अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

शैलेन्द्र चौहान की कविताएं

Share

शिखर जैन

प्रस्तुत कविताएँ समकालीन राजनीतिक-सामाजिक यथार्थ के विविध आयामों को एक सतत दृष्टि से देखती हैं। “दुबका हुआ लोकतंत्र”, “एपस्टीन की छाया”, “गलगोटिया : एक नमूना”, “लोकतंत्र” और “धमकी देने वाला अज़ब-ग़ज़ब दोस्त”—ये सभी कविताएँ अलग-अलग विषयों पर केंद्रित दिखाई देती हैं, परंतु उनकी अंतर्धारा एक ही है: सत्ता, पूँजी और वैश्विक राजनीति के बीच मनुष्य और लोकतांत्रिक मूल्यों का सिकुड़ता हुआ स्थान। इन कविताओं को एक साथ पढ़ने पर वे किसी एकल घटना की प्रतिक्रिया नहीं लगतीं, बल्कि समकालीन विश्व-व्यवस्था और भारतीय लोकतंत्र की जटिलताओं पर केंद्रित एक व्यापक काव्यात्मक हस्तक्षेप के रूप में सामने आती हैं।
सबसे पहले “दुबका हुआ लोकतंत्र” पर ध्यान दें। यह कविता भारतीय विदेश-नीति और लोकतांत्रिक आत्मसम्मान के बदलते चरित्र की ओर संकेत करती है। कविता का आरंभ ही अत्यंत सशक्त रूपक से होता है—“अमेरिका की छाँव में / इसरायल की गोद में / दुबका बैठा है लोकतंत्र।” यहाँ ‘दुबकना’ केवल एक शारीरिक मुद्रा नहीं, बल्कि एक राजनीतिक मानसिकता का प्रतीक है। यह रूपक उस परिवर्तन की ओर इशारा करता है जिसमें कभी स्वाभिमान और स्वतंत्र नीति पर गर्व करने वाला लोकतंत्र अब वैश्विक शक्तियों की छाया में आश्रय खोजता प्रतीत होता है। कविता अतीत की स्मृति—गुटनिरपेक्षता, तीसरी दुनिया की उम्मीदों और नैतिक राजनीति—को वर्तमान की व्यावहारिक कूटनीति से टकराती है। इस टकराव में कवि नॉस्टैल्जिया नहीं रचता, बल्कि यह दिखाता है कि सिद्धांतों की जगह अब ‘रणनीति’ और ‘व्यापारिक समझौते’ ने ले ली है। कविता का अंतिम बिंब—“स्वाभिमान की तेज चमक” बनाम “अहंकार”—इस परिवर्तन की नैतिक परिणति को स्पष्ट करता है। यहाँ लोकतंत्र का संकट बाहरी दबाव से नहीं, बल्कि भीतर के आत्मविश्वास के क्षय से पैदा हुआ दिखाई देता है।
दूसरी कविता “एपस्टीन की छाया” वैश्विक सत्ता-संरचनाओं के अँधेरे कोनों की पड़ताल करती है। यह कविता किसी अपराध-कथा की तरह शुरू होती है, पर धीरे-धीरे वह सत्ता, मीडिया और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जाल को उजागर करने लगती है। कवि यहाँ प्रत्यक्ष आरोपों की जगह संकेतों और प्रतीकों का सहारा लेता है। उदाहरण के लिए, “झूमरों की रोशनी इतनी तेज़ होती थी / कि सच्चाई आँखों को दिखाई ही नहीं देती।” यह पंक्ति केवल किसी आलीशान कमरे का वर्णन नहीं, बल्कि उस वैभव और शक्ति के गठजोड़ की ओर इशारा करती है जो अपराध को भी छिपा सकता है। इसी तरह “समुद्र के बीच एक द्वीप” का बिंब उस अलग-थलग दुनिया को दर्शाता है जहाँ सत्ता, धन और रहस्य एक साथ मिलकर एक बंद तंत्र बना देते हैं। कविता का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वह किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचती; वह प्रश्नों को खुला छोड़ देती है। यही खुलापन कविता को अधिक प्रभावशाली बनाता है, क्योंकि वह पाठक को सोचने के लिए विवश करता है कि सच कहाँ है—फाइलों में, अदालतों में या सत्ता के गलियारों में।
