अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

ध्यानसाधना का एक आयाम : संतोषप्रद के प्रति समर्पण

Share

डॉ. विकास मानव 

नकारात्मक से सकारात्मक की ओर चलने के लिए, आत्म-स्मरण की साधना के लिए सूत्र :

    “जहां- जहां, जिस काम में, जिस किसी इंसान में संतोष मिलता हो उसके प्रति समर्पित होकर उसे वास्तविक करो।” 

      उदाहरण : प्यास लगी है, पानी पीते हो, उससे एक सूक्ष्म संतोष प्राप्त होता है। पानी को भूल जाओ, प्यास को भी भूल जाओ और जो सूक्ष्म संतोष अनुभव हो रहा है उसके साथ रहो। उस संतोष से भर जाओ, बस संतुष्ट अनुभव करो।

       लेकिन मनुष्य का मन बहुत उपद्रवी है। वह केवल असंतोष और अतृप्ति अनुभव करता है, वह कभी संतोष नहीं अनुभव करता है।

     अगर असंतुष्ट हो तो उसे अनुभव करोगे और असंतोष से भर जाओगे। जब प्यासे हो तो प्यास अनुभव होती है, गला सूखता है। अगर प्यास और बढ़ती है तो वह पूरे शरीर में महसूस होने लगती है। एक क्षण ऐसा भी आता है जब ऐसा नहीं लगता कि मैं प्यासा हूं.  लगता है कि मैं प्यास ही हो गया हूं। अगर किसी मरुस्थल में हो और पानी मिलने की कोई भी आशा नहीं हो तो ऐसा नहीं लगेगा कि मैं प्यासा हूं  लगेगा कि मैं प्यास ही हो गया हूं।

      असंतोष अनुभव में आते हैं, दुख और संताप अनुभव में आते हैं। जब दुख में होते हो तो दुख ही बन जाते हो। यही कारण है कि पूरा जीवन नरक हो जाता है। आप ने कभी विधायकपन को नहीं अनुभव किया है,  सदा अविधायकपन यानि नकारात्मक को अनुभव किया है। जीवन वैसा दुख नहीं है जैसा हमने उसे बना रखा है। दुख हमारी महज व्याख्या है।

बुद्ध यहीं और अभी सुख में हैं, इसी जीवन में सुखी हैं। कृष्ण नाच रहे हैं और बांसुरी बजा रहे हैं। इसी जीवन में यहीं और अभी, जहां हम दुख में हैं, वहीं कृष्ण नाच रहे हैं। जीवन न दुख है और न जीवन आनंद है, दुख और आनंद हमारी व्याख्याएं हैं, हमारी दृष्टियां हैं, हमारे रुझान हैं, हमारे देखने के ढंग हैं। यह आपके मन पर निर्भर है कि वह जीवन को किस तरह लेता है।

     अपने ही जीवन का स्मरण करो और विश्लेषण करो। क्या कभी संतोष के, परितृप्ति के, सुख के, आनंद के क्षणों का हिसाब रखा है? आपने उनका कोई हिसाब नहीं रखा.

     लेकिन आप ने अपने दुख, पीड़ा और संताप का खूब हिसाब रखा है। और आपके पास इसका बड़ा संग्रह है। आप एक संगृहीत नरक हो और यह आपका अपना चुनाव है। कोई दूसरा  इस नरक में नहीं ढकेल रहा है, यह आपका ही चुनाव है।

     मन नकार को पकड़ता है, उसका संग्रह करता है और फिर खुद नकार बन जाता है। और फिर यह दुथ्चक्र हो जाता है।  चित्त में जितना नकार इकट्ठा होता है, उतने ही नकारात्मक हो जाते हो। और फिर नकार का संग्रह बढ़ता जाता है। समान समान को आकर्षित करता है। और यह सिलसिला जन्मों—जन्मों से चल रहा है। आप अपनी नकारात्मक दृष्टि के कारण सब कुछ से चूक रहे हो।

