*सुसंस्कृति परिहार
पिछले दो तीन मामले ऐसे हैं जिनमें सरकार ने ताबड़तोड़ तरीके से जो कानून बनाए ज़रूर लेकिन फिर जन आंदोलनों की वजह से उस कानून के परिपालन से भागने मज़बूर हुई।इसे जनतंत्र की जीत के रुप में दर्ज किया जा सकता है लेकिन ये तीनों कानून वापिस नहीं लिए गए और लगता है कि 2024 के आमचुनाव के बाद यदि यही सरकार आती है तो ये कानून निश्चित तौर पर,सख़्ती से लागू हो सकते हैं।अभी सरकार की मज़बूरी है इसीलिए मुगालते में ना रहकर इन कानूनों को समाप्त कराने की बात हो तो उचित होगा।
हाल ही में हिट एंड रन कानून 2023 ड्राईवरों के लिए उसमें जो कानून हैं उसके तहत् यदि दुर्घटना में किसी की मृत्यु हो जाती है और यदि ड्राइवर भागेगा तो उसे सात लाख का जुर्माना और दस साल की सजा होगी।इस कानून को बनाते समय ना तो ये सोचा गया कि यदि ड्राइवर भागता नहीं है तो उग्र भीड़ उसे मार सकती है।दूसरा 10 से 15000 वेतन भोगी इतना जुर्माना कैसे भरेंगे। इसलिए जबरदस्त विरोध हुआ। करोड़ों का व्यापारियों को नुकसान हुआ आम लोगों को डीजल पेट्रोल,दूध सब्जियां आदि की क़िल्लत हुई।तब जाके कानून फिलहाल लागू होने से रोक दिया गया।क्या गारंटी है यह फिर लागू होगा या नहीं।नव वर्ष का पहला और दूसरा दिन परेशानियों की भेंट चढ़ गया। आगे आगे देखिए क्या होगा?
याद करिए सीएए कानून के अन्तर्गत कितना हंगामा हुआ।गौरतलब है कि भारत सरकार द्वारा लाए गए सीएए के तहत बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से 31 दिसंबर 2014 तक भारत आए प्रताड़ित गैर-मुस्लिम प्रवासियों-हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई-को भारत की नागरिकता प्रदान की जाएगी।15 दिसंबर 2019 को शाहीन बाग की महिलाओं ने सीएए-एनआरसी और जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्रों पर पुलिस की बर्बर कार्रवाई के खिलाफ अपना आंदोलन शुरू किया था. यह आंदोलन ‘नेताविहीन’ था और इसे महिलाओं के बड़े
सत्याग्रह के रूप में जाना जाता है।यह तीन माह से अधिक चला।24 मार्च 2020 को कोरोना की वजह से आंदोलनकारी महिलाएं धरना स्थल से उठ गईं थी।इस आंदोलन में देश भर में 25लोग मारे गए पहली शहादत असम के 17वर्षीय युवा ने दी थी।
नागरिकता संशोधन अधिनियम’ (CAA) को दिसंबर 2019 में संसद से मंजूरी मिली थी CAA 2024 के लोकसभा चुनाव की घोषणा के पहले क्रियान्वित हो सकता है। इसके लिए एक पोर्टल भी तैयार कर लिया गया है। केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने पिछले साल 27दिसम्बर को कहा था कि :सीएए के कार्यान्वयन को कोई नहीं रोक सकता है क्योंकि ये देश का कानून हैं और इसे लागू करने भाजपा प्रतिबद्ध है।’
इससे पहले 1920-21 में किसान आंदोलन जो दुनियां के इतिहास का सबसे अधिक चलने वाला आंदोलन कृषक विरोधी तीन काले कानून वापसी के लिए हुआ। किसानों 378 दिन चला उन्होंने ग्रीष्म,वर्षा और कड़कड़ाती ठंड को झेला। वे संसद ना पहुंचे उसके लिए कीलें गाड़ी गई।किसान सभा के नेताओं से बात चलती टूटती रही। बाद में मोदीजी के इस ऐलान के बाद कि तीनों काले कानून वापस लिए जाएंगे आंदोलन समाप्त हुआ किंतु नेता डटे रहे हटे नहीं जब तक सदन ने कानून वापस नहीं ले लिए।मगर इतने संघर्ष के बाद आज भी एमएसपी का मामला जस का तस है और कानूनों के कथित तौर पर हट जाने के बावजूद कारपोरेट को वहीं फायदे अप्रत्यक्ष तौर पर दिए जा रहे हैं जिनके विरोध में 734 किसानों ने अपनी शहादत दी। दुःखद तो यह है कि एक मंत्री के बेटे ने प्रदर्शन से लौट रहे किसानों पर थार गाड़ी चढ़ाकर 8 किसानों की लखीमपुर खीरी में हत्या कर दी मगर किसानों के इस बहते लहू से भी सरकार पर कोई फ़र्क नहीं पड़ा।
कुल मिलाकर लगता है कि सरकार अपनी मंशा पूरी करने प्रतिबद्ध है बीच में आमचुनाव में जो सहूलियतें मिल रही हैं वे चुनावी रेवड़ियां हैं। भगवान रामजी का मंदिर, जिसमें मंदिर पूर्ण हुए बिना प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम भी शीध्रता से होना चुनाव में ध्रुवीकरण को साधना है।इसी बीच आचार संहिता से पूर्व यदि बहुचर्चित सीएए कानून एक्शन में आता है तो बहुसंख्यक लोगों का फ़ायदा मिल सकता है।अब यह हम सबको सोचना है कि हम अपने देश को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं और इसके लिए क्या कर सकते हैं। बहरहाल लोग बने हुए कानून के प्रति सशंकित है। उनके इस भय को दूर करना चाहिए।




