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राममंदिर ध्वजारोहण कार्यक्रम,भारत ने वैज्ञानिकता, तर्कशीलता, सहिष्णुता और भाईचारे को छोड़कर घृणा और बर्बरता का रास्ता चुन लिया है

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भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बनाए रखने की संवैधानिक शपथ लेने वाले भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या स्थित राममंदिर पर ध्वजारोहण करेंगे। यह कार्यक्रम आरएसएस के ब्राह्मणवाद की विजय और धर्मनिरपेक्षता के अंत की घोषणा के कार्यक्रम के सिवाय कुछ भी नहीं।

(सच तो यह है कि बाबरी मस्जिद का धीरे-धीरे राममंदिर में बदलते जाना और अंत में बाबरी मस्जिद का नामोनिशान मिट जाना भारतीय लोकतंत्र के हिंदू राष्ट्र बनने की यात्रा के विभिन्न पड़ाव रहे हैं, जिसकी अंतिम मंजिल है—उस जगह पर भव्य राममंदिर के निर्माण के लिए गाजे-बाजे के साथ राष्ट्रीय स्तर पर जश्न मनाते हुए 22 जनवरी 2024 की प्राण-प्रतिष्ठा और आज का ध्वजारोहण कार्यक्रम।)

दशरथपुत्र राम सभी हिंदुओं के ईश्वर नहीं हैं। न ही सभी हिंदू उनके लिए समान रूप से प्रिय हैं। उन्हें वैदिक धर्म का पालन करने वाले ब्राह्मण और द्विज सबसे प्रिय हैं। उन्होंने स्वयं इसकी घोषणा की है—

सब मम प्रिय सब मम उपजाए।

सब ते अधिक मनुज मोहि भाए॥

तिन्ह महँ द्विज, द्विज महँ श्रुतिधारी।

तिन्ह महुँ निगम धरम अनुसारी॥

(अर्थात—दशरथपुत्र राम कह रहे हैं कि सारी सृष्टि मैंने पैदा की है। इसमें मनुष्य मुझे सबसे अधिक प्रिय हैं, लेकिन मनुष्यों में सबसे अधिक प्रिय मुझे द्विज (जनेऊधारी—ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) हैं। इनमें भी मेरे सबसे अधिक प्रिय वे हैं जो वेद मानते हैं और वर्ण-धर्म का आचरण करते हैं।)

श्रुति (चारों वेद) को मानने वाले और निगम धर्म (वर्ण व्यवस्था) का पालन करने वाले ही राम को सबसे अधिक प्रिय हैं। गैर-द्विज—शूद्र (आज के पिछड़े, दलित और महिलाएँ) उनके लिए दोयम दर्जे के हैं।

राम के इस कथन में कोई अस्पष्टता न रहे, इसलिए तुलसीदास ने स्वयं स्पष्ट किया है कि राम का अवतार ब्राह्मणों और गायों के हित के लिए हुआ—

विप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।

निज इच्छा निर्मित तनु, माया गुन गोपार।।

रामराज्य की सबसे बड़ी विशेषता भी तुलसीदास बताते हैं—

वर्णाश्रम निज-निज धरम निरत, वेद पथ लोग।

इस पर टिप्पणी करते हुए रामस्वरूप वर्मा बिल्कुल सटीक लिखते हैं कि स्पष्ट है—यदि रामराज में वर्णाश्रम धर्म का पालन हो रहा था, तो उसमें सबसे अधिक फायदा ब्राह्मणों को था।

तुलसी के रामचरितमानस के अनुसार जहां वर्णाश्रम धर्म का पालन रामराज की सबसे बड़ी विशेषता है, वहीं शूद्र द्वारा द्विजों की बराबरी का दावा करना—कलियुग का सबसे बड़ा लक्षण कहा गया—

बादहिं सूद्र द्विजन्ह सन, हम तुम्हते कछु घाटि।

जानइ ब्रह्म सो विप्रवर, आँखि देखावहिं डाटि।।

(उत्तरकांड, 1013)

दशरथपुत्र राम का पूरा चरित्र वर्ण-व्यवस्था और ब्राह्मण सर्वोच्चता की स्थापना पर आधारित है—यह स्थापित तथ्य है।

22 जनवरी 2024 (राममंदिर प्राण-प्रतिष्ठा दिवस) धर्मनिरपेक्षता के अंत और ब्राह्मणवाद की विजय का दिवस था। आज का रामध्वजारोहण दिवस उसके जश्न का दिवस है। यह वह दिन था जब भारतीय संविधान की धर्मनिरपेक्षता के झीने आवरण या मुखौटे का अंतिम संस्कार हुआ।