तीसरी कविता “गलगोटिया : एक नमूना” भारतीय शिक्षा-व्यवस्था के बाज़ारीकरण पर तीखा व्यंग्य प्रस्तुत करती है। कविता में विश्वविद्यालय को ‘ज्ञान का मंदिर’ नहीं बल्कि ‘चमकदार शोरूम’ कहा गया है। यह रूपक आज के निजी शिक्षा-संस्थानों की उस प्रवृत्ति को उजागर करता है जिसमें शिक्षा ज्ञान का साधन न रहकर एक उत्पाद बन जाती है। “डिग्रियाँ पैकेटों में सजाकर रखी जाती हैं”—यह पंक्ति शिक्षा के वस्तुकरण को अत्यंत सरल लेकिन प्रभावी ढंग से व्यक्त करती है। कविता में सत्ता और शिक्षा के गठजोड़ की भी स्पष्ट आलोचना है। कुलपति के कक्ष में नेताओं और उद्योगपतियों की उपस्थिति यह बताती है कि विश्वविद्यालय अब बौद्धिक स्वायत्तता के स्थान नहीं रहे; वे राजनीतिक-आर्थिक नेटवर्क का हिस्सा बन चुके हैं। इस कविता का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि कवि किसी एक संस्थान की आलोचना तक सीमित नहीं रहता। वह बार-बार यह रेखांकित करता है कि “गलगोटिया तो बस एक छोटा-सा नमूना है।” अर्थात समस्या किसी एक विश्वविद्यालय की नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा-तंत्र की है।
इसके बाद “लोकतंत्र” कविता आती है, जो भारतीय लोकतंत्र के आंतरिक विघटन की कथा कहती है। यह कविता उस आदर्श और वास्तविकता के बीच की दूरी को सामने लाती है जो स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्र के बारे में कल्पना की गई थी। आरंभ में लोकतंत्र जनता की आँखों में चमकते सपने के रूप में दिखाई देता है, जहाँ सत्ता सेवा का माध्यम थी। लेकिन धीरे-धीरे वही सत्ता “सुविधाओं का सिंहासन” बन जाती है। कविता में वेतन, भत्ते, बंगले, काफ़िले और सुरक्षा—ये सभी प्रतीक उस राजनीतिक वर्ग की मानसिकता को दर्शाते हैं जो जनता के प्रतिनिधि होकर भी जनता से दूर हो गया है। संसद का चित्रण भी अत्यंत मार्मिक है—जहाँ बहस की जगह व्यवस्थाएँ और सुविधाएँ केंद्र में आ गई हैं। कविता का सबसे तीखा वाक्य शायद यह है: “यह लोकतंत्र नहीं / भोगतंत्र का स्वर्णयुग है।” यह केवल व्यंग्य नहीं, बल्कि एक नैतिक आरोप है कि लोकतंत्र की मूल भावना—लोकसेवा—अब विलासिता और विशेषाधिकार में बदल चुकी है।
अंतिम कविता “धमकी देने वाला अज़ब-ग़ज़ब दोस्त” वैश्विक राजनीति की विडंबना को व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत करती है। यह कविता किसी विशिष्ट व्यक्ति का नाम लिए बिना उस महाशक्ति की मानसिकता का चित्रण करती है जो खुद को दुनिया का सबसे बड़ा मित्र और शांति-दूत बताती है, पर साथ ही धमकियों और प्रतिबंधों का हथियार भी रखती है। कविता में बार-बार आने वाला ‘दोस्त’ का संबोधन दरअसल व्यंग्य का उपकरण है। कवि दिखाता है कि यह दोस्ती बराबरी की नहीं, बल्कि शक्ति-संतुलन पर आधारित है। “बीमा एजेंट / पॉलिसी के साथ / तलवार भी बेच रहा हो”—यह रूपक इस दोहरे चरित्र को बेहद प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करता है। कविता की भाषा हल्की और हास्यपूर्ण प्रतीत होती है, पर उसके भीतर गहरी राजनीतिक टिप्पणी छिपी है।
