धर्म का शाब्दिक अर्थ होता है, कर्तव्य,अहिंसा, न्याय, सदाचरण, सद्-गुण आदि गुणों को धारण करना। धर्म मानव को मानव बनाता है। मतलब आदमी को इंसान बनाता है।
मानव एक सामाजिक प्राणी है।
मानव किसी भी क्षेत्र में कार्यरत हो उसमें मानवीयता होना ही चाहिए।
अपने देश सर्वोच्य सदन संसद है। संसद में जनहित के लिए नीतिगत निर्णय लिए जातें हैं।
संसद का शाब्दिक अर्थ होता है,
राज्य सभा और लोकसभा का संयुक्त रूप, और समाज या सभा।
इनदिनों सार्वजनिक स्थानों पर धर्म संसद के रूप में सभा आयोजित की जा रही है।
मानवीय धर्म, को अंगीकृत कर उसे मानवीयता से निभाना अभी मानवों का परम कर्तव्य है।
धर्म संसद में यही उपदेश दिए जा रहें हैं। बहुत से धर्मप्रेमियों को निजधर्म के प्रति गहन आस्था होती है,इसलिए यह लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का स्वच्छंदता से उपयोग कर लेतें हैं।
अपने विचारों को सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्त करना तो प्रत्येक देशवासी को संविधान के द्वारा प्राप्त मूलभूत अधिकार है।
मानवीयता का तकाज़ा सिर्फ इतना है कि,वाणी को उच्चारते वक्त शब्दों का चयन भी मानवीय हो।
रामचरितमानस में संत तुलसीबाबा बिभीषण और रावण के संवाद के प्रसंग पर लिखतें है। जब बिभीषण रावण को नीतिगत उपदेश देता है,तब बिभीषण कहता है।
काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत।
संत तुलसीबाब ने कुमति और सुमति को स्पष्ट करते हुए यह चौपायां भी लिखी है।
सुमति कुमति सब कें उर रहहीं।
नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना
भावार्थ हे नाथ! पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि सुबुद्धि (अच्छी बुद्धि) और कुबुद्धि (खोटी बुद्धि) सबके हृदय में रहती है, जहाँ सुबुद्धि है, वहाँ नाना प्रकार की संपदाएँ (सुख की स्थिति) रहती हैं और जहाँ कुबुद्धि है वहाँ परिणाम में विपत्ति (दुःख) रहती है॥
तुलसीबाबा ने त्रेतायुग की कथा को अवधिभाषा में लिखकर जन जन तक पहुँचाया है।
इन्ही भावों को प्रकट करता यह गीत है। सन 1959 में प्रदर्शित फ़िल्म पैगाम का यह गीत लिखा है, प्रख्यात कवि,गीतकार प्रदीप जी ने।
इंसान का इंसान से हो भाईचारा
यही पैगाम हमारा
नए जगत में हुआ पुराना
उँच नीच का किस्सा
सबको मिले मेहनत के मुताबिक
अपना अपना हिस्सा
सबके लिए सुख का बराबर
हो बाँटवारा
यही पैगाम हमारा
हरएक महल से कहो के
झोपड़ियो में दिये जलाये
छोटो और बड़ों में अब
कोई फर्क नहीं रह जाए
इस धरती पर हो प्यार का
घर घर उजियारा
यही पैगाम हमारा
इंसान का हो इंसान से भाईचारा
यही पैगाम हमारा
एक स्पष्टिकरण देना अनिवार्य है। लेखक ने संत तुलसीबाबा रचित पंक्तियों को और कवि प्रदीप रचित गीत को सिर्फ प्रस्तुत किया है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