यह ध्यान विधि विधायक दृष्टि देती है। सामान्य मन और उसकी प्रक्रिया के बिलकुल विपरीत है यह विधि।

    जब भी संतोष मिलता हो, जिस किसी कृत्य में भी संतोष मिलता हो, उसे वास्तविक करो, उसे अनुभव करो, उसके साथ हो जाओ। यह संतोष किसी बडे विधायक अस्तित्व की झलक बन सकता है।

     यहां हर चीज महज एक खिड़की है। अगर किसी दुख के साथ तादात्‍मय करते हो तो दुख की खिड़की से झांक रहे हो। दुख और संताप की खिड़की नरक की तरफ ही खुलती है।

    अगर किसी संतोष के क्षण के साथ, आनंद और समाधि के क्षण के साथ एकात्म होते हो तो दूसरी खिड़की खोल रहे हो। अस्तित्व तो वही है, लेकिन आपकी खिडकियां अलग—अलग हैं। इसलिए ‘जहां-जहां, जिस  कृत्य में और जिस किसी व्यक्ति में संतोष मिलता हो, उसे वास्तविक करो।’

     बेशर्त! जहां कहीं भी संतोष मिले, उसे जीओ।  किसी मित्र से मिलते हो और प्रसन्नता अनुभव होती है.  अपनी प्रेमिका या अपने प्रेमी से मिलकर सुख अनुभव होता है। इस अनुभव को वास्तविक बनाओ, उस क्षण सुख ही हो जाओ और उस सुख को द्वार बना लो।

    तब आपका मन बदलने लगेगा और तब सुख इकट्ठा करने लगोगे। तब  मन विधायक होने लगेगा और यही जगत भिन्न दिखने लगेगा।

 जगत वही है, लेकिन कुछ भी वही नहीं है, क्योंकि मन वही नहीं है। सब कुछ वही रहता है, लेकिन कुछ भी वही नहीं रहता है, क्योंकि मैं बदल जाता हूं।

आप संसार को बदलने की कोशिश में लगे रहते हो, लेकिन कुछ भी करो, जगत वही का वही रहता है, क्योंकि आप वही के वही रहते हो।  एक बड़ा घर बना लेते हो,  एक बड़ी कार मिल जाती है, सुंदर पत्नी या पति मिल जाता है, लेकिन उससे कुछ भी नहीं बदलेगा।

    बड़ा घर बड़ा नहीं होगा, सुंदर पत्नी या पति सुंदर नहीं होगा, बड़ी कार भी छोटी ही रहेगी, क्योंकि आप वही के वही हो। आपका मन, आपकी दृष्टि,  रुझान, सब कुछ वही का वही है।  चीजें तो बदल लेते हो, लेकिन अपने को नहीं बदलते।

     एक दुखी आदमी झोपड़ी को छोड़कर महल में रहने लगता है, लेकिन वह वहां भी दुखी आदमी ही रहता है। पहले वह झोपड़ी में दुखी था, अब वह महल में दुखी रहेगा। उसका दुख महल का दुख होगा, लेकिन वह दुखी होगा।

आप अपने साथ अपने दुख लिए चल रहे हो और जहां भी जाओगे अपने साथ रहोगे। इसलिए बुनियादी तौर पर बाहरी बदलाहट बदलाहट नहीं है, वह बदलाहट का आभास भर है।

  आपको लगता है कि बदलाहट हुई, लेकिन दरअसल बदलाहट नहीं होती है। केवल एक बदलाहट, केवल एक क्रांति, केवल एक आमूल रूपांतरण संभव है और वह यह कि आपका चित्त नकारात्मक से विधायक हो जाए। अगर दृष्टि दुख से बंधी है तो नरक में हो और अगर दृष्टि सुख से जुड़ी है तो वही नरक स्वर्ग हो जाता है।