इन सभी कविताओं को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि उनका केंद्रीय सरोकार सत्ता-संरचनाओं की आलोचना है। चाहे वह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति हो, वैश्विक अपराध-जाल हो, शिक्षा का बाज़ार हो या लोकतांत्रिक राजनीति—हर जगह कवि उस तंत्र को उजागर करता है जिसमें शक्ति और लाभ के सामने नैतिकता पीछे छूट जाती है। यह आलोचना केवल नकारात्मक नहीं है; इसके भीतर एक नैतिक दृष्टि भी निहित है। उदाहरण के लिए “दुबका हुआ लोकतंत्र” में स्वाभिमान की चमक का स्मरण, या “लोकतंत्र” में जनता के सपने की याद—ये संकेत बताते हैं कि कवि अभी भी उन मूल्यों को महत्वपूर्ण मानता है जिन्हें वह क्षीण होते देख रहा है।
शैली की दृष्टि से भी इन कविताओं में कुछ उल्लेखनीय समानताएँ हैं। पहली विशेषता है सरल लेकिन अर्थगर्भित भाषा। कवि कठिन बौद्धिक शब्दावली का सहारा नहीं लेता; वह रोज़मर्रा के शब्दों और बिंबों से जटिल राजनीतिक विचार व्यक्त करता है। दूसरी विशेषता है रूपकों और प्रतीकों का सटीक उपयोग। “छाँव”, “गोद”, “शोरूम”, “द्वीप”, “झूमर”, “बीमा एजेंट”, “भोगतंत्र”—ये सभी प्रतीक कविता को विश्लेषणात्मक होने के साथ-साथ दृश्यात्मक भी बनाते हैं। तीसरी विशेषता है व्यंग्य और विडंबना का संयमित प्रयोग। कवि सीधे नारेबाज़ी नहीं करता; वह परिस्थितियों को इस तरह प्रस्तुत करता है कि उनकी विडंबना स्वयं स्पष्ट हो जाए।
इन कविताओं का एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे राष्ट्रीय और वैश्विक परिप्रेक्ष्य को एक साथ जोड़ती हैं। “दुबका हुआ लोकतंत्र” और “धमकी देने वाला अज़ब-ग़ज़ब दोस्त” वैश्विक शक्ति-राजनीति की ओर संकेत करते हैं, जबकि “गलगोटिया : एक नमूना” और “लोकतंत्र” भारतीय समाज और राजनीति की आलोचना करते हैं। “एपस्टीन की छाया” इन दोनों स्तरों के बीच पुल का काम करती है—वह दिखाती है कि वैश्विक सत्ता-तंत्र किस तरह राष्ट्रों की राजनीति और समाज को प्रभावित करता है।
समग्र रूप से देखें तो ये कविताएँ समकालीन समय की एक आलोचनात्मक काव्य-डायरी की तरह लगती हैं। इनमें घटनाओं का विवरण कम है, पर उनके पीछे छिपी संरचनाओं का संकेत अधिक है। कवि का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि पाठक को उस जटिल सत्ता-जाल की ओर सचेत करना है जिसमें लोकतंत्र, शिक्षा, मीडिया और अंतरराष्ट्रीय संबंध सभी उलझे हुए हैं।
अंततः कहा जा सकता है कि इन कविताओं की शक्ति उनके नैतिक साहस और वैचारिक स्पष्टता में निहित है। वे किसी एक विचारधारा का घोषणापत्र नहीं बनतीं, बल्कि प्रश्नों और संकेतों के माध्यम से पाठक को सोचने के लिए प्रेरित करती हैं। यही कारण है कि ये कविताएँ केवल तात्कालिक राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ नहीं रह जातीं; वे हमारे समय के लोकतांत्रिक और मानवीय मूल्यों पर गहरी चिंतनशील टिप्पणी बन जाती हैं।

