राजेश ज्वेल
कांग्रेस के 50 सालों का हिसाब 7 सालों से मोदी जी सहित पूरी भाजपा और भक्त बिरादरी रात-दिन मांगती रही है, जिसमें कोई बुराई भी नहीं… जो सत्ता में है या रहा, सवाल भी उसी से पूछे जाना चाहिए… नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह के गड़े मुर्दे उखाडऩे वालों से देश की जनता अब मात्र 50 दिनों का हिसाब-किताब ही मांगे…!इसमें कोई दो मत नहीं कि कोरोना एक महामारी है, जिससे दुनिया की महाशक्ति भी नहीं बच सकी तो हम किस खेत की मूली हैं… लेकिन सवाल यह है कि इस महामारी से निपटने के हमने क्या प्रयास किए..? जब मार्च की शुरुआत में महाराष्ट्र सहित कुछ हिस्सों में कोरोना संक्रमण बढऩे लगा और साल भर से सारे विशेषज्ञ-डॉक्टर आगाह करते रहे कि कोरोना की सेकंड वेव अधिक घातक होगी… लेकिन मोदी सरकार ने इन चेतावनियों पर ध्यान नहीं दिया और चुनावी प्रबंधन में पूरी ताकत से जुटे रहे…इतना ही नही मोदी -शाह की जोड़ी ने अपने साथ मध्यप्रदेश सहित अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों-मंत्रियों और अन्य नेताओं को भी इन चुनावों में झोंक दिया… इंदौर के ही कई बड़े नेता और कार्यकर्ता लम्बे समय से बंगाल में पड़े रहे, जो अब लौटे हैं… अगर मोदी जी मार्च के पहले या दूसरे पखवाड़े में ही चुनाव प्रचार छोड़ कोरोना प्रबंधन की बागडोर हाथ में ले लेते और ऑक्सीजन-इंजेक्शन से लेकर बेड की व्यवस्था करवाते तो आज जो भयावह हालात देशभर में दिख रहे हैं उसमें 50 प्रतिशत तक की राहत मिल जाती… मोदी जी कहते हैं कि हमारा फार्मा सेक्टर बड़ा मजबूत है, तो यह बात गलत भी नहीं है लेकिन उसका उपयोग मोदी जी ने क्या किया ?अगर मार्च के महीने में ही दवाइयों-इंजेक्शनों का प्रोडक्शन तेज रफ्तार से शुरू करवा दिया होता तो अभी अप्रैल के पहले हफ्ते से ही इनकी सप्लाय बेहतर हो जाती तो इंजेक्शन के लिए मरीजों के परिजनों को मारे-मारे नहीं फिरना पड़ता और ना कालाबाजारी के शिकार होते… यही स्थिति ऑक्सीजन की है, जिसको लेकर पूरे देश में हाहाकार मचा है… इसका भी बंदोबस्त इन 50 दिनों में आसानी से हो जाता… यहां तक कि 15 से 20 दिन में ही नए ऑक्सीजन प्लांट लग जाते हैं और देश के कई स्थानों पर लग भी गए…लेकिन ये तब होता जब मोदी जी ने मार्च में ही मोर्चा संभाला होता ..देशभर में जितनी भी मेडिकल या इंडस्ट्रियल ऑक्सीजन बन रही है, उसका उत्पादन बढ़वा दिया होता तो आज कई मरीजों की मौतें ऑक्सीजन की कमी या उससे जुड़ी अव्यवस्थाओं के चलते नहीं होती… यह भी सच है कि इस महामारी से हम सभी लोगों को नहीं बचा सकते और हजारों मौतें भी होंगी, मगर हम कितनी जानें बचा पाते हैं, यह महत्वपूर्ण है…आज जो देशभर में भागादौड़ी चल रही है यही मेडिकल आपातकाल अगर मार्च और अप्रैल की शुरुआत में समझ लिया जाता तो आज 100 की बजाय 50 मरीज ही मर रहे होते, ये आधी जानें ऑक्सीजन, इंजेक्शन व बेड के महीने भर पहले किये बेहतर मैनेजमेंट से बच सकती थी.. चुनाव के अलावा कुंभ का आयोजन भी मोदी जी की बड़ी विफलता रही, जिसे बाद में सुधारना पड़ा और कुंभ को प्रतीकात्मक करने का ट्वीट किया हालांकि उसके दो घंटे बाद ही मोदी जी भीड़ भरी सभा को संबोधित कर आनंदित होते भी दिखे… जब पूरा देश कोरोना की भीषण त्रासदी का सामना करता रहा तब मोदी और शाह की चुनावी रैली-रोड शो जारी रहे.. इसी तरह वैक्सीनेशन में भी मोदी सरकार फिसड्डी साबित हुई… तमाम विशेषज्ञ 18 साल से अधिक उम्र को वैक्सीन लगाने का सुझाव देते रहे, जिसे तीन महीने बाद अब माना गया, जबकि अब तक तो एक बड़ी आबादी का वैक्सीनेशन हो जाता, लेकिन वैक्सीन के विश्वगुरु बनने के चक्कर में 7-8 करोड़ वैक्सीन डोज विदेशों में भिजवा दिए और यही गलती ऑक्सीजन सप्लाय के मामले में भी सामने आ रही है… इसी साल जनवरी तक इंडस्ट्रीयल ऑक्सीजन विदेशों में भेज दी गई और अब 50 हजार टन मंगवाना पड़ रही है… कई मूर्ख भक्त यह पोस्ट डाल रहे हैं कि मेडिकल नहीं, इंडस्ट्रीयल ऑक्सीजन भेजी… जबकि इन ढक्कनों को यह पता नहीं है कि अभी देशभर में कोरोना मरीजों को इंडस्ट्रीयल ऑक्सीजन ही दी जा रही है और केन्द्र-राज्य सरकारों व प्रशासन ने इसी कारण इंडस्ट्री को ऑक्सीजन रोक दी और जामनगर-भिलाई से लेकर अन्य स्थानों से इंडस्ट्रीयल ऑक्सीजन ही अस्पतालों को मिल रही है… लिहाजा 7 साल का हिसाब भले ही मोदी जी ना दें, मगर इन 50 दिनों का तो जनता अवश्य मांगे ..आज हम सब कोरोना की चपेट में आए अपने परिजनों, मित्रो सहित अन्य को हर पल मरता देख रहे हैं या हमेशा के लिए खो चुके हैं… अस्पतालों से श्मशानों तक का ये सफर पता नही कब खत्म होगा लेकिन जनता को शायद ये समझ आ गया होगा कि जिसे उन्होंने मसीहा समझा वो सत्ता का बेरहम सौदागर ही निकला …! @
वरिष्ठ पत्रकार राजेश ज्वेल की कलम से✍️*