 इस मैडिटेशन मैथड का प्रयोग करो. यह जीवन की गुणवत्ता को रूपांतरित कर देगा।

       लेकिन आप तो गुणवत्ता में नहीं, परिमाण में उत्सुक हो। इसमें उत्सुक हो कि कैसे ज्यादा धन हो जाए।  धन की गुणवत्ता में नहीं, उसके परिमाण में, मात्रा में उत्सुक हो। आपके दो घर हो सकते हैं, चार दो कारें मिल सकती हैं, बैंक में खाता बड़ा हो सकता है, बहुत चीजें हो सकती हैं, लेकिन यह सब परिमाण की बदलाहट है। परिमाण बड़ा होता जाता है, लेकिन गुणवत्ता वही की वही रहती है।

संपदा चीजों की नहीं होती, संपदा तो चित्त की गुणवत्ता है, वह जीवन की गुणवत्ता है। जहां तक गुणवत्ता का सवाल है, एक दरिद्र आदमी भी धनी हो सकता है और एक अमीर आदमी दरिद्र हो सकता है।

     सच्चाई यही है, क्योंकि जो व्यक्ति चीजों और चीजों के परिमाण में उत्सुक है वह इस बात से सर्वथा अपरिचित है कि उसके भीतर एक और भी आयाम है, वह गुणवत्ता का आयाम है। वह आयाम तभी बदलता है आपका मन विधायक हो।

दिनभर यह स्मरण रहे जब भी कुछ सुंदर और संतोषजनक हो, जब भी कुछ आनंददायक अनुभव आए, उसके प्रति बोधपूर्ण होओ। चौबीस घंटों में ऐसे अनेक क्षण आते हैं—सौंदर्य, संतोष और आनंद के क्षण—ऐसे अनेक क्षण आते हैं जब स्वर्ग आपके बिलकुल करीब होता है। लेकिन आप नरक से इतने आसक्‍त हो, इतने बंधे हो कि उन क्षणों को चूकते चले जाते हो।

    सूरज उगता है, फूल खिलते हैं, पक्षी चहचहाते हैं, पेड़ों से होकर हवा गुजरती है। वैसे क्षण घटित हो रहे हैं! एक बच्चा निर्दोष आंखों से आपको निहारता है और आपके भीतर एक सूक्ष्म सुख का भाव उदित हो जाता है; या किसी की मुस्कुराहट तुम्हें आह्लाद से भर देती है। आप जड़, पत्थर.

    अपने चारों ओर देखो और उसे खोजो जो आनंददायक है और उससे पूरित हो जाओ, भर जाओ। उसका स्वाद लो, उससे भर जाओ और उसे अपने पूरे प्राणों पर छा जाने दो, उसके साथ एक हो जाओ।

    उसकी सुगंध आपके साथ रहेगी। वह अनुभूति पूरे दिन भीतर गूंजती रहेगी। वह अनुगूंज ज्यादा विधायक होने में सहयोग देगी।

    यह प्रक्रिया भी और—और बढ़ती जाती है :  यदि सुबह शुरू करो तो शाम तक सितारों के प्रति, चांद के प्रति, रात के प्रति, अंधेरे के प्रति ज्यादा खुले होगे। इसे एक चौबीस घंटे प्रयोग की तरह करो और देखो कि कैसा लगता है।

     एक बार आप ने जान लिया कि विधायकता आपको दूसरे ही जगत में ले जाती है तो उससे कभी अलग नहीं होगे। तब आपका पूरा दृष्टिकोण नकार से सकार में बदल जाएगा। तब संसार को एक भिन्न दृष्टि से, एक नयी दृष्टि से देखोगे।

बुद्ध का एक शिष्य पूर्णकाश्यप अपने गुरु से विदा ले रहा है। बुद्ध से पूछा कि मैं आपका संदेश लेकर कहां जाऊं.

