शशिकांत गुप्ते
आज सीतारामजी मुझे मिले। मिलते ही उन्होंने मुझे निम्न पंक्तियां सुनाई।
गिरते हैं ख्याल तो गिरता है आदमी
जिसने इन्हे संभाला,वो खुद संभल गया
मैने कहा सच में इन दिनों लोगों के ख्याल मतलब विचार गिर ही रहें हैं।
गिरते हुए विचारों के कारण बहुत से लोग अपनी लकीर बड़ी करने के बजाए दूसरों की लकीर पोंछ कर छोटी करने का षडयंत्र रच रहें हैं।
अपनी लकीर बड़ी करने से तात्पर्य अपनी योग्यता,क्षमता
और गुणवत्ता के बल पर स्वयं
के आत्म विश्वास के साथ अपनी उपलब्धियों को समाज के समक्ष प्रकट करना होता है।
जिन लोगों के पास अपनी स्वयं की योग्यता,क्षमता,और गुणवत्ता नहीं होती,वे लोग हमेशा दूसरों की लकीर पोछने का कुत्सित कर्म करते रहते हैं।
ऐसे लोग हमेशा दूसरों पर दोषारोपण करते हैं।
दूसरों पर दोषारोपण करना मतलब अपनी नाकामियों को छिपाने का असफल प्रयास करना।
कोई लाख कोशिश करें अपनी असफलताओं को छिपाने की,लेकिन शायर मुनीर अनवर का ये निम्न शेर वास्तविकता बयां कर ही देता है।
कह रही है शहर की बर्बादियों की दास्ताँ
अध-जले कुछ काग़ज़ों में इक कहानी की किताब
यह कहानी नहीं हक़ीक़त है।
सीतारामजी ने मेरी बात गंभीरता से सुनने पर मुझ से कहा इन दिनों हक़ीक़त बयां करना भी साहस का काम हो गया है।
गांधीजी ने कहा स्वयं की गलती को स्वीकार करना और अपने किए पर क्षमा मांगना भी साहस का काम है।
मैने कहा देश का दुर्भाग्य है कि,
गांधीजी के आदर्श विचारों में जो व्यापक रूप से प्रगतिशीलता थी,उसी प्रगतिशीलता से भयभीत होकर संकीर्ण सोच रखने वालों ने गांधीजी के शरीर की हत्या की।
गांधीजी के आदर्श रूपी विचार अमर रहेंगे।
सीतारामजी ने मुझसे कहा इसीलिए चर्चा की शुरुआत में ही मैने विचारों के गिरते स्तर पर उपर्युक्त पंक्तियां सुनाई।
इन पंक्तियों में स्पष्ट लिखा है,जब आदमी के ख्याल गिरते हैं तो वह स्वयं भी समाज की नजरों से
गिरता है,मतलब अपने आचरण से गिरता है।
ऐसे व्यक्ति को अपने एक झूठ को छिपाने के लिए,बार बार झूठ बोलना पड़ता है।
ऐसे लोगों के लिए यह कहावत एकदम सटीक है।
चूहे जमीन को कुरेद कर बिल बनाते हैं,और ऐसे रेडिमेड बिल में भुजंग रहते हैं।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





