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निजीकरण की राह पर रेलवे*भाग -5 निजीकरण-निगमीकर

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जे. एन. शाह

सरकारी/सार्वजनिक प्रतिष्ठानों, उपक्रमों का निजीकरण, निगमीकरण संकट का कोई स्थाई समाधान है ही नहीं। क्योंकि कोई भी निजी भागीदार, कारपोरेट, निवेशक जनता या देश के प्रति अपनी जवाबदेही के लिए निवेश नहीं करता बल्कि सिर्फ मुनाफा कमाने की अपनी अनवरत क्षुधा के लिए निवेश करता है। मुनाफे की हवस पालने के कारण उनके द्वारा नियंत्रित, संचालित उपक्रमों के सर्वसुलभ सस्ता होने की कदापि उम्मीद नहीं की जा सकती है। हाल के घटनाक्रम में लखनऊ-नई दिल्ली के बीच संचालित प्रथम निजी रेलगाड़ी ‘तेजस एक्सप्रेस’ का किराया उसी दूरी तथा इतने ही समय (सिर्फ 25 मिनट का अंतर) का इस प्रकरण को समझने के लिए पर्याप्त है।
यात्रा किराया
शताब्दी एक्सप्रेस – तेजस एक्सप्रेस
एसी चेयर कार रु. 970/- (फिक्स्ड) रु. 1280/-
एसी प्रथम श्रेणी रु. 1935/- (फिक्स्ड) रु. 2450/- एक्जीक्यूटिव क्लास
डायनेमिक प्राइसिंग कोई योजना नहीं रु. 4325/- (अब तक अधिकतम)

बड़ी बात यह है कि बगैर आधारभूत ढांचा (पटरी, सिग्नल, स्टेशन, डिब्बे रेलवे के ही हैं) खड़ा किए  सिर्फ थोड़ी पूंजी लगाकर अकूत मुनाफा कमाने का इससे सरल जरिया और क्या हो सकता है? वर्षों के  आमजनों के श्रम तथा देश के संसाधनों से खड़े किए सार्वजनिक उपक्रम के मजबूत ढांचे का प्रयोग तो वे मुनाफा के लिए निर्बाध रूप से कर रहे हैं। और जब उपक्रम घाटे में आ जाते हैं तो सरकार की सहायता से ही वे उनसे पिंड भी छुड़ा लेते हैं, अर्थात् मुनाफे का निजीकरण और घाटे का सार्वजनिकरण।

दूरसंचार के क्षेत्र में बीएसएनल, एमटीएनएल का हश्र तथा निजी क्षेत्र के भी नामचीन किंगफिशर, जेट एयरवेज, बैंकिंग में यस बैंक के इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि वर्तमान दौर के आर्थिक सुधार, ढांचागत समायोजन, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पूंजी और हुकूमत के गठजोड़ के गंभीर संकट का सामना करने की प्रतिक्रिया के तौर पर ही हैं।
संकटग्रस्त, विफल हो चुकी यह व्यवस्था, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, अपराध, पर्यावरण के मोर्चे पर सामने आ रही भयावह सामाजिक, आर्थिक कड़वी सच्चाई को झुठलाकर, आंकड़ों को दबाकर अब ‘आस्था तथा विश्वास’ की लगातार मांग देशवासियों से कर रही है तथा दुहाई दे रही है कि आप विश्वास करें “देश सुरक्षित हाथों में है”, “आत्मनिर्भर बनें”, देश को अब कोई आंख नहीं दिखा सकता। सरकारों, संसदीय राजनीतिक दलों का दायरा पूरी तरह लोकतांत्रिक स्वरूप से (जो शायद ही वास्तविक रूप से कभी रहा) सिमटकर व्यक्तिगत छवि, आभामंडल निर्माण में लग चुका है। हर वक्त, हर मौके, हर जगह पर एक ही व्यक्ति को बहुरूपिया बनाकर (भेष बदलकर) सर्वशक्तिसंपन्न, सर्वगुणसंपन्न, तारणहार, नायक के रूप में सरकारी, निजी, इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट, सोशल मीडिया द्वारा लगातार देश, जनता के सामने रखा जा रहा है, जिससे चमत्कार/तिलिस्म का जाल और भ्रम बना रहे। देश के लोकतांत्रिक संस्थाओं तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था को बचाना भी आज मजदूर संगठनों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है क्योंकि रेलवे समेत देश की अफसरशाही सारे नियम कानून को तोड़कर, सारी सीमाओं को लांघकर अपने कर्मचारियों को सिर्फ भय के माहौल में कार्य कराने पर उतारु हो चुकी है।
बहुप्रचारित, रेलवे की महत्वकांक्षी योजना, डेडिकेटेड फ्रेट कोरिडोर जिसके अंतर्गत पांच मालगाड़ी रूट- ईस्टर्न डेडीकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (लुधियाना – कोलकाता 1800 किमी), वेस्टर्न डेडीकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (दादरी – जेएनपीटी 1500 किमी), इस्ट कोस्ट कोरिडोर (खड़गपुर – विजयवाड़ा 1000 किमी), साउथ इस्ट – वेस्ट कॉरिडोर (भुसावल धानकुनी 1500 किमी), नार्थ-साउथ सब कोरिडोर (विजयवाड़ा दृ इटारसी 1500 किमी) बनाए जा रहे हैं, जिनमें से पहले दो 2021 तक पूरे किए जाने का लक्ष्य है, आगामी 150 निजी ट्रेनों को चलाने हेतु मार्ग प्रशस्त करने का ही एक उपक्रम है। क्योंकि वर्तमान समय में मालगाड़ियों के परिचालन में ये यात्री सवारी गाड़ियां ट्रैफिक कंजेशन (तथाकथित) पैदा कर रही हैं। इस प्रकार एक साथ दो लक्ष्य साधे जा रहे हैं, डेडिकेटेड फ्रेट कोरिडोर पूरी तरह से रेल राजस्व (माल ढुलाई से प्राप्त राजस्व) पर प्रभाव डालेगा तथा मालगाड़ी स्लाट निजी सवारी गाड़ियों के परिचालन हेतु उपलब्ध हो जाएगा।

जे. एन. शाह

निजीकरण की राह पर रेलवे**भाग -6*        *बड़ी संख्या में नौकरियों में कटौती

यूं तो रेलवे में ‘राइट साइजिंग’ के नाम पर निजीकरण, निगमीकरण की योजना पर अमल आज से ढाई दशक पूर्व 1995 में आए पांचवे केंद्रीय वेतन आयोग की रिपोर्ट के बाद ही शुरू हो गया था जिसे रेलवे के मान्यताप्राप्त-गैरमान्यताप्राप्त यूनियन सब जानते हुए भी कोई मजबूत विरोध का स्वरूप तैयार नहीं कर पाए । रेलवे को 9 जोनों से 16 जोनों में पुनर्विभजित करना, 10 नए मंडल बनाना, उसी का हिस्सा था, जिससे छोटे-बड़े-देशी-विदेशी खरीदार, निवेशक आसानी से रेलवे में अपनी पैठ बना सकें। वर्ल्ड बैंक के ऋण के दबाव में रेलवे बोर्ड पहले ही यह फैसला ले चुका था कि कभी 18 लाख की रेलकर्मचारियों की संख्या को धीरे-धीरे 9 लाख पर लाना है। आज इसे लगभग 13 तेरह लाख के नीचे लाया जा चुका है। वह भी तब, जब रेलवे का परिचालन बहुत अधिक बढ़ चुका है। आज रेलवे में संरक्षा श्रेणी समेत लगभग 2.6 लाख पद खाली पड़े हैं, परंतु नई भर्तियां लगभग बंद हैं। वर्तमान सरकार के 30 मई 2019 के शपथ ग्रहण के दिन ही उत्तर रेलवे के 13 विभागों के लगभग 26,000 पदों को समाप्त करने की घोषणा की गई जिसकी मुनादी वर्तमान सरकार के पिछले कार्यकाल के अंतिम दिनों में की जा चुकी थी। इनमें एकाउंट्स के 191 पद, इंजीनिरिंग के 7338 पद, मैकेनिकल (ओएंडएफ) के 2783 पद, मैकिनकल (सीएंडडब्ल्यू) के 1938 पद, मैकेनिकल (डीजल शेड) के 1014 पद, सिग्नलध्टेलिकॉम के 1573 पद, इलेक्ट्रिकल (जी) के 1541 पद, इलेक्ट्रिकल (टी.आर.डी.एंड.टी.आर.एस.) के 550 पद, मेडिकल के 875 पद, सिक्योरिटी के 1292 पद, कमर्शियल, 2601 पद, स्टोर के 19 पद शामिल हैं। यानी इन विभागों के ग्रुप सी में 18602 पर और ग्रुप डी में, 7658 पद समाप्त होने हैं। ऐसा नहीं है कि रेलवे के इन विभागों के पास काम नहीं रह गया है। दरअसल ये पद इसलिए खत्म किए जा रहे हैं क्योंकि बहुत सारे विभागों में रेलवे ने कार्यों को आउटसोर्स कर दिया है जिससे कर्मचारियों के पास कोई काम नहीं बचा है। इन आउटसोर्स कर्मचारियों से काफी कम वेतन पर, बिना किसी श्रम कानून का अनुपालन किए, कार्य कराये जा रहे हैं तथा रेलवे इसी तरह से अपने सभी काम कराना चाह रही है जिससे उसे न्यूनतम वेतन के साथ ही वे सारी सुविधाएं भी न देनी पड़े जो रेलकर्मियों ने लंबे संघर्ष के बाद हासिल की हैं। 2014 में प्रधानमंत्री में वाराणसी की अपनी विजयी सभा में कहा था कि रेलवे को बेचने से पहले वे मर जाना पसंद करेंगे, पता नहीं उन्हें ये वक्तव्य आज भी याद है या नहीं। निजीकरण फिर से देश की पहले से ही वर्गीय, वर्णीय, श्रेणीगत आधार पर विभाजित गैर बराबरी वाली सामाजिक व्यवस्था को फिर से और मजबूत स्थिति में ले जाने का गंभीर षड्यंत्र है। आज भी रेल मंत्री लगातार यह बयान दे रहे हैं कि रेलवे में नौकरियों का समाप्त होना देश की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छे संकेत हैं।

