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सियासी सर्कस जानवर और आदमी

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शशिकांत गुप्ते

सन 1970 में प्रदर्शित फ़िल्म मेरा नाम जोकर में गीतकार शैलेन्द्र ने लिखे गीत की इन पंक्तियों का यकायक स्मरण हुआ।
क्या है करिश्मा, कैसा खिलवाड़ है
जानवर आदमी से ज़्यादा वफ़ादार है
खाता है कोड़ा भी, रहता है भूखा भी
फिर भी वो मालिक पे करता नहीं वार है
और इनसान ये
माल जिसका खाता है
प्यार जिस से पाता है, गीत जिस के गाता है
उसके ही सीने में भौंकता कटार है
ए भाई ज़रा देख के…

इन पंक्तियों में जानवर को आदमी से ज्यादा वफादार बताया है।
जानवर को, आदमी कोड़े मारे भूखा रखें फिभी जानवर पलट वार नहीं करता है।
जानवर और आदमी का यह Comperision उचित नहीं लगता है।इस ऊहापोह को दूर करने के लिए लेखक ने अपने साहित्यिक मित्र से सम्पर्क किया,साहित्यिक मित्र ने कहा यह तो एकदम सामान्यज्ञान की बात है।जानवर से आदमी की तुलना की है, इंसान से नहीं की है।इस बात गम्भीरता से सोचना चाहिए।
आदमी में आदमीयत होती है, तो ही वह इंसान कहलाता है।
ये साहित्यिक मित्र दर्शन शास्त्र के डॉक्टर हैं।मित्र ने अपने दार्शनिक अंदाज में यूं समझाया कि,मनुष्य का जन्म लेने मात्र से हरकोई मनुष्य नहीं हो जाता है।
एक सूक्ति जो हमारे ऋषियों ने लिखी है,इस सूक्ति का उच्चारण करतें हुए,मित्र ने लेखक के ऊहापोह को शांत किया।
सूक्ति है। मनु ते इति मानवः,पश्चते इति पशु
अर्थात जो मनन करने की क्षमता रखता वही मानव है और जो सिर्फ देखता है वह पशु है।
फ़िल्म जगत में शो में मेन का खिताब प्राप्त अभीनेता द्वारा निर्मित और दिग्दर्शित फ़िल्म मेरा नाम जोकर की पटकथा लिखी है,ख्वाजा एहमद अब्बास ने,इस फ़िल्म की कहानी
दार्शनिक अंदाज लिखी है।
दर्शन शास्त्र के डॉक्टर मित्र ने दार्शनिक मानसिकता के साथ लेखक की शंकाओं का समाधान किया।
लेखक के जहन में फिर भी प्रश्न यथावत थे।व्यंग्य की भाषा में यदि इन प्रश्नों को प्रकट किया जाए तो जानवर को आदमी भूखा रखता है,और आदमी को दूषित व्यवस्था के कारण भूखा रहना पड़ता है।
जानवर आदमी के प्रति वफादार होता है।आदमी व्यक्ति पूजक होता है।आदमी जिस व्यक्ति के प्रति आस्था प्रकट करता है,और पूज्य व्यक्ति की हरएक बात का अंधश्रद्धा रखतें हुए समर्थन करता है।
आज यही तो हो रहा है।आमजन बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है।आमजन की आर्थिक स्थिति बदतर होतें जा रही है।फिर भी एक व्यक्ति के प्रलोभन युक्त वादों पर भरोसा रखतें हुए स्वयं का मानसिक शोषण करवा रहा है।अंधश्रद्धा में लीन होने के कारण स्वयं का शोषण हो रहा है, इस बात से आदमी अनभिज्ञ है।
व्यक्तिकेन्द्रित राजनीति यह तो चाहती है।
आमजन को व्यक्ति पूजा में इतना मगन कर दो कि,आमजन के जहन में कोई प्रश्न ही पैदा न हो?
एक विचारक का कथन है कि, जिस दिन प्रश्नवाचक व्याकरण की परिधि से बाहर आकर व्यवहार में आएंगे तब क्रांति होगी। नहीं तो भ्रांति ही बनी रहेगी।
उक्त समस्या के समाधान के लिए आदमी में को इंसान बनाना पड़ेगा।
फ़िल्म मेरा नाम जोकर की पटकथा मानव जीवन को दार्शनिक अंदाज में प्रकट करते हुए लिखी गई है।
इस फ़िल्म में मानव जीवन की तुलना सर्कस की है।
मनुष्य जैसा खतरनाक प्राणी अन्य कोई नहीं है?यह बात सर्कस के द्वारा सिद्ध होती है।सर्कस में मनुष्य द्वारा खतरनाक,खूंखार वन्य प्राणियों को कोड़े के सिर्फ आवाज पर नचाया जाता है अर्थात उन्हें बेवकूफ़ बनाया जाता है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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