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राष्ट्र चिंतन : जज लोया, अमित शाह और नेशनल हेराल्ड मामले की जांच

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जूली सचदेवा

     _सरकार जब नेशनल हेराल्ड मामले की जांच करवाने पर पड़ी है तो मैंने जज लोया की हत्या का मामला समझने की कोशिश की। सरकार के पास ईडी है तो हमारे पास किताबैं हैं, गूगल है और अखबारों पत्र-पत्रिकाओं में छपी खबरें हैं। जज लोया की हत्या पर सबसे अच्छी पड़ताल पत्रकार निरंजन टाकले की है। हिन्दी में एक किताब, सत्ता की सूली तीन पत्रकारों – महेन्द्र मिश्र, प्रदीप सिंह और उपन्द्र चौधरी की है।_

       निरंजन टाकले की किताब मुख्य रूप से जज लोया पर ही केंद्रित है और जज बृजगोपाल हरिकिशन लोया (1966-2014) को समर्पित है। 

        सत्ता की सूली में निरंजन टाकले और उनकी रिपोर्ट को भी कोट किया गया है और इसमें बताया गया है कि जज लोया कि हत्या कई हत्याओं के क्रम में हुई है और सजा से बचने के लिए करवाई गई हो सकती है। चूंकि जज की हत्या अपने आप में महत्वपूर्ण है इसलिए इस मामले से बचने के लिए भी संभवतः कुछ हत्याएं करवाई गईं और जज लोया मामले के बारे में जानने वाले बहुत कम लोग दुनिया में बचे हैं।

       इसलिए किताबों का अपना महत्व है क्योंकि अब किसी की हत्या से मामला दबने छिपने वाला नहीं है। सब कुछ खुले में आ चुका है। आमतौर पर किसी को भी उपलब्ध है। 

सत्ता की सूली में लेखकों ने लिखा है, “… किताब में कोई नई चीज नहीं दी गई है … सारी बातें पहले से मीडिया और अदालत के माध्यम से पबलिक डोमेन में है …।”  इस पुस्तक से याद आया कि मौत सिर्फ जज लोया की नहीं हुई है। उनके पहले की मौतों की चर्चा करने से पहले उनके बाद हुई दो मौतें उल्लेखनीय हैं।

      जज लोया को जब एक लिखा हुआ फैसला इस सलाह के साथ मिला कि उसपर दस्तखत कर दिया जाए और बदले में 100 करोड़ रुपए मिल जाएंगे तो वे काफी परेशान हुए और कुछ करीबी मित्रों से चर्चा की। जो इस बात के गवाह हो सकते थे कि उनकी हत्या हुई है। इस पुस्तक की भूमिका बॉम्बे हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश, जस्टिस बीजी कोलसे पाटिल ने लिखी है।   

      इसमें वे बताते हैं, एक दिन लोया जी के तीन मित्र मुझसे मिलने आए। इनमें एक श्रीकांत खंडालकर थे जो सातवीं मंजिल से गिरकर मर गए। वैसे तो इसे आत्महत्या कहा गया पर जानने वाले कहते हैं कि यह हत्या है। इसी तरह पूर्व जज प्रकाश थोम्ब्रे ट्रेन में ऊपर की बर्थ से गिरकर रीढ़ की हड्डी टूटने के कारण मर गए।

       इस मामले की जानकारी रखने वाले कोलसे पाटिल के अलावा तीसरी हस्ती हैं, एडवोकेट सतीश यूके जो अभी सुरक्षित हैं। इनको भी मारने की कोशिश हो चुकी है। इस तरह जज लोया की मौत अकेली नहीं है उससे संबंधित दो मौतों के अलावा एक हत्या की कोशिश का मामला भी है। चूंकि इन हत्याओं के आरोपी सरकार में हैं इसलिए जांच नेशनल हेराल्ड मामले की हो रही है। 

आप जानते हैं कि जज लोया के पास केंद्रीय मंत्री अमित शाह का मामला था। पुस्तक में बताया गया है और लोग जानते हैं कि वे अदालत में तारीख पर नहीं जाते थे और इसे राजनीतिक मामला बताया जा रहा था जबकि जज लोया उनकी उपस्थिति के लिए निर्देश दे रहे थे।

      इसी बीच फैसले का ड्राफ्ट और 100 करोड़ की पेशकश से मामला गंभीर हो गया और जज लोया की हत्या के बाद उन्हें जमानत भी मिल गई। लेकिन जज लोया और बाद की दो मौतों को संदिग्ध मानकर कई लोग सवाल उठाते रहे हैं।

      सामाजिक कार्यकर्ता मुकेश साहू ने सुप्रीम कोर्ट में शपथ देकर जज लोया और एडवोकेट खंडालकर की मौत को सुनियोजित हत्या बताया है। 

संक्षेप में इस कहानी की शुरुआत 22 नवंबर 2005 से मानी जा सकती है। तीन व्यक्तियों – सोहराबुद्दीन, उसकी पत्नी कौसर बी और तुलसीराम प्रजापति को बस से उतार कर फर्जी एनकाउंटर में मार दिया गया।

     बाद में कॉल डीटेल से पता चला कि एनकाउंटर करने वाली टीम से एक व्यक्ति संपर्क में था जो उस समय गुजरात का गृहमंत्री अमित शाह था। एक और व्यक्ति इस टीम के संपर्क में था वह मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का ओएसडी पराग शाह है।

      पुस्तक के एक अध्याय, कॉल डीटेल्स में कैद सबूत में कहा गया है, …. राणा अयूब के हवाले से सामने आए एक सरकारी आधिकारिक नोट में इसपर विपरीत टिप्पणी की गई थी ….। इसके अनुसार …. कॉल की फ्रीक्वेंसी (आवर्तता) अस्वाभाविक है और इतनी बड़ी संख्या में कॉल किया जाना बिल्कुल असाधारण है ….।    

इसका कारण सीबीआई की 23 जुलाई 2010 की चार्जशीट से पता चलता है। इसके अनुसार नेताओं और गुजरात पुलिस अफसरों के संरक्षण में अमित शाह एक फिरौती रैकेट चलाते हैं।

     सीबीआई जांच अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने अपनी चार्जशीट में बताया कि अमित शाह और अभय चुडास्मा, सोहराबुद्दीन का इस्तेमाल वसूली के लिए करते थे। कहने की जरूरत नहीं है कि यह लेखकों की खोज नहीं है बल्कि जांच में सामने आया है और रिकार्ड में दर्ज है।

       सार्वजनिक तौर पर पहले से उपलब्ध है। इस मामले में एक गवाह आजम खान के हवाले से खबर थी कि हरेन पंड्या (गुजरात के एक और मंत्री) की हत्या सोहराबुद्दीन के इशारे पर तुलसी राम प्रजापति ने की थी। 

यह अलग मामला है। लेकिन तार तो जुड़ते हैं। इससे संबंधित कई सवाल अनुत्तरित हैं। इसकी जांच हुई ही नहीं। संतोषजनक जवाब का तो रिवाज ही नहीं है। प्रेस कांफ्रेंस इसीलिए नहीं होती है। हालांकि, पुस्तक के अनुसार आजम खान से सीबीआई अफसर ने कहा था, नये बखेड़े मत डालो। (कई बार अनुवाद किए जाने के बाद संभव है शब्द कुछ और रहे हों)।

         दिलचस्प यह है कि मामले की गंभीरता के कारण ही इसे गुजरात से मुंबई भेजा गया था और जब मामला किसी अंजाम पर नहीं पहुंचा तो मामले की जांच कराने की मांग की गई। महाराष्ट्र सरकार (जो उस समय भाजपा की थी और अभी जैसी नहीं थी) ने पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी को अपना वकील बनाया। 

वे इस बात से बेहद दुखी और अचंभित थे कि याचिकाकर्ता के वकील लोया की मौत के मामले में स्वतंत्र जांच की मांग करते हुए जजों की गवाहियों पर सवाल उठा रहे हैं।   

         इस मामले में एक याचिकाकर्ता के वकील दुष्यंत दवे ने कहा कि चारो जज इस मामले में केवल गवाह हैं और सुप्रीम कोर्ट के नियमों के तहत उन्हें अपना पक्ष शपथपत्र के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए और उनसे पूछताछ भी होनी चाहिए। लेकिन मुद्दा यह है कि सैकड़ों अनुत्तरित सवालों और तमाम परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के बावजूद इस मामले की जांच क्यों नहीं होनी चाहिए और सरकार (जिसके बड़े लोग अभियुक्त हैं) के कहने पर क्यों स्वीकार कर लिया जाना चाहिए।  

         इस तरह, साफ है कि मामला उतना सीधा नहीं है जितना बताया जा रहा है। जज लोया की मौत के बाद दो और संदिग्ध मौतें इसकी गंभीरता बताती हैं। दूसरे महाराष्ट्र सरकार ने जांच नहीं कराने के लिए जो खर्च किया और वकील को फीस दी उतने में तो जांच हो जाती और शंकाएं दूर हो जातीं आरोप नहीं लगते – फिर जांच से क्यों बचना।

       _अगर मामला राजनीतिक है तो कड़ियां जोड़ लीजिए – हवा-हवाई तो बिल्कुल नहीं है और मामला राजनीतिक होने से अपराध कम नहीं होता है। दूसरी ओर, नेशनल हेराल्ड का मामला जो भी हो, सोनिया गांधी ने खुद से तो उसपर कब्जा नहीं किया होगा। सही या गलत कांग्रेस पार्टी ने उन्हें दिया है तो पूछताछ देने वाले से होनी चाहिए या लेने वाले से?_

     {चेतना विकास मिशन)

Ramswaroop Mantri

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