डा. बनवारी लाल शर्मा हर दृष्टि से विलक्षण थे। वे न केवल समाज-कर्म, नव चिन्तन और जन-संघर्ष के प्रतीक थे, बल्कि अकादमिक क्षेत्र में भी वे देश की एक जानी-मानी हस्ती थे। जहाँ एक तरफ वे आजादी बचाओ आन्दोलन के प्रणेता और सूत्रधार थे, तो वहीं दूसरी तरफ वे ‘इण्टरनेशनल मैथमेटिकल काउंसिल फार डेवलपिंग कण्ट्रीज’ के अध्यक्ष भी थे। डा. शर्मा इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में अपवादस्वरूप एकमात्र ऐसे लेक्चरर थे जिन्होंने रीडर और फिर रीडर बनने के बाद प्रोफेसर के लिए तब कहीं जाकर आवेदन किया था जब विभाग में उनसे किसी भी रूप में सीनियर रहे शिक्षक गण रीडर और प्रोफेसर बन चुके थे। आवेदन-पत्र में डा. शर्मा ने यह बात साफ-साफ लिख दी थी कि वे चयन समिति के सामने साक्षात्कार देने नहीं आयेंगे। हाँ, अगर उनके शिक्षण व शोध कार्यों के परिप्रेक्ष्य में उन्हें सर्वथा योग्य और उपयुक्त पाया जाय, तो उन्हें पद आफर कर दिया जाय। आखिरकार हुआ भी यही। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि जब वे इलाहाबाद युनिवर्सिटी में सिर्फ लेक्चरर थे, तभी पेरिस विश्वविद्यालय में डीएस्-सी पूरी करने के बाद उन्हें प्रोफेसर का पद ससम्मान आफर किया गया। उन्होंने वहाँ सिर्फ एक साल पढ़ाया और उसके बाद स्वदेश आकर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ाने लग गये। पेरिस विश्वविद्यालय से ऐसा सर्वोच्च अकादमिक सम्मान पाने वाले वे शायद पहले भारतीय विद्वान थे।

सर्वोदय आन्दोलन से अपनी विचार एवं संघर्ष यात्रा शुरू करने वाले डा. बनवारी लाल शर्मा सम्पूर्ण क्रान्ति के आन्दोलन में शामिल ऐसे समाजकर्मियों की अगली कतार में थे जिनका सत्ता व दल की राजनीति से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था। इमरजेंसी के दौरान वे 19 महीनों तक सेण्ट्रल जेल, नैनी में बन्द रहे। जेल में रहकर उन्होंने अमूर्त गणित की अधुनातन शाखा Topology में दो किताबें लिखीं:- सामान्य संस्थिति और बीजगणितीय संस्थिति।
इमरजेंसी के बाद लोकसभा के चुनाव हुए। इन्दिरा सरकार का पतन हुआ और जनता पार्टी की सरकार बनी। सम्पूर्ण क्रान्ति के आन्दोलन का पटाक्षेप हो गया। ज्यादातर समाजकर्मी सत्ता व दल की राजनीति के दुश्चक्र में फँसते गये। जो लोग सत्ता व दल की राजनीति में अपनी गोटी नहीं फिट कर सके, उन्होंने अपने-अपने एनजीओ साम्राज्य खडे़ कर लिये। सर्वोदय और समाजवादी आन्दोलन का पराभव होता गया। सम्पूर्ण क्रान्ति का आन्दोलन व्यवस्था-परिवर्तन के लिए था लेकिन सत्ता-परिवर्तन के साथ ही वह खत्म हो गया। जीवन की सांध्य वेला में जेपी ने भी घोषित कर दिया कि ‘जनता पार्टी मेरे अस्तित्व का एक हिस्सा है’ (Janta Party is part of my being.); मानो उनके जीवन का मिशन पूरा हो गया। पार्टी व सरकार के विघटन का दुर्दिन देखने के बाद ही जेपी संसार से रुखसत हुए।
सरकारें आती जाती रहीं। सम्पूर्ण क्रान्ति की कोख से निकले नेता भी कुर्सी की राजनीति में रमते गये और भ्रष्ट होते गये। सत्ता व दल की राजनीति में ऐसा आमूलचूल बदलाव आ गया कि सच्चे अर्थों में प्रतिपक्ष पूरी तरह ध्वस्त हो गया। ऐसे पक्षातीत या दलमुक्त लोगों की संख्या लगातार कम होती गयी जो लोकशक्ति के प्रयोगों व आन्दोलनों में प्रभावी ढंग से लगे हों। इन कठिन परिस्थितियों में बनवारी लाल जी ने 5 जून, 1989 को आजादी बचाओ आन्दोलन की नींव रखी। यह आन्दोलन वैश्विक कारपोरेट समूहों या घरानों के चुनिन्दा नामचीन ब्राण्डेड उत्पादों के बहिष्कार और होलिका-दहन से शुरू हुआ और जगह जगह जमीनी संघर्ष करते-करते आज वह इस मुकाम पर पहुँच गया है कि जब स्थानीय जनसमुदाय यह कहने लग गये हैं कि उनके क्षेत्र में विद्यमान प्राकृतिक संसाधन न कम्पनियों के हैं, न सरकारों के बल्कि वहाँ रहने वाले लोगों के हैं।
डा. कृष्णस्वरूप आनन्दी





