयत्न तो नहीं कर रही है। पता नहीं क्यों उसे भी अमेरिका जाने की लत लगती जा रही है। पता नहीं क्यों साधारण भारतीय की पारंपरिक वेशभूषा को अंतर्राष्ट्रीय प्रचार की पोशाक बनाने के बदले दस लाख  रुपये के सूट पहनने को भारतीयता की अस्मिता के साथ जोड़कर बताया जाता है। हिन्दी भाषा वस्तुतः भारतीयों के अस्तित्व के लिए अंतःसलिला गंगा की तरह है। उसे नैष्ठिक प्रतिबद्धता के बावजूद हिन्दी प्रचार के चोचलों के जरिए न केवल प्रदूषित किया जा रहा है बल्कि उसे मृगतृष्णा में तब्दील किया जा रहा है। यह भाषा पुस्तकालयों, अकादेमियों, शोधपीठों, व्याकरणाचार्यों, प्रकाशन संस्थाओं, साहित्य सम्मेलनों और हिन्दी निदेशालयों का उत्पाद नहीं हैं। वह भारत के एक सौ चालीस करोड़ लोगों के कंठ का गौरवगायन और उनकी आत्मा की अविचल जीवनदायिनी लहर है। 

हिन्दीभाषा के साहित्य में अनुवाद भी एक समस्या है। इसमें कोई शक नहीं कि हिन्दी का श्रेष्ठ लेखन अन्य भाषाओं में अनूदित होना चाहिए। इसके लिए हिन्दीभाषी राज्यों की सरकारें कोई पीठ या अकादमी स्थापित नहीं करतीं। हिन्दी से ज्यादा तो बांग्ला, तमिल, मराठी और गुजराती आदि का साहित्य हिन्दी में अनूदित होकर आता है। हिन्दी के अधिकारी विद्वान भी अपनी रचना हिन्दी में करने के अतिरिक्त भारतीय और विदेशी भाषाओं के श्रेष्ठ साहित्य का अनुवाद हिन्दी में प्रतिबद्ध भावना के साथ एक महत्वपूर्ण कर्तव्य की तरह नहीं करते। छत्तीसगढ़ के माधवराव सप्रे इसका एक अपवाद हैं। उन्होंने तिलक के गीता रहस्य के अतिरिक्त समर्थ रामदास के भावबोध का अनुवाद बीसवीं सदी के शुरू में ही कर दिया था। असल में हिन्दी की अस्मिता का सवाल आधुनिक भारतीय राष्ट्रबोध से जुडा है। राष्ट्रीय चेतना को विकसित करने में हिन्दी के इतर भाषियों का ऐतिहासिक योगदान रहा है। दयानन्द सरस्वती और महात्मा गांधी गुजराती भाषी थे। लोकमान्य तिलक और गोपालकृष्ण गोखले सहित विनायक दामोदर सावरकर आदि मराठीभाषी थे। विवेकानन्द और रवीन्द्रनाथ टैगोर तथा सुभाषचंद्र बोस बांग्लाभाषी थे। श्रीनिवास शास्त्री, राजगोपालचारी और कई तमाम बुद्धिजीवी दक्षिण भारत के रहे हैं। इन सबने मिलकर सामूहिक राष्ट्रीय सांस्कृतिक संस्कार रचा है। उस गर्भगृह से आधुनिक हिन्दी की प्रसरणशीलता को खुला आकाश मिला है। इसलिए हिन्दी भारती भी है। छायावाद के कवियों ने हिन्दी और राष्ट्रीय आंदोलन को संपृक्त कर अनेक उपलब्धियां हासिल की हैं। यही कारण है कि प्रसाद, निराला, पंत, मैथिलीशरण गुप्त, महादेवी वर्मा आदि का पुनर्जन्म संभव प्रतीत नहीं होता। उर्दू के बड़े शायरों ने भी हिन्दी और उर्दू को संपृक्त कर भाषायी भाईचारा विकसित किया। उससे भी हिन्दी का लेना देना है। इकबाल और नजीर अकबराबादी जैसे बीसियों शायरों ने भाषायी तमीज का बिरवा बोया था। यह दुर्भाग्य है कि वह फसल अंगरेजों का हंसिया काट रहा है।

Ramswaroop Mantri

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