इसके साथ राममंदिर की नींव में धर्मनिरपेक्षता के सभी मूल्यों को दफन कर दिया गया। राममंदिर के ध्वज की पताका फहराने के साथ ही भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का संघ (आरएसएस) का करीब 100 वर्षों पुराना सपना लगभग व्यवहारिक स्तर पर पूरा हो गया।

इस दिन अंतिम तौर पर देश के मुसलमानों को यह बताया जाएगा कि यह देश हिंदुओं का देश है; आप दोयम दर्जे के नागरिक हैं और आपको हिंदुओं के रहमोकरम पर जीने के लिए तैयार हो जाना चाहिए।

इस पूरे मामले में सबसे शर्मनाक यह है कि धर्मनिरपेक्षता के इस अंतिम संस्कार में भारतीय लोकतंत्र के तीन स्तंभ—कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया—की भूमिका रही। कार्यपालिका के प्रधान के तौर पर प्रधानमंत्री स्वयं इस अंतिम संस्कार को अपने हाथों संपन्न कर रहे हैं।

सर्वोच्च न्यायपालिका तो हिंदू बहुमत की आस्था का खयाल रखते हुए बाबरी मस्जिद को राममंदिर घोषित कर पहले ही हिंदू राष्ट्र का मार्ग प्रशस्त कर चुकी है, और मीडिया का जश्न तो देखते ही बन रहा है।

सर्वोच्च न्यायालय ने आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और भाजपा के इस तर्क के आगे घुटने टेक दिए कि “बाबरी मस्जिद ही रामजन्मभूमि है या नहीं, यह तथ्य और तर्क का प्रश्न नहीं, बल्कि हिंदुओं की आस्था का प्रश्न है।” 9 नवंबर 2019 को पाँच न्यायाधीशों की बेंच ने सर्वसम्मति से कहा—“हिंदू श्रद्धालुओं की आस्था और विश्वास के अनुसार विवादित स्थल भगवान राम का जन्मस्थान है।”

अपने निर्णय का आधार अदालत ने दस्तावेजों और मौखिक प्रमाणों को बनाया। अदालत ने कहा—“अंत में हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि हिंदुओं का यह आस्था और विश्वास है कि मस्जिद और उससे संबंधित चीजों के बनने से पहले यह स्थान भगवान राम का जन्मस्थान था। हिंदुओं की यह आस्था और विश्वास दस्तावेजों और मौखिक प्रमाणों से पुष्ट होता है।”

ज्यादातर दस्तावेजी प्रमाण धार्मिक ग्रंथ रहे, और सभी जानते हैं कि मौखिक प्रमाण जमीनी मालिकाने के हक का निर्धारण नहीं करते। लेकिन अदालत ने इन्हीं प्रमाणों को ठोस मानते हुए हिंदुओं की आस्था को सही ठहराया और हिंदू राष्ट्र की परियोजना के आगे साष्टांग हो गई।

दरअसल बाबरी मस्जिद में रातों-रात मूर्तियाँ रखने (22 दिसंबर 1949), ताला खुलवाने (1986), शिलान्यास की इजाजत देने (1989) और मस्जिद ढहाने (6 दिसंबर 1992) में कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया किसी न किसी रूप में लगातार भूमिका निभाते रहे हैं।

नेहरू युग में मूर्ति रखी गई, राजीव गांधी ने ताला खुलवाया और शिलान्यास करवाया, संघ-भाजपा ने मस्जिद गिराई और कांग्रेसी प्रधानमंत्री नरसिंह राव की मौन सहमति से इसे अंजाम तक पहुँचाया। मीडिया ने इसका जश्न मनाया और न्यायपालिका ने अपना सहयोग दिया।

सच यही है कि बाबरी मस्जिद का धीरे-धीरे राममंदिर में परिवर्तित होना और अंत में उसका मिट जाना—भारतीय लोकतंत्र के हिंदू राष्ट्र बनने की यात्रा के पड़ाव रहे हैं, जिनकी अंतिम मंजिल 22 जनवरी 2024 की प्राण-प्रतिष्ठा और आज का ध्वजारोहण है।

भले ही यह तथ्य डरावना लगे, लेकिन अधिक शर्मनाक यह है कि इस 74 वर्षों की यात्रा को भारतीय जनता के एक बड़े हिस्से का समर्थन प्राप्त रहा और आज भी है। भाजपा के उभार और सत्ता के शीर्ष तक पहुँचने में राममंदिर आंदोलन की अहम भूमिका रही है। जनता का यह समर्थन कैसे हासिल किया गया—यह बहस का विषय हो सकता है, पर कठोर सच यह है कि जनता खुद धर्मनिरपेक्षता के अंतिम संस्कार में सहभागी रही।

राममंदिर इस देश को प्रगतिशील, आधुनिक, लोकतांत्रिक और समतामूलक धर्मनिरपेक्ष देश बनाने के स्वप्न की भारी पराजय का प्रतीक है। यह पराजय तात्कालिक है या दीर्घकालिक—यह भविष्य बताएगा। पर फिलहाल आधुनिक लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित भारत की परियोजना का अंत हो चुका है।

इसका प्रमाण है—देश की सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं का हिंदूकरण और बहुसंख्यकवाद के सामने उनका समर्पण। इसमें सत्ताधारी दल के साथ विपक्ष का बड़ा हिस्सा, बौद्धिक वर्ग, सर्वोच्च न्यायालय और मीडिया भी शामिल हैं। मीडिया का बड़ा हिस्सा तो हिंदू राष्ट्र का भोंपू बन गया है।

इसका अर्थ यह भी है कि उदारवादी, वामपंथी और बहुजन-दलित आंदोलनों की वैचारिक व राजनीतिक धाराएँ फिलहाल पराजित हैं और हिंदुत्व का अश्वमेध का घोड़ा बेलगाम आगे बढ़ रहा है—बिना किसी नकेल के।

हिंदू राष्ट्र का अर्थ केवल मुसलमानों के संदर्भ में नहीं देखा जाना चाहिए। इसका वास्तविक अर्थ है—सवर्ण हिंदू पुरुषों का राष्ट्र—ब्राह्मणवादी, वर्ण-जातिवादी और पितृसत्तात्मक राष्ट्र।

हिंदू राष्ट्र मुसलमानों जितना ही, दलितों-बहुजनों, महिलाओं और आदिवासियों के लिए भी खतरनाक है।

इसीलिए डॉ. आंबेडकर हिंदू धर्म पर आधारित हिंदू राष्ट्र को स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व—तीनों के लिए घातक मानते थे। उनके लिए इसका निहितार्थ था—शूद्रों-अतिशूद्रों (आज के ओबीसी-एससी-एसटी) पर द्विज वर्चस्व और महिलाओं पर पुरुष नियंत्रण का स्थायीकरण।

संघ के हिंदू राष्ट्र की परियोजना में राम केंद्रीय प्रतीक हैं। राममंदिर आंदोलन ने भाजपा को सत्ता दिलाई, दलित-बहुजन राजनीति को नियंत्रित किया और उनका हिंदूकरण किया। मंडल की राजनीति के मुकाबले कमंडल की राजनीति को बढ़त दिलाई गई। इसी को आगे बढ़ाते हुए देश को कारपोरेट के हवाले किया गया—और यह बड़ा प्रश्न बहस से बाहर कर दिया गया।

अकारण नहीं कि “जय श्रीराम” सत्ता पर द्विज कब्जे का नारा बन गया। इसी नारे के साथ बाबरी मस्जिद तोड़ी गई; गुजरात नरसंहार, मुजफ्फरनगर-दिल्ली दंगे हुए; मुस्लिम महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार हुए; और आज भी इसी नारे के साथ मुसलमानों, दलितों और आदिवासियों की मॉब-लिंचिंग की जाती है।

दशरथपुत्र राम का मिथक अपने जन्म से ही भिन्न जीवन-पद्धति वाले लोगों को अनार्य, असुर व राक्षस ठहराकर उनकी हत्या को गौरवपूर्ण बताता रहा है। यह नारा हर आधुनिक मूल्य का विरोधी है।

निष्कर्षतः—आधुनिकता का बुनियादी लक्षण है—आस्था पर तर्क की विजय। यदि किसी समाज में शीर्ष स्तर पर आस्था तर्क पर हावी हो जाए, तो वह समाज मध्यकालीन अंधकार की ओर बढ़ रहा है। और यदि यह किसी लोकतांत्रिक राष्ट्र में हो, तो समझना चाहिए कि उस राष्ट्र ने आधुनिकता, वैज्ञानिकता, तर्कशीलता, सहिष्णुता और भाईचारे को छोड़कर आस्था-आधारित घृणा और बर्बरता का रास्ता चुन लिया है।

भारत के इस मध्यकालीन बर्बर युग में प्रवेश पर शर्म और दुख—फिलहाल हमारे हिस्से की नियति है।

Ramswaroop Mantri

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