शशिकांत गुप्ते
जिन्न का मतलब भूत, पिशाच्य,रूह,और आत्मा आदि होता है।
जिन्न को लेकर काल्पनिक कहानी प्रचलित है। जिन्न,जादुई चिराग में रहता है। जादुई चिराग को घीसते ही उसमें से जिन्न बाहर निकलता है।
जिन्न चिराग से बाहर आते ही पूछता है,बोल मेरे आका क्या हुकूम है?
जिन्न को लेकर एक चुटुकुला प्रसिद्ध है। एक व्यक्ति ने मुंबई में समुद्र किनारे टहलते हुए, एक खरबूजा खरीदा। खरबूजे को काटतें ही उसमें से एक जिन्न निकला।
जिन्न ने उस व्यक्ति से पूछा बोल मेरे आका क्या चाहिए?
उस व्यक्ति ने कहा मुंबई में रहने के लिए एक घर चाहिए।
जिन्न जोर से ठहाका लगाता और हँसने हुए कहता है। यदि मै घर उपलब्ध करवाने की क्षमता रखता तो मै स्वयं इस खरबूज़े में क्यों रहता?
यह तो मज़ाक की बात हुई।
असल में मुद्देविहीन और विचारविहीन राजनीति के प्रचलन चलते राजनीति में जिन्न जाता है।
पिछले कुछ वर्षों से ऐन चुनाव के वक्त राजनीति में ऊलजलूल मुद्दों के विभिन्न रूप में जिन्न बाहर आ जातें हैं।
प्रत्येक चुनाव के समय देश की ज्वलंत समस्याओं को दरकिनार करने के लिए काल्पनिक जिन्न, सांप्रदायिकता,फिरकापरस्ती, पडौसी देश,और पडौसी देश के प्रथम राष्ट्र प्रमुख जिन्ना की रूह रूपी जिन्न भारत की राजनीति में
मंडराने लग जातें हैं।
जिन्न की कहानी कितनी भी काल्पनिक क्यों न हो,चुनावी राजनीति में साकार रूप लेने की कोशिश करती है?
ऐसा कहा जाता है कि,जिन्न, रूह आत्मा भूत और पिशाच्य जब किसी मानव पर हावी हो जाता है तब वह विचित्र तरह की हरक़तें करना लगता है।
चिकित्साविज्ञान की भाषा में इसे हिस्टीरिया (मिर्गी) का दौरा कहा जाता है।
हिस्टीरिया के रोगी को सिर, छाती, पेट, रीढ़ तथा कंधे की मांसपेशियों में तेज दर्द होता है। दौरे आने पर रोगि चिखता- चिल्लाता है, और उसको लगातार हिचकियां आने लगती हैं। रोगी के हाथ-पैर में अचानक ऐंठन होने लगे तो समझ जाएं कि हिस्टीरिया का दौरा पड़ा है
अंधश्रद्धा रखना वाले लोग हिस्टीरिया के रोगी पर भूत, या किसी अतृप्त वासना का वास समझकर किसी तांत्रिक, ओझाओं के संपर्क करतें हैं। ओझा और तांत्रिक, ऐसे लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करतें हैं और उन्हें लूटते हैं।
यही नकली तांत्रिक और ओझा आए दिन विज्ञापन करतें रहतें हैं।
इनके द्वारा किए जा रहे विज्ञापनों में मानवों की हरएक समस्याओं को शर्तिया इलाज होता है?
विज्ञापनों की लुभावन भाषा के झांसे में आकर आम मानव विश्वास कर लेता है,और ठगा जाता है।
ओझाओं और कथित तांत्रिकों के द्वारा आर्थिक और मानसिक रूप से शोषित एक व्यक्ति ने अपना अनुभव यूँ सुनाया।
किसी भी तांत्रिक या ओझा के पास जाओ, सर्वप्रथम वह पूछता है,मेरे पास आने के पूर्व कितने तांत्रिकों और ओझाओं के पास गए हो?
पीडित व्यक्ति कहता है, मरता क्या नहीं करता, दो तीन के पास गया था।
तांत्रिक और ओझा कहता है,जिन लोगो के पास गए थे उन्होंने तुम्हारी समस्याओं को और भी जटिल कर दिया है।
मै सब ठीक कर दूंगा।
यह वक्तव्य सुनकर सन 2013 में चुनाव प्रचार के दौरान जो वादे और दावे किए गए थे, वे याद आ जातें हैं।
बहुत हुई महंगाई की मार अब की बार….. जुमला सरकार,
वादें और दावें करने वालों की स्मृति मलिन हो जाती है।
रोजगार की मांग करने वालों के साथ निर्ममतापूर्वक कार्यवाही होती है।
अब आमजन को अंधविश्वास को त्याग कर लोकलुभावन विज्ञापनों से बचना चाहिए।
चुनाव के दौरान प्रकट होने वाले काल्पनिक जिन्नों को भगाने का एक मात्र मंत्र है। जो अमूल्य है। वह है आमजन का वोट (Vote)
अपने मताधिकार का सही उपयोग ही आमजन को समस्याओं से मुक्ति दिला सकता है।
उपर्युक्त मुद्दे पर प्रख्यात शायर स्व.राहत इंदौरीजी का ये शेर प्रासंगिक है।
तूफानों से आंख मिलाओं
सैलाबों पर वार करो
मल्लाहों का चक्कर छोड़ो
तैर कर दरिया पर करों
शशिकांत गुप्ते इंदौर





