अग्नि आलोक
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भारतीय संस्कृति और दर्शन की साररूप रूपरेखा

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 डॉ. प्रिया मानवी

      _ऋगवेदिक काल (1500-1000ई पू )के आर्य जनों की संस्कृति कबीलाई थी जिनके जीवन का मुख्य साधन पशुपालन था ।वे बहुदेव वादी (polytheistic ) थे।उन्होंने प्रकृति के विविध रूपों का दैवीकरण और देवताओं का मानवीकरण किया था। वे इहलौकिक और भौतिक सुख वादी थे।_

    उनकी पूजा पद्धति अत्यंत सरल थी जिनमें देवताओं को सहज उपलब्ध भोज्य पदार्थों की बलि दी जाती थी और सरल रीति से यज्ञ संपन्न किए जाते थे।इस काल में इन्द्र ,अग्नि ,वरुण आर्यों के प्रमुख देवता थे।

आत्मा ,परमात्मा ,पुनर्जन्म ,भक्ति ,निवृत्ति और मोक्ष का उन्हें  कोई खयाल तक नहीं था।

     _वे अमरता चाहते थे ,मगर दुनिया के दुखों से मुक्ति के लिए नहीं अपितु दुनिया के सुख सदा सदा  प्राप्त करते रहने  के लिए।उन्हें किसी परम सत्य का आभास अवश्य था किन्तु सृष्टि निर्माता और नियंता किसी वैयक्तिक ईश्वर के संबंध में उनकी कोई सोच नहीं थी।_

     सृष्टि कब ,कैसे बनी और उसे किसने बनाया? ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में इन गूढ़ प्रश्नों पर अनभिज्ञता और विस्मय प्रकट किया गया है :

    “तब शून्य भी नहीं था ,न अस्तित्व 

उस समय वायु नहीं था और न ही आकाश. कौन इसे ढके हुए था? वह कहाँ थी और किसके संरक्षण में थी?

क्या उस समय सृष्टि में जल ही जल था अथाह गहराइयों में ? आख़िर कौन जानता है यह सब कहाँ से आया और कैसे बनी सृष्टि? देवता स्वयं सृष्टि के बाद आए. कौन ठीक ठीक जानता है कि सृष्टि का उद्भव कहाँ से हुआ?”

उत्तर वैदिक काल (1000 – 600 ई पू ) में आर्य गंगा घाटी सहित विंध्य पार दक्षिण की नदी घाटियों और समुद्र तटों तक के इलाक़ों में बस गए थे और अब उनकी जीविका का मुख्य साधन पशुचारण की जगह कृषि हो गया था।

        इस काल में उन्होंने तीन वैदिक संहिताओं (यजु ,साम ,अथर्व ), ब्राह्मण , आरण्यक व प्रमुख उपनिषदों की रचना कर ली थी। इन 400 सालों में उनकी पूजा पद्धति और मान्यताओं में काफ़ी बदलाव आ चुका था।

      _उनके यज्ञ और कर्मकांड धीरे धीरे अत्यंत जटिल बहुसंख्य और खर्चीले होते गए थे।ऋग्वेद के बाद की वैदिक संहिताओं में प्रजापति ,विष्णु और रुद्र देवताओं को प्रमुखता मिली जो आगे चल कर  ब्रह्मा, विष्णु और शिव के पौराणिक त्रिदेव में रूपान्तरित हो गए।_

      किन्तु वेदों के प्रजापति , विष्णु और रुद्र का स्वरूप पौराणिक ब्रह्मा , विष्णु , शिव से बहुत अलग था। इन संहिताओं और ब्राह्मण ग्रंथों में अनेक देवताओं के निमित्त यज्ञ ,बलि ,स्तुति के साथ कर्मकांडों का ही प्राधान्य रहा ।मगर इस काल में इतना बदलाव ज़रूर हुआ कि आर्य इहलोक के साथ साथ परलोक की भी फ़िक्र करने लगे।

        धीरे धीरे बढ़ती हुई याज्ञिक पशुहिंसा तथा पुरोहितवाद के विरुद्ध प्रतिकृया होने लगी और वेदों के अन्त में रचे गए आरण्यक व उपनिषदों में -मैं कौन हूँ ,कहाँ से आया और कहाँ जाऊँगा ,जगत क्या है ,मृत्यु के बाद क्या? जैसे जीवन के गूढ़ प्रश्नों पर विचार किया जाने लगा। वेदों की अन्तिम रचना होने के कारण उपनिषदों को वेदान्त कहा गया।

वैदिक संहिताएं और ब्राह्मण ग्रंथ जो मुख्यतः याज्ञिक प्रविधि तय करते हैं का प्रतिपाद्य कर्मकाण्डीय है जब कि उपनिषद वेदों में अन्तर्निहित सूक्ष्म ज्ञान की विवेचना करते हैं , इसलिए उनके प्रतिपाद्य को ज्ञानकांडीय कहा जाता है।

      _उपनिषद कर्म व यज्ञ कांडीय संहिताओं व ब्राह्मणों का यद्यपि अनादर नहीं करते किंतु यह मानते हैं कि वैदिक यज्ञों व कर्मकांडों से सिर्फ़ नश्वर सुख प्राप्त हो सकता है जो कि यथेष्ट नहीं है। उनके अनुसार मनुष्य का असली लक्ष्य मोक्ष अथवा जन्म -मृत्यु के बंधन से छुटकारा प्राप्त करना है।_

      उपनिषद शरीर से भिन्न आत्मा और भौतिक जगत  से भिन्न परमात्मा या परब्रह्म  की परिकल्पना करते हैं।इसके अतिरिक्त वे कर्म -फल तथा पुनर्जन्म का सिद्धान्त भी प्रतिपादित करते हैं। ये उपनिषद ही वैदिक धारा में विकसित षडदर्शन की आधारशिला हैं।

     _उल्लेखनीय है कि उपनिषदों का एक मात्र परम और चरम सत्य ब्रह्म है जो निराकार , निर्गुण , निर्विकार , नित्य और अक्षर है।उपनिषद और वैदिक धारा के दर्शनशास्त्र के तीन युग्म (न्याय-वैशेषिक ,सांख्य -योग , पूर्वमीमांसा – उत्तर मीमांसा (वेदान्त ) किसी स्रष्टा ,नियंता वैयक्तिक ईश्वर तथा उसके अवतारों की  अवधारणा प्रस्तुत नहीं करते। उपनिषदों का ब्रह्म एकत्व (monism ) या एकमात्र परम चेतन तत्व (one supreme consciousness ) तो प्रतिपादित करता है किन्तु एकेश्वरवाद (monotheism ) नहीं।_

        षट् दर्शन में किस तरह अनीश्वरवादी दर्शन है यह आप किसी भी स्तरीय दर्शन की पुस्तक में पढ़ सकते हैं। 

वेदोत्तर काल (600 ई पू के बाद ) भारत में दूसरे नगरीकरण का काल है।यह शहरीकरण 200 ई पू -300-ई के मध्य अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया था जिसका मुख्य कारण रोमन साम्राज्य तथा दक्षिण पूर्व एशिया के साथ भारत का निरंतर बढ़ता हुआ व्यापार था जिसका संतुलन भारत के पक्ष में झुका रहता था।

      _माना जाता है कि वैयक्तिक ईश्वर ,अवतारवाद ,मूर्ति पूजा जो वर्तमान में लोकप्रिय और लोकप्रचलित हिन्दू धर्म के मुख्य अधिष्ठान हैं और जिसे वैदिक /सनातन / ब्राह्मण धर्म के नाम से जानते हैं ,का विधान देने वाले पुराण साहित्य की रचना इसी काल खंड में शुरू हुई थी।_

      पुराणों में प्रतिपादित धर्म वैदिक ऋचाओं /मंत्रों एवं ब्राह्मण ग्रंथों में वर्णित यज्ञों ,कर्म कांडों तथा अनुष्ठानों से बिलकुल अलग है।.

      वेदों के देवता इंद्र ,अग्नि ,वरुण ,सोम ,सविता ,पूषन ,यम ,प्रजापति ,ऊषा ,नदीतमा ,अरण्यानी आदि कहीं नेपथ्य में खो गए या हाशिए पर डाल दिए गए और उनकी जगह ब्रह्मा ,विष्णु ,शिव का त्रिदेवत्व स्थापित हो गया।

     त्रिदेवों में भी सिर्फ़  विष्णु और शिव की ही पूजा प्रचलित हुई और उनमें भी अवतार लेने का दायित्व सिर्फ़ विष्णु के हिस्से में आया।

एकेश्वरवाद ,पैगंबरवाद तथा स्वर्ग -नरक की अवधारणा सर्वप्रथम जरथुस्त्र धर्म में पैदा हुई थी।

     पारसियों के संपर्क से या फिर स्वतंत्र रूप से ये अवधारणाएँ यहूदी धर्म में और ज्यादा  व्यवस्थित रूप में शामिल हुईं प्रथम सदी ई में ईसा मसीह के शिष्यों द्वारा स्थापित ईसाई धर्म में भी ये धारणाएँ शामिल रहीं।

      पहली सदी ई में कुषाण सम्राट कनिष्क के अधीन चौथी बौद्ध संगीति में बुद्ध के सरल -सुगम मार्ग का हीन यान और महायान में विभाजन हुआ।

       _महायानियों ने बुद्ध को ईश्वर मान लिया , मूर्तियाँ बना कर उनकी पूजा करने लगे तथा बोधिसत्वों के रूप में उनके अवतारों की भी कल्पना कर डाली।

       इतिहासकार रोमिला थापर कहती हैं कि महायान बौद्ध मत के कुछ ऐसे भी रूप हैं जिनका जन्म भारत से बाहर हुआ प्रतीत होता है।

        संसार की रक्षा के लिए मैत्रेय बुद्ध के आगमन का विचार एक ऐसा ही विचार है। बोधिसत्व जो स्वयं यातना सह कर मानवता को मुक्ति दिलाता है ,की अवधारणा स्पष्टतः तत्कालीन फ़िलिस्तीन में प्रचलित हो रही मसीही परिकल्पना से प्रभावित है।

       ईसा की पहली सदी में ईसाई मत पैदा हो गया था।

आश्चर्य नहीं कि व्यापारिक संबंधों के ज़रिए रोमन साम्राज्य के अधीन फ़िलिस्तीन के यहूदी और ईसाई धार्मिक विचारों का प्रवेश पहले दक्षिण भारत में और बाद में उत्तर भारत में पहुँचा हो।

      _ऐसा विश्वास किया जाता है कि महायान विचारधारा का जन्म लगभग पहली शताब्दी ई पू में हुआ था। इस विचारधारा के सर्वाधिक मशहूर दार्शनिक आचार्य  नागार्जुन थे जिन्हें बौद्ध मत का संत पाल कहा जाता है।_

      इस बात की पूरी संभावना है कि नागार्जुन के महायानी विचारों के विकास में यहूदी -ईसाई मतों के वैयक्तिक ईश्वर तथा मसीहा -पैगंबर वाद का प्रभाव पड़ा हो। उत्तर भारत में पहली सदी ई में कुषाणों का शासन था।

      उनके साम्राज्य में उत्तरी भारत , मध्येशिया , बैक्टिरिया और फ़ारस का कुछ भाग शामिल था जिसके कारण स्थल मार्ग से होने वाले व्यापार तथा राजनैतिक आवा जाही के ज़रिए भी जरथुस्त्री ,यहूदी -ईसाई धार्मिक विचार भारत में अवश्य पहुँचे होंगे जिनका प्रभाव भारत के बौद्ध और ब्राह्मण धर्म पर पड़ना स्वाभाविक था।

बाहर से आए जरथुस्री ,यहूदी -ईसाई तथा बौद्ध मत के प्रभाव से शिल्प व्यापार के चरमोत्कर्ष के इस काल खंड (20ई पू -300ई ) में ब्राह्मण धर्म अछूता नहीं रहा। इस प्रभाव के कारण ही ब्राह्मण धर्म से कुछ वैदिक देवता लुप्त हो गए और कुछ ने अतिरिक्त या नवीन विशेषताओं के साथ नया रूप ग्रहण किया , वैदिक यज्ञों ,अनुष्ठानों और जटिल कर्मकांडों का चलन काफ़ी कम हो गया , अधर्म के नाश और धर्म की स्थापना के लिए विष्णु के अवतारों का विचार स्थापित हुआ तथा ईश्वर और भक्त के मध्य व्यक्तिगत संबंध की संकल्पना की गई।

      _आगे चलकर ईश्वर भक्ति की संकल्पना हिंदू /ब्राह्मण धर्म की प्रबल शक्ति बन गई। इन नए धार्मिक विचारों को विपुल पुराण साहित्य में शामिल किया गया। यह पौराणिक धर्म था जो वेदों के अनुसरण का दावा ज़रूर करता है मगर उससे इतना अलग है कि बाह्य परंपरा का व्यक्ति दोनों को समान नहीं मान सकता।_

       {चेतना विकास मिशन)

Ramswaroop Mantri

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