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*मध्य प्रदेश में जमीन के नीचे जहर! भूजल में नाइट्रेट का स्तर खतरनाक सीमा तक*

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मध्य प्रदेश में भूजल में नाइट्रेट का स्तर खतरनाक सीमा तक पहुंच गया है. केंद्र सरकार की रिपोर्ट में MP को यूपी के बाद दूसरा सबसे प्रभावित राज्य बताया गया है. राज्य के 55 में से 39 जिलों में पीने का पानी असुरक्षित पाया गया है. नाइट्रेट युक्त पानी शिशुओं और बच्चों के लिए बेहद खतरनाक माना जाता है.

इंदौर में सीवेज मिला पानी पीने से 18 लोगों की मौत के बाद अब एक और खतरनाक सच्चाई सामने आई है. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो इससे भी बड़ी त्रासदी हो सकती है. वजह है भूजल में खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका नाइट्रेट, जो धीरे-धीरे पूरे प्रदेश के लिए खतरा बनता जा रहा है.

देश में यूपी के बाद MP दूसरे नंबर पर

केंद्र सरकार द्वारा कराए गए एक अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य प्रदेश देश में उत्तर प्रदेश के बाद दूसरा ऐसा राज्य है, जहां भूजल में नाइट्रेट का स्तर सबसे ज्यादा पाया गया है. यह अध्ययन वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट 2024 के आधार पर तैयार किया गया था, जिसे अगस्त 2025 में साझा किया गया.

55 में से 39 जिले हाई रिस्क में

रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश के 55 जिलों में से 39 जिलों में भूजल के एक या अधिक स्रोतों में नाइट्रेट की मात्रा तय सीमा से ज्यादा पाई गई है. जिन जिलों में यह खतरा सामने आया है, उनमें इंदौर, भिंड, बुरहानपुर, ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन, रीवा, सागर, सतना और शहडोल जैसे जिले शामिल हैं. इन इलाकों में भूजल में नाइट्रेट की मात्रा 45 मिलीग्राम प्रति लीटर से ज्यादा पाई गई है, जो पीने के पानी के लिए खतरनाक मानी जाती है.

नाइट्रेट क्यों है जानलेवा?

डॉक्टरों और विशेषज्ञों के मुताबिक, ज्यादा नाइट्रेट वाला पानी शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा को कम कर देता है. इसका सबसे ज्यादा खतरा नवजात शिशुओं और छोटे बच्चों को होता है. लंबे समय तक ऐसा पानी पीने से गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है, लेकिन यह असर धीरे-धीरे दिखता है, इसलिए लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं.

सीवेज, खेती और शहरीकरण जिम्मेदार

रिपोर्ट में साफ तौर पर बताया गया है कि कई इलाकों में खराब सीवेज सिस्टम और सेप्टिक टैंक लीकेज की वजह से नाइट्रेट भूजल में मिल रहा है. इसके अलावा धान और गेहूं जैसी फसलों में रासायनिक खादों का ज्यादा इस्तेमाल भी इसकी बड़ी वजह है. तेजी से हो रहा शहरीकरण और घटता भूजल रिचार्ज इस समस्या को और गंभीर बना रहा है.

जिम्मेदारी किसकी है

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि क्योंकि पानी राज्य का विषय है, इसलिए भूजल का संरक्षण और प्रबंधन मुख्य रूप से राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है. हालांकि, केंद्र सरकार तकनीकी और आर्थिक मदद योजनाओं के जरिए राज्यों को सहयोग देती है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अब भी भूजल की गुणवत्ता पर गंभीर कदम नहीं उठाए गए, तो इंदौर जैसी घटनाएं दूसरे जिलों में भी दोहराई जा सकती हैं. साफ पानी सिर्फ सुविधा नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी जरूरत है.

रस्टी टैड किस्म भी लाजवाब
अगर आप ठंड के शुरुआत में गेंदा की फसल लगाना चाह रहे हैं तो आप पूसा बसंती का चुनाव कर सकते हैं, जिसका फूल बड़ा होता है. इसके अलावा पूसा बसंती जो माला बनाने के लिए माली की पहली पसंद होती है. इसकी रोपाई कर सकते हैं. इसे पौधे सबसे ज्यादा दिनों तक फूल देते रहते हैं. गेंदे की कुछ किस्म 30 से 35 दिनों में फूल देने के लिए तैयार हो जाती हैं. इसके अलावा अगर आप गमले में गेंदा का फूल लगाना चाहते हैं तो रस्टी टैड किस्म को लगा सकते हैं, इसका मेहरून कलर का फूल होता है.

ऐसे करें खेती
गेंदा की फसल लगाने के लिए सबसे पहले खेत की गहरी जुताई करें. वर्मी कंपोस्ट या फिर गोबर की सड़ी हुई खाद को मिट्टी में मिला दें. उसके बाद एक्सपर्ट द्वारा बताई हुई चुनिंदा के किस्मों की पौध की रोपाई कर दें. रोपाई करने के बाद हल्की सिंचाई करें. बेहतर देखभाल करने से गेंदा की फसल से किसानों को अच्छी कमाई हो सकती है.

Ramswaroop Mantri

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