शैलेन्द्र चौहान
हिंदी सिनेमा का इतिहास केवल मनोरंजन का इतिहास नहीं है, वह भारतीय समाज की इच्छाओं, कुंठाओं, नैतिकताओं, पाखंडों और बदलते मूल्यबोध का भी दर्पण रहा है। अत्यधिक भावुकता, सतही स्त्री–पुरुष प्रेम, लंपटता और अश्लीलता—ये प्रवृत्तियाँ किसी एक दौर की उपज नहीं हैं, बल्कि समय–समय पर अलग-अलग रूपों में उभरती रही हैं। फर्क केवल इतना है कि पहले वे संकोच, प्रतीक और परदे के भीतर थीं, और आज खुलापन, बाज़ार और दृश्य-आक्रामकता के साथ सामने हैं।
प्रारंभिक हिंदी सिनेमा, विशेषकर 1930–40 के दशक में, भारतीय रंगमंच, पारसी थिएटर और लोककथाओं की परंपरा से गहरे जुड़ा था। उस दौर की भावुकता को यदि आज की दृष्टि से देखा जाए तो वह अतिरंजित प्रतीत होती है—लंबे संवाद, करुणा से भरे दृश्य, त्याग और बलिदान की चरम स्थितियाँ। लेकिन यह भावुकता सतही नहीं थी; वह सामाजिक यथार्थ, नैतिक संघर्ष और सामूहिक संवेदना से जुड़ी थी। ‘देवदास’, ‘अछूत कन्या’ या ‘दो बीघा ज़मीन’ जैसी फ़िल्मों में प्रेम और पीड़ा निजी होते हुए भी सामाजिक संरचना से टकराते हैं। यहाँ आँसू सस्ते नहीं, बल्कि व्यवस्था की कठोरता का परिणाम होते हैं।
1950 और 60 का दशक हिंदी सिनेमा का स्वर्णकाल माना जाता है। यह वह समय था जब प्रेम को कविता, गीत और प्रतीकों के माध्यम से रचा गया। स्त्री–पुरुष संबंधों में मर्यादा, आकांक्षा और असफलता की पीड़ा थी। यश चोपड़ा, बिमल रॉय, गुरुदत्त और राज कपूर जैसे निर्देशकों ने प्रेम को सामाजिक यथार्थ के भीतर रखा। हालांकि यहाँ भी भावुकता प्रचुर थी, पर वह मनोवैज्ञानिक और सौंदर्यपरक थी। ‘प्यासा’ या ‘काग़ज़ के फूल’ में प्रेम आत्मसम्मान, रचनात्मकता और अस्तित्व के संकट से जुड़ा है, न कि केवल देह या तात्कालिक आकर्षण से।
सतही प्रेम और लंपटता की जड़ें वास्तव में 1970 के दशक के बाद गहराई से फैलती दिखती हैं। इस दौर में एक ओर ‘एंग्री यंग मैन’ का उदय हुआ, दूसरी ओर समानांतर सिनेमा ने यथार्थवादी विकल्प दिया। मुख्यधारा के सिनेमा में प्रेम धीरे-धीरे संघर्ष से कटकर मनोरंजन का उपकरण बनने लगा। नायिका का सौंदर्य, गीतों में देह-प्रदर्शन और नायक की मर्दानगी—ये सब बॉक्स ऑफिस के सूत्र बनते गए। स्त्री अक्सर या तो आदर्श प्रेमिका थी या केवल आकर्षण की वस्तु।
1980–90 का दशक हिंदी सिनेमा के लिए संक्रमण का काल रहा। वीडियो, टेलीविज़न और बाद में सैटेलाइट चैनलों ने दर्शक की रुचि को तेज़ और उथला बनाया। इसी समय ‘आइटम नंबर’ संस्कृति की नींव पड़ी। प्रेम अब कथानक की आत्मा नहीं, बल्कि गीतों और दृश्य उत्तेजना का बहाना बन गया। लंपटता यहाँ खुले रूप में नहीं, बल्कि हास्य, द्विअर्थी संवादों और कैमरे की नज़र के ज़रिये उपस्थित रही। स्त्री शरीर पर टिकी निगाहें सामान्य और स्वीकृत होती चली गईं।
इक्कीसवीं सदी में प्रवेश के साथ वैश्वीकरण और बाज़ारवाद ने हिंदी सिनेमा को पूरी तरह बदल दिया। मल्टीप्लेक्स संस्कृति, सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ने दर्शक को उपभोक्ता में बदल दिया। यहाँ अत्यधिक भावुकता अब आँसुओं में नहीं, बल्कि ‘इमोशनल मैनिपुलेशन’ में दिखाई देती है—बैकग्राउंड म्यूज़िक, स्लो मोशन, और बनावटी संवादों के ज़रिये। प्रेम संबंध सतही हो गए हैं—पहली नज़र, त्वरित आकर्षण, और शीघ्र शारीरिक निकटता। संघर्ष, सामाजिक दबाव या नैतिक द्वंद्व लगभग गायब हैं।
वर्तमान हिंदी सिनेमा में लंपटता और अश्लीलता अक्सर ‘बोल्डनेस’ और ‘रियलिज़्म’ के नाम पर पेश की जाती है। समस्या यह नहीं है कि देह या यौनिकता दिखाई जाती है; समस्या यह है कि वह संदर्भविहीन और बाज़ारोन्मुख हो गई है। स्त्री की स्वतंत्रता को अक्सर उसकी देह की उपलब्धता से जोड़ दिया जाता है, जबकि पुरुष की लंपटता को हास्य या ‘चार्म’ के रूप में वैध ठहराया जाता है। यह प्रवृत्ति समाज की असमानताओं को चुनौती देने के बजाय उन्हें और मज़बूत करती है।
इतिहास पर दृष्टि डालें तो स्पष्ट होता है कि हिंदी सिनेमा की भावुकता कभी सामाजिक करुणा से उपजी थी, प्रेम कभी मानवीय आकांक्षा का रूप था, और मर्यादा एक सांस्कृतिक संतुलन का संकेत थी। आज वही तत्व बाज़ार के दबाव में विकृत हो गए हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि वर्तमान मुख्यधारा सिनेमा में प्रेम का सरलीकरण, भावुकता का दोहन और देह का वस्तुकरण एक साथ चल रहा है।
फिर भी, पूरी तस्वीर निराशाजनक नहीं है। समानांतर प्रयास, कुछ संवेदनशील निर्देशक और ओटीटी के सीमित लेकिन साहसी प्रयोग यह संकेत देते हैं कि हिंदी सिनेमा पूरी तरह आत्मविस्मृत नहीं हुआ है। प्रश्न केवल यह है कि क्या सिनेमा फिर से प्रेम को मानवीय गरिमा, भावुकता को सामाजिक चेतना और स्त्री–पुरुष संबंधों को बराबरी के धरातल पर देखने का साहस करेगा—या वह बाज़ार की ताल पर ही नाचता रहेगा।
हिंदी सिनेमा का इतिहास हमें यही सिखाता है कि वह जैसा समाज होता है, वैसा ही सिनेमा गढ़ता है—और जैसा सिनेमा होता है, वह समाज की संवेदना को भी गढ़ता है। इसलिए इस विमर्श का महत्व केवल कला तक सीमित नहीं, बल्कि हमारे सामूहिक नैतिक और सांस्कृतिक भविष्य से जुड़ा हुआ है।
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