    बुद्ध ने कहा कि तुम खुद ही चुन लो। पूर्णकाश्यप ने कहा कि मैं बिहार के एक सुदूर हिस्से की तरफ जाऊंगा—उसका नाम सूखा है—मैं सूखा प्रांत की तरफ जाऊंगा।

  बुद्ध ने कहा कि अच्छा हो कि तुम अपना निर्णय बदल लो, तुम किसी और जगह जाओ, क्योंकि सूखा प्रांत के लोग बड़े क्रूर, हिंसक और दुष्ट हैं। और अब तक कोई व्यक्ति वहां उन्हें अहिंसा, प्रेम और करुणा का उपदेश सुनाने नहीं गया है। इसलिए अपना चुनाव बदल डालों।

पूर्णकाश्यप ने कहा : मुझे जाने की आज्ञा दें, क्योंकि वहां कोई नहीं गया है और किसी को तो जाना ही चाहिए।

     बुद्ध ने कहा कि इसके पहले कि मैं तुम्हें वहां जाने की आज्ञा दूं मैं तुमसे तीन प्रश्न पूछना चाहता हूं।

  (1). अगर उस प्रांत के लोग तुम्हारा अपमान करें तो तुम्हें कैसा लगेगा?

 ~ मैं समझूंगा कि वे बड़े अच्छे लोग हैं जो केवल अपमान करते हैं, मुझे मार तो नहीं रहे हैं। वे अच्छे लोग हैं; वे मुझे मार भी सकते थे।

    (2). अगर वे लोग तुम्हें मारें—पीटें भी तो तुम्हें कैसा लगेगा?

    ~मैं समझूंगा कि वे बड़े अच्छे लोग हैं। वे मेरी हत्या भी कर सकते थे, लेकिन वे मुझे सिर्फ पीट रहे हैं।

   (3). अगर वे लोग तुम्हारी हत्या कर दें तो मरने के क्षण में तुम कैसा अनुभव करोगे?

 ~मैं आपको और उन लोगों को धन्यवाद दूंगा। अगर वे मेरी हत्या कर देंगे तो वे मुझे उस जीवन से मुक्‍त कर देंगे जिसमें न जाने कितनी गलतियां हो सकती थीं। वे मुझे मुक्‍त कर देंगे इसलिए मैं अनुगृहीत अनुभव करूंगा।

    बुद्ध ने कहा अब तुम कहीं भी जा सकते हो, सारा संसार तुम्हारे लिए स्वर्ग है। अब कोई समस्या नहीं है। सारा जगत तुम्हारे लिए स्वर्ग है, तुम कहीं भी जा सकते हो।

       ऐसे चित्त के साथ जगत में कहीं भी कुछ गलत नहीं है। आपके चित्त के साथ कुछ भी सम्यक नहीं हो सकता, ठीक नहीं हो सकता। नकारात्मक चित्त के साथ सब कुछ गलत हो जाता है। इसलिए नहीं क्योंकि कुछ गलत है, बल्कि इसलिए क्योंकि नकारात्मक चित्त को गलत ही दिखाई पड़ता है।

इस ध्यान विधि की यह एक बहुत ही नाजुक प्रक्रिया है, लेकिन बहुत मीठी भी है। इसमें जितनी गति करोगे, यह उतनी मीठी होती जाएगी। एक नयी मिठास और सुगंध से भर जाओगे।

    बस सुंदर को खोजो, कुरूप को भूल जाओ। तब एक क्षण आता है जब कुरूप भी सुंदर हो जाता है। सुखी क्षण की खोज करो, और तब एक क्षण आता है जब कोई दुख नहीं रह जाता है। तब कोई दुख का क्षण नहीं रह जाता है। आनंद की फिक्र करो, और तब देर— अबेर दुख तिरोहित हो जाता है। विधायक/सकारात्मक चित्त के लिए सब कुछ सुंदर है, आनंदप्रद है।

Ramswaroop Mantri

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें