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हमारी भाषाई संस्कृति : भाषा में साझा को अलग नहीं कर सकती विनाशक शक्तियाँ

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पुष्पा गुप्ता (महमूदाबाद)

_भाषा वैज्ञानिक हिंदी और उर्दू को एक भाषा मानते हैं क्योंकि दोनों का व्याकरण एक है। लेकिन भारतीय संविधान इन्हें दो भाषएँ मानता है।_
   व्यावहारिक दृष्टि से अगर कोई अंतर दिखाई पड़ता है तो वह लिपि का अंतर है।
   _उर्दू अरबी- फारसी लिपि में लिखी जाती है और हिंदी देवनागरी लिपि में। लेकिन लिपि को भाषा की अलग पहचान का आधार नहीं माना जाता।_
जैसे कोई हिंदी का एक वाक्य अगर रोमन लिपि में लिख दे तो वह अंग्रेजी नहीं मानी जाएगी।

हिंदी उर्दू बोलने वाले एक दूसरे की भाषा को अच्छी तरह समझते हैं। लेकिन जब कहीं पारिभाषिक शब्द आ जाते हैं तो उन्हें समझना थोड़ा कठिन होता है। और पारिभाषिक शब्द न आएं ,बोलचाल की, रोज़मर्रा की भाषा रहे तो यह कहना असम्भव हो जाता है कि यह हिंदी है या उर्दू ।
नाटक की भाषा बोलचाल की भाषा है। वह लिखी नहीं जा रही। मंच पर बोली जा रही है। हिंदी और उर्दू बोलने वालों की समझ में आ रही है तो उसे क्या कहेंगे ?
गांधीजी उसे ‘हिंदुस्तानी’ कहा करते थे लेकिन ‘हिंदुस्तानी’ के साथ दिक्कत यही थी कि पारिभाषिक शब्द आते ही वह ‘हिंदुस्तानी’ नहीं रहती थी।

उर्दू के विद्वान उर्दू का पहला नाटक वाजिद अली शाह के लिखे नाटक ‘राधा कन्हैया का किस्सा’ 1843-45 ई. को मानते हैं. दूसरा नाटक ‘इंदरसभा’ (1851-52) है जो सैयद आगा हसन ‘अमानत’ ने लिखा था।
ये दोनों नाटक अगर मंच पर खेले जाएं तो इनका विषय और भाषा हिंदी वाले भी समझेंगे और उर्दू वाले भी समझेंगे । और उनकी भाषा को न केवल हिंदी कह सकेंगे और न केवल उर्दू कह सकेंगे।
तब?
मान लीजिए किसी नाटक में हिंदी के तत्सम शब्द और किसी दूसरे नाटक में फारसी और अरबी के शब्द अधिक हैं जिन्हें समझना कठिन हो रहा है।
तब क्या यह कहा जा सकता है कि जिस नाटक में हिंदी के तत्सम शब्द आ गए हैं वह हिंदी का नाटक है और जिस में फ़ारसी अरबी के आ गए हैं वह उर्दू का नाटक है? मेरे विचार से शायद नहीं। केवल यह कहा जा सकता है कि नाटक में कुछ शब्द ऐसे हैं जिन्हें हम नहीं जानते।
शब्दों को न जानना एक साधारण बात है। उन्हें शब्दकोश में देखा और समझा जा सकता है।
ऐसी स्थिति में हिंदी उर्दू की अलग पहचान क्या होगी?
विरासत में साझा इतना मज़बूत और गहरा है कि विनाशक शक्तियों द्वारा अलग किया ही नहीं जा सकता।

Ramswaroop Mantri

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