Special Report (Agenda 2014) - रेलवे का निजीकरण - YouTube

निजीकरण का मार्ग प्रशस्त करने हेतु आकर्षक सेवानिवृत्ति का प्रस्ताव
विगत वर्षों रेलवे ने संरक्षा और श्रमसाध्य विभागों से जुड़े परिचालन (लोको पायलट्स, गार्ड्स, ट्रैकमैन) कर्मचारियों के लिए एक सेवानिवृत्ति योजना लारजेस- (लिबरलाइज्ड एक्टिव रिटायरमेंट गारंटेड इंप्लायमेंट फार सेफ्टी स्टाफ) लाया था। इसमें वैसे लोकोपायलट्स जिनकी उम्र 55-57 के बीच तथा सेवा अवधि 33 वर्ष पूरी हो चुकी थी, अन्य श्रेणियों के लिए (उम्र सीमा 50-57 के बीच तथा सेवा अवधि 20 वर्ष) हो चुकी थी, उनके फिजिकल फिटनेस के मापदंडों को देखते हुए, उनके आवेदन पर उन्हें सेवानिवृत्ति का प्रस्ताव था। इस तरह सेवानिवृत्ति लेने पर, अन्य योग्यताओं के पूरा करने पर, कर्मचारी के एक आश्रित पुत्र-पुत्री को 1900 के ग्रेड पे में नियुक्ति देने का प्रस्ताव था। एक अच्छी खासी संख्या में लोको पायलटों द्वारा उस योजना का लाभ उठाया गया क्योंकि उनकी नजर में कम से कम एक सरकारी नौकरी की गारंटी काफी मायने रखती थी। बाद में रेलवे द्वारा, न्यायालय के फैसले के आलोक में इस योजना को बंद कर दिया गया। हालांकि न्यायालय के काफी सारे फैसले सरकार अपनी सुविधानुसार ही लागू करती है।

Rail Budget 2019: How Much Effective PPP Formula For Indian Railways - ' निजीकरण' से बदलेगी रेलवे की तस्वीर? 50 लाख करोड़ निवेश के लिए कितना कारगर  होगा PPP फार्मूला | Patrika News

अब जब वर्तमान समय में रेलवे ने अपने हर विभाग के स्थायी कर्मचारियों को हर हालत में कम करने की योजना बना ली है, फिर से एक नई सेवानिवृत्ति योजना ‘‘सैल्यूट’’- (स्कीम फार एडवांस्ड एंड लिबरलाइज्ड अनबर्डेनिंग आफ ट्रैक मेंटेनर्स/इंजिन पायलट्स) लाई गई है। इसमें भी इन्हीं दोनों कैटेगेरी ( ट्रैकमैन, लोकोपायलट्स) को लक्ष्य किया गया है, क्योंकि अन्य श्रेणियों के रेलवे कर्मचारियों को हटाने (उनके काम संविदा पर कराने) की योजना पर अमल पहले ही हो चुका है। गुड्स एवं यात्री गाड़ियों के परिचालन में भी आनेवाले समय में निजी कर्मचारियों को नियुक्त किये जाने के खतरनाक संकेत विभिन्न माध्यमों से मिल रहे हैं। उसी के परिप्रेक्ष्य में इस सेवानिवृत्ति योजना को देखा जा सकता है। रेलवे हालांकि उनके सेवानिवृत्ति के लिए कठिन ड्यूटी, स्वास्थ्य, बढ़ती उम्र, संरक्षा-सुरक्षा के खतरे का हवाला दे रही है, और 60 साल की उम्र तक प्रतिवर्ष तीन सेट सुविधा पास, वार्षिक वेतनवृद्धियों के आधे का लाभ का प्रोत्साहन भी दे रही है, लेकिन आश्रितों की नियुक्ति का कोई प्रावधान इस नई योजना में नहीं है। रेल महकमे के इन खोखले तर्कों की असलियत तब उजागर हो जाती है जब सेवानिवृत्त किए हुए कर्मचारी के पुनः उसी कार्यालय में मानदेय पर नियुक्त कर लिया गया है।

जे. एन. शाह

*क्रमशः भाग 7 में

  

Ramswaroop Mantri

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