मोहननगर नहर के पार बस रही शहर की नई पाॅश कॉलोनी थी। बस अड्डे से इसकी दूरी करीब पाँच किलोमीटर थी। यहाँ से ऑटो रिक्शा कम ही मिलते थे। दिन डूबने के बाद तो यहाँ वाहनों का आवागमन न के बराबर ही होता। अंकित सड़क किनारे खड़ा किसी ऑटो रिक्शा का इंतज़ार कर रहा था। शाम के सवा सात बज चुके थे और उसे आठ बजे वाली बस पकड़नी थी। दो ऑटो रिक्शा आए लेकिन मुँहमाँगे किराए के ऑफ़र के वावजूद वे बस अड्डे जाने के लिए तैयार नहीं हुए। एक और ऑटो रिक्शा आता दिखाई दिया तो अंकित ने हाथ हिलाकर उसे रुकने का इशारा किया। उसके रुकते ही अंकित ने कहा, “भैया बस अड्डे जाना है, भाड़ा जितना तुम चाहोगे मैं दूँगा। “
“बैठिये ! ” ऑटो रिक्शा चालक ने कहा तो अंकित की जान में जान आई और वह लपक कर रिक्शे में तुरंत बैठ गया। थोड़ी देर बाद वह बस अड्डे पहुँच कर ऑटो रिक्शा से उतरा, जेब से सौ का एक नोट निकाल कर चालक की तरफ़ बढ़ा दिया।
“छुट्टे नहीं हैं साहब, बीस रुपये छुट्टे दे दीजिए। “
“बीस रुपये ? अरे इस वक्त तुमने मुझे समय से यहाँ पहुँचा दिया,तुम्हारा बहुत अहसानमंद हूँ। तुम नहीं जानते, आठ वाली बस पकड़ना मेरे लिए कितनी ज़रूरी थी। भाई एक काम करो, तुम सौ रूपये ही रुपये रख लो। “
“भाड़ा तो बीस रुपए ही है साहब ! आप मुझे बीस रुपये ही दीजिए। “
“तुम यहाँ आए,अब लौटकर उधर ही जाओगे। तुम बता रहे थे न कि तुम्हारा घर मोहननगर के पास ही कहीं है। कितना तो तेल ख़र्च हो जायेगा, इसे रख लो। “
“आप ईरिक्शे के भाड़े के लिए मुझे बीस रुपये दे दीजिए साहब, देर हो रही है, कहीं आपकी बस न छूट जाए। ” अंकित ने जेब से बीस का नोट निकाला और उसके हाथ में थमा दिया।
“शुक्रिया दोस्त ! उसने कसकर चालक से हाथ मिलाते हुए कहा, “किसी ग़रीब का इतना बड़ा दिल देख कर बहुत ख़ुशी हुई दोस्त। “
“साहब !आदमी पैसे से ग़रीब नहीं होता,अपनी ईमान से होता है !” वह मुस्कुराया और अंकित ने उसके कथन और मुस्कान दोनों को अपने दिल में रखते हुए अंतिम बस पकड़ने के लिए तेजी से आगे बढ़ लिया।
हरभगवान चावला,सिरसा,हरियाणा,संपर्क-93545 45440
संकलन-निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद, 