दुबका हुआ लोकतंत्र

अमेरिका की छाँव में,
इसरायल की गोद में
दुबका बैठा है
लोकतंत्र

जो कभी
सार्वभौमिकता की बात करता था
साहस रखता था
अपनी राह खुद चुनने का
गूँजता था जहाँ
गुटनिरपेक्षता का स्वाभिमान
वहाँ न पूर्व का दबाव था
न पश्चिम की छाया

कभी जिसमें जगी थीं
तीसरी दुनिया की उम्मीदें
जहाँ मित्रता के पुल
किसी सैन्य अड्डे से नहीं
परस्पर विश्वास से बनते थे
तब संसद की आवाज़ में
उत्पीड़ितों की पीड़ा
एक साझा नैतिकता बनकर उठती थी

अब कूटनीति की मेज़ पर
सिद्धांतों की जगह गज़ब रहस्य और
विकट रणनीति रखी है
सारे शब्द
व्यापार और सुरक्षा समझौतों की
स्याही में भीगे हुए हैं

दुबका हुआ लोकतंत्र
चुपचाप याद करता है
कि उसकी असली ताकत
न किसी महाशक्ति की छाया थी
न किसी सैन्य मित्रता की गोद
बल्कि
स्वाभिमान की
तेज चमक थी
अब सर्वत्र
अहंकार ही अहंकार है
: शैलेन्द्र चौहान

एपस्टीन की छाया

मुझे उतना ही मालूम है
जो अमेरिकी न्याय विभाग की
चुनिंदा फाइलों से छनकर
धीरे-धीरे बाहर आता है
और जिसे दुनिया भर का मीडिया
अपनी सुविधा के अनुसार
काट-छाँट कर
खबरों की थाली में परोस देता है

बाक़ी जो कुछ है
वह अनुमान है
संकेत है
या उन लोगों की चुप्पी है
जो कभी
जेफ़्री एपस्टीन
से मिले थे
डिप्लोमैटिक रिश्तों की आड़ में

वे मुलाक़ातें
सिर्फ़ मुलाक़ातें नहीं थीं
कॉर्पोरेट दुनिया के
चमकदार कमरों में रहस्यमय
खामोश समझौते थे
जहाँ झूमरों की रोशनी
इतनी तेज़ होती थी
कि सच्चाई
आँखों को दिखाई ही नहीं देती

कुछ लोग आए थे
राष्ट्रों की दोस्ती के नाम पर
कुछ आए थे
व्यापार की संभावनाओं के साथ
कुछ आए थे
दुनिया बदलने के सपने लेकर
और कुछ
सिर्फ़ इसलिए आए थे
क्योंकि शक्ति के गलियारों में
हर दरवाज़ा
हर चेहरे के लिए
बराबर नहीं खुलता

बताया गया
कि समुद्र के बीच
एक द्वीप है
जहाँ हवा भी
राज़ लेकर बहती थी
जहाँ दीवारें
सुनती कम
सहेजती ज़्यादा थीं
वहाँ हँसी भी थी
संगीत भी
शानदार मेहमाननवाज़ी भी
और शायद
उन सबके पीछे
दरिंदगी की शर्मनाक कथा
एक अँधेरा कमरा
क्रूरता की हदें लांघता
जिसकी चाबी
किसी फाइल में
अब तक दर्ज नहीं

फाइलें खुलती हैं
तो कुछ नाम झरते हैं
जैसे पतझड़ में
सूखे पत्ते
लेकिन
पेड़ फिर भी खड़ा है अकड़ कर
क्योंकि
सत्ता के जंगल में
सिर्फ़ पत्ते नहीं होते
जड़ें भी होती हैं
गहरी
बहुत गहरी

कोई पत्रकार
एक नाम खोज लाता है
कोई अदालत
एक दस्तावेज़ पढ़ती है
कोई गवाह
काँपती आवाज़ में
कहानी शुरू करता है
लेकिन कहानी
पूरा होने से पहले
अचानक
खामोश हो जाती है
जैसे किसी ने
माइक बंद कर दिया हो

दुनिया भर के चैनलों पर
बहस शुरू होती है
विश्लेषक
राजनीतिक विशेषज्ञ
साज़िशों के व्यापारी
हर कोई रहस्य भरे
सच के चारों ओर
घूमता है
जैसे पतंगे
बंद लालटेन के इर्द-गिर्द

कोई कहता है
यह बस एक अपराध कथा है
कोई कहता है
यह वैश्विक शक्ति का जाल है
और कोई धीरे से पूछता है
अगर यह सब सच है
तो इतने लोग
अब भी
खामोश क्यों हैं?

