सुसंस्कृति परिहार
– एक नन्हें से केंद्र शासित लक्ष द्वीप पर भाजपा ने सुनियोजित तरीके से पहली बार गुजरात के पूर्व गृहमंत्री प्रफुल्ल पटेल को प्रशासक नियुक्त किया तो साफ़ लक्ष्य था यहां की मिली-जुली संस्कृति को भगवा रंग में रंगकर, वहां की ज़मीन को विकास के नाम पर कारपोरेट को सौपना।आपको याद होगा इसके लिए भारत सरकार पिछले वर्षों में एक नया लेंड एक्वीजीशन बिल लायी थी जिसके अनुसार सरकार किसी की भी जमीन को सरकारी क़ाम जैसे सड़क-कॉरिडोर वगैरह के लिए छीन सकती है। अब चाहे मालिक राजी हो या न। फिर कहा गया की यदि प्रोजेक्ट के 70% लोग राजी हो गए तो बाकी 30% की मर्जी के बिना भी छीन ली जाएगी। इस बिल का विरोध हुआ और सरकार को इसे वापस लेना पढ़ा। लेकिन लक्षद्वीप में उससे घटिया कानून लागू कर दिया गया जिस बिल (नियम) को भारत में लागू नहीं किया गया उससे ज्यादा तानाशाही वाला नियम लक्षद्वीप के लोगों पर क्यों लागू किया गया है। पटेल ने यहाँ पहुँच कर विकास के नाम पर नया नियम LDAR लागू किया है जिसके द्वारा सरकार किसी भी आदमी की जमीन छीन सकती है।
विदित हो लक्षद्वीप में 96 फीसदी लोग मुसलमान रहते हैं। बताते हैं, पहले यहां बौद्ध धर्म प्रचलित था, लेकिन बाद में ज्यादातर लोगों ने (सुन्नी) इस्लाम अपना लिया। यहां हिंदुओं की आबादी मात्र तीन फीसदी से भी कम है। इसीलिए यहां गुजरात दंगा-फसाद में माहिर और मुस्लिम समुदाय से नफरत रखने वाला प्रशासक जानबूझकर भेजा गया।
यहां लक्षद्वीप विकास प्राधिकरण नियमन एक्ट के साथ लक्षद्वीप असामाजिक गतिविधि निरोधक एक्ट लागू भी किया गया है। इन कानूनों को लेकर लक्षद्वीप वासियों में कई आशंकाएं हैं। उनमें पहला तो जमीने हड़पने और गोमांस प्रतिबंधित करने को लेकर है। कहा जा रहा है कि जब भाजपा शासित राज्य गोवा में बीफ पर रोक नहीं है तो लक्षद्वीप में गोमांस व गोहत्या विरोधी कानून क्यों लागू किया जा रहा है? दूसरे, प्रशासक पटेल ने लक्षद्वीप का समुद्री परिवहन सम्बन्ध केरल की जगह कर्नाटक से जोड़ने की पहल की है। कोचीन, बेपोर के बजाय अब सब कारोबार कर्नाटक के मंगलूरू बंदरगाह से होगा। इसका राजनीतिक एंगल यह है कि केरल में वाम मोर्चे की सरकार है जबकि कर्नाटक में भाजपा की। तीसरा है, द्वीप के कई अंचलों से शराब पर प्रतिबंध हटाना ताकि सभी को शराब सुलभ हो सके। बताया जाता है कि अभी इस द्वीप समूह के केवल बंगरम द्वीप में ही शराब मिलती है, लेकिन वहां कोई स्थानीय आबादी नहीं है। चौथा, इस द्वीप समूह में आपराधिक गतिविधियां रोकने के लिए गुंडा एक्ट लागू करना है। जबकि नए कानून के मुताबिक पुलिस किसी को भी बिना कारण बताए 1 साल के लिए बंद कर सकती है। पांचवां, प्रदेश में दो बच्चों से ज्यादा वालों को पंचायत चुनाव की उम्मीदवारी से बाहर करना है। छठा, क्षेत्र के स्कूलों के मिड डे मील और होस्टल मेस में मांसाहारी व्यंजनो पर प्रतिबंध लगाना है, जिसमें यहां के माहौल को बिगाड़ने की मंशा साफ दृष्टिगोचर होती है।
इसीलिए लक्षद्वीप सांसद व एनसीपी नेता मोहम्मद फैजल ने प्रशासक के कदमों का विरोध करते हुए कहा है कि नए अधिनियम के तहत वह यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि मुझे क्या खाना चाहिए और क्या नहीं? वो मेरा संवैधानिक अधिकार छीन लेना चाहते हैं।कुल मिलाकर द्वीप को अशांत करने की पूरी तैयारी की जा रही है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केरल विधानसभा ने लक्षद्वीप के लोगों के साथ एकजुटता जताते हुए एक प्रस्ताव सोमवार को सर्वसम्मति से पारित किया, जिसमें द्वीप के प्रशासक प्रफुल्ल पटेल को वापस बुलाए जाने की मांग की गई है और केंद्र से तत्काल हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया गया है, ताकि द्वीप के लोगों के जीवन और उनकी आजीविका की रक्षा हो सके। उन्होंने केरल और लक्षद्वीप के लोगों के बीच ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संबंधों को याद किया और वहां स्वाभाविक लोकतंत्र को नष्ट करने की कथित कोशिश के लिए केंद्र की निंदा की। उन्होंने कहा कि लक्षद्वीप का भविष्य चिंता का विषय है और इसकी अनूठी एवं स्थानीय जीवनशैली को कमजोर करना अस्वीकार्य है।
इसी के साथ केरल देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है, जिसने केंद्र शासित प्रदेश में हुए हालिया घटनाक्रमों को लेकर लोगों का समर्थन करते हुए प्रस्ताव पारित किया है। अरब सागर में स्थित लक्षद्वीप में पटेल के हालिया कदमों एवं प्रशासनिक सुधारों का स्थानीय लोग पिछले कुछ दिन से विरोध कर रहे हैं।
मुख्यमंत्री ने अपील की कि संवैधानिक मूल्यों को बरकरार रखने का समर्थन करने वालों को लक्षद्वीप के प्रशासक के कदमों का कड़ा विरोध करना चाहिए।
अपने राजनीतिक मतभेदों को दरकिनार करते हुए, सत्तारूढ़ माकपा के नेतृत्व वाले वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) और कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) के सदस्यों ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव का समर्थन किया। यूडीएफ ने इसमें कुछ संशोधनों का सुझाव दिया।
प्रस्ताव में कहा गया है कि लक्षद