शिवानन्द तिवारी,
पूर्व सांसद
बिहार के कई ज़िलों में एनआईए ने छापा मारा है. बताया जा रहा है कि छापामारी पीएफआई के अड्डों पर की जा रही है. पीएफआई एक इस्लामिक आतंकवादी संगठन है ऐसा बताया जा रहा है. हालाँकि आश्चर्य की बात यह है कि पीएफआई जिसको केंद्र सरकार आतंकवादी संगठन बता रही है उस पर सरकार ने अब तक प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया है. जैसे आतंकवादी संगठन से जुड़े रहने के आरोप में सिम्मी नामक मुस्लिम युवाओं के संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. अगर सरकार पीएफआई को भी आतंकवादी संगठन मानती है तो अब तक इस पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया गया है !
अभी पिछले जुलाई महीने में प्रधानमंत्री के कार्यक्रम के समय फुलवारी शरीफ़ में पीएफआई से जुड़े आतंकवादी गिरोह को लेकर काफ़ी शोर मचा था. यहाँ तक कहा गया कि उक्त आतंकवादी संगठन का एक महत्वपूर्ण आर्थिक स्रोत फुलवारी शरीफ़ का इनका केंद्र है.
लेकिन उसके बाद क्या हुआ इसकी कोई जानकारी बिहार की जनता को नहीं है. आज अचानक खबर मिल रही है कि बिहार के कई ज़िलों में पीएफआई का अड्डा है. उन्हीं अड्डों पर छापामारी हो रही है. अचानक हो रही इन छापेमारियों के पीछे बिहार का बदला हुआ राजनीतिक संदर्भ तो नहीं है ! बिहार को बदनाम करने और अगले चुनाव में इसके इस्तेमाल के लिए भूमिका तैयार करने के लिए यह छापेमारी तो नहीं की जा रही है !
हम चाहेंगे कि फुलवारी शरीफ़ में जिसे पीएफआई का महत्वपूर्ण केंद्र बताया गया था . आतंकवादी गिरोह के सदस्य होने के आरोप में कुछ युवकों को गिरफ़्तार किया गया था. उस मामले में अद्यतन स्थिति क्या है इसकी जानकारी बिहार की जनता को दी जाए. अमूमन हो यही रहा है कि आतंकवादी गिरोह से रिश्ता रखने के आरोप में नौजवानों को गिरफ़्तार कर जेल में डाल दिया जाता है. बरसों जेल में रहने के बाद बाद, जब उनके विरुद्ध कोई साक्ष्य नहीं मिलता है तो अदालत द्वारा बरी कर दिया जाता है. लेकिन इस बीच उनका पुरा जीवन बर्बाद हो जाता है. अब तो यह सिलसिला और बढ़ गया है. इसलिए हमारी माँग है कि फुलवारी शरीफ़ मामले में जाँच एजेंसी अब तक क्या साक्ष्य मिला है उसको बिहार की जनता के साथ साझा किया जाए. ताकि यह साफ़ हो जाए गिरफ़्तारी साक्ष्य के आधार पर की गई है. एक समुदाय विशेष के प्रति पुर्वाग्रह की भावना की वजह से नहीं.