शायद इसलिए
कि सच
हमेशा अदालतों में नहीं मिलता
कभी-कभी वह
राजधानियों के बीच
उड़ते विमानों में बैठा होता है
या
किसी दूतावास की दीवार के पीछे
सुरक्षित अलमारी में
सो रहा होता है
या फिर
इतिहास की किताबों में
एक छोटे से फुटनोट की तरह दर्ज़ हो
दबकर रह जाता है

समय बीतता है
नई खबरें आती हैं
नई सनसनी
पुरानी कहानियों को ढँक देती है
लेकिन कुछ घटनाएँ
समाचार नहीं होतीं
वे छाया बन जाती हैं
और छायाएँ
दुनिया के हर हिस्से पर फैली हैं
वे कभी पूरी तरह गायब नहीं होतीं
वे बस
दिन के उजाले में
हल्की पड़ जाती हैं
और रात गहराते ही
फिर से लंबी हो जाती हैं

शायद यही वजह है
कि दुनिया
आज भी
उस नाम को
एक प्रश्न की तरह याद करती है
न सिर्फ़ एक अपराधी की कहानी
बल्कि उस व्यवस्था की
जिसमें सच
अक्सर
अधिक शक्तिशाली लोगों से
डर जाता है

और तब
इतिहास के पन्नों पर
एक धुँधली रेखा बचती है
एपस्टीन की छाया….
–‐‐——————-
गलगोटिया : एक नमूना

गलगोटिया तो बस
एक छोटा-सा नमूना है
हमारी सोच का
इस देश में
शिक्षा के कारोबार का
एक विराट साम्राज्य है

विश्वविद्यालय यहाँ
विद्या के मंदिर नहीं
चमकदार शोरूम हैं
जहाँ ज्ञान नहीं
डिग्रियाँ पैकेटों में
सजाकर रखी जाती हैं

द्वार पर टंगे हैं
चमकते होर्डिंग
“भविष्य बनाइए”
“विश्वस्तरीय शिक्षा पाइए”
और भीतर
भविष्य नहीं
किस्तों का हिसाब लिखा जाता है
ब्लैकबोर्ड पर

सत्ता के गलियारों से
सीधे जुड़े हैं इनके तार
कुलपति के कक्ष में
कभी नेता आते हैं
कभी उद्योगपति
और कभी
नई डील के दस्तावेज़

शिक्षा यहाँ
मुनाफ़े का एक विशद व्यापार है
जहाँ फीस
नदी की तरह बहती है
और ज्ञान
रेगिस्तान की तरह
सूखा पड़ा रहता है

गलगोटिया में जो हुआ
वह कोई आश्चर्य नहीं
यह तो उस बीमारी की
बस हल्की-सी झलक है
जो पूरे शरीर में
फैल चुकी है

हर शहर में उग रहे हैं
नए-नए विश्वविद्यालय
जैसे बरसात में
कुकुरमुत्ते उगते हैं
नाम रवायती,
भवन भव्य
और भीतर
पाठ्यक्रम से ज़्यादा
मुनाफ़े की किताब पढ़ाई जाती है

मंचों पर गूंजते हैं भाषण
“भारत ज्ञान की भूमि है”
“हम विश्वगुरु बनेंगे”

ज्ञान
किसी कोने में दुबका है
शर्म से सिर झुकाए
और बाज़ार
उसके कंधे पर बैठकर
तालियाँ बजा रहा है
रोज़गार की बात
बेमानी है

