अनिमेष मुखर्जी
अपने जीवन के अंतिम सालों में अमिताभ बच्चन के हाथों लाइफटाइम अचीवमेंट लेकर राजेश खन्ना ने अपनी चिर परिचित अदा में कहा था, ‘अब यहां कोई और है, कल यहां कोई और था, ये भी एक दौर है वो भी एक दौर था’
मुझे 70 के दशक के सिनेमा में से कोई एक फ़िल्म चुननी हो तो वो ‘शोले’ नहीं ‘आनंद’ होगी. लिंफोसर्कोमा ऑफ द इंटेस्टाइन से जूझते आनंद सहगल की जीवटता और सकारात्मकता की कोई तुलना नहीं है.
शुरुआत से ही दर्शकों को स्पष्ट होता है कि हिंदी सिनेमा के अंतिम क्षणों में देवी के हाथ से फूल गिरने जैसा कोई चमत्कार इस फिल्म में नहीं होगा. आनंद को मरना है वो मरेगा ही. मगर फिर भी इससे ज्यादा सकारात्मकता किसी और फिल्म में देखने को नहीं मिलती.
आनंद के पास अपनी कोई बकेट लिस्ट नहीं है. वो दुनिया में अधूरे छूट गए सपनों को पूरा करने नहीं भाग रहा है. उसे हर पल को बस भरपूर जीना है. अपने आस-पास के लोगों की जिंदगी बेहतर बनानी है ताकि वो उसे अपने-अपने तरीके से याद रखें. अपने बाबू मोशाय का बक-बककर सर खा जाने वाले आनंद की वो टेप रिकॉर्डर वाली आवाज आज भी रोंगटे खड़े कर देती है. एहसास दिलाती है कि ये हम पर निर्भर करता है कि हमारे जाने के बाद दुनिया में हमारे काम के नाम पर क्या याद रह जाएगा.
सिर्फ ‘आनंद’ ही क्यों सबकी समस्या को सुलझाने वाले ‘बावर्ची’ को ही ले लीजिए. नेकी कर और दरिया में डाल जैसे कॉन्सेप्ट के साथ-साथ लोगों को किसी तरह से जज न करते हुए उनकी समस्या समझाने वाले राजेश खन्ना पर्दे पर कुछ ऐसा निभाकर गए हैं जिसे सिर्फ चेहरे के हावभाव और संवादों की अदायगी में नहीं मापा जा सकता. बाद में जितने भी लोगों ने ‘बावर्ची जैसा कुछ’ बनाने की कोशिश की, हिंदी सिनेमा के येन केन प्रकारेण नायिका को पाने वाले खेल से आगे कुछ नहीं कर पाए.
एक ओर जहां सिनेमाई पर्दे पर राजेश खन्ना सकारात्मकता से भरे किरदारों को नई ऊंचाइयां दे रहे थे. सफलता और पैसे के नशे में उनके पैर जमीन से हट रहे थे. ‘अमर प्रेम’ के नायक की प्रेमिका अंजू उसके चारों तरफ खिंची चमचो और चाहने वालों की दीवार के चलते दूर हो गई. अपनी फैन डिंपल से उनकी शादी एक ऐसी घटना थी जिसे शायद नहीं होना चाहिए था. प्रेम पर फैन के चुनाव में मुमकिन है कि ये खयाल न आया हो कि जिंदगी में 3 घंटे के बाद शो खत्म नहीं होता. काका अपनी फिल्मों के सेट और आशीर्वाद के कमरों में ‘खन्ना दरबार’ लगाते रहे. देखते ही देखते डिंपल भी उनसे दूर चली गईं. और वो अकेले रह गए.
दूसरी तरफ एक उनकी फिल्म ‘नमक हराम’ रिलीज हुई. फिल्म रिलीज होने के पहले लोग इसे लेना नहीं चाहते थे क्योंकि सबको लगता था कि फ्लॉप फिल्मों की सीरीज दे चुके अमिताभ इस फिल्म पर भी ग्रहण लगा देंगे. सबकी मांग थी कि काका का रोल बढ़ाकर बच्चन के सीन कम किए जाएं. मगर तक ‘जंजीर’ रिलीज हो गई.
राजेश खन्ना पर लिखी अपनी किताब में यासिर उस्मान लिखते हैं कि ‘नमक हराम’ से पहले डिस्ट्रिब्यूटर अमिताभ के कानों को ढकने वाले बालों का मजाक उड़ाते हुए उन्हें बंदर जैसा बताते थे. मगर इस फिल्म के रिलीज होते होते पाला बदल गया था.
अब बंद गले के कुर्ते और पीछे की तरफ सलीके से कढ़े हुए बालों वाले पुरुषत्व की जगह 3 खुले बटनों वाली कमीज और बिखरे बालों से मर्दानगी तय होने का दौर आ गया था. बॉम्बे के हेयर कटिंग सलून में नए बोर्ड लग गए थे. इनपर लिखा था. अमिताभ कट साढ़े तीन रुपए राजेश खन्ना कट दो रुपए. दौर एक बार फिर बदल चुका था.