गलगोटिया तो बस
एक छोटा-सा नमूना है
असली कहानी तो
उस खेल की है
जहाँ अब
सब कुछ
धड़ल्ले से बिक रहा है
चौतरफा
अद्भुत विकास का नज़ारा है

अर्थव्यवस्था चौथे से तीसरे नंबर पर
पहुंच चुकी है
[27/02, 11:31] Shailendra Chauhan: लोकतंत्र

था जनता की आँखों में चमकता
एक सपना
जहाँ सत्ता
सेवार्थ होगी
और कुर्सी
जनविश्वास की चौकी

पर धीरे-धीरे
बदल गया अब
सपनों की वह चौकी
सुविधाओं का सिंहासन बन गई
जनप्रतिनिधि
जन के नहीं
अपने सुख के प्रतिनिधि हो गए

वेतन, भत्ते, बंगले, मलाई
लालबत्तियों, काफ़िलों और
सत्ता की हनक
के बीच
लोक कहीं खो गया

संसद में
बहस कम
व्यवस्थाएँ अधिक होने लगीं
किसका भत्ता बढ़े
किसका बंगला बड़ा हो
किसकी सुरक्षा और कड़ी हो
सारे जोड़ तोड़, तिकड़म
चिंता बस एक
कैसे बनी रहे यह कुर्सी
लंबे समय तक

बाहर
लंबी कतारों में खड़ी जनता
सोचती रही
क्या यही वह सपना था
जिसके लिए
उसने उँगली दबाई थी?

लोकतंत्र
धीरे-धीरे
लोक से दूर
भोग के करीब पहुँच गया
जहाँ सेवा का स्थान
सुविधा ने ले लिया
और आदर्शों की जगह
आरामकुर्सियों ने
निराश हताश लोक ने भी
यह सत्य स्वीकार लिया

संविधान की आत्मा अब
कोने में बैठकर
धीरे-धीरे फुसफुसाती है
“यह लोकतंत्र नहीं
भोगतंत्र का स्वर्णयुग है”
: धमकी देने वाला अज़ब-ग़ज़ब दोस्त

वह आदमी
दुनिया के बीचोंबीच खड़ा था
छाती फुलाए, बाल सँवारे
और बार-बार कहता था
कि वह इस दुनिया का
सबसे बड़ा दोस्त है

जब कहीं
गोली चलती
बारूद की गंध उठती
वह मंच पर आकर
घोषणा कर देता
सीज़फायर मैंने करवाया है

लोग सोचते
अजीब बात है
आग कहीं और लगती है
और बुझाने का श्रेय
कोई और ले जाता है

दुनिया सुनती है
कुछ मुस्कराकर
कुछ सिर खुजलाकर
क्योंकि उसी आदमी की जेब में
धमकियों की एक लंबी सूची होती है
किसी के लिए टैरिफ
किसी के लिए प्रतिबंध, कब्जा
और किसी के लिए ट्रुथ पर
एक नया ट्वीट

अजब दोस्ती है भाई तुम्हारी
गले लगाते हो
तो लगता है
जैसे कोई बीमा एजेंट
पॉलिसी के साथ
तलवार भी बेच रहा हो

तुम्हारी मेज़ पर रखी
कॉफी भी कभी-कभी
युद्ध का नक्शा बन जाती है,
और ट्वीट
तोप के गोले की तरह उड़ते हैं
दुनिया की खिड़कियों पर

वह अक्सर कहता है
“मैं सबका भला चाहता हूँ,
बस सबको मेरी बात माननी होगी”

वह पहले
धमकी की माचिस दिखाता है,
फिर पानी की बाल्टी लेकर
नायक बन जाता है

लोग समझते हैं
यह दोस्ती नहीं
एक तमाशा है
पर बेबस हैं वे

मंच पर खड़ा वह आदमी
हर बार घोषणा करता है
कि वही सबसे अच्‍छा दोस्त है
और वही
सबसे बड़ा शांति-दूत भी
सब जोर जोर से
ताली बजाने लगते हैं

Ramswaroop Mantri

Add comment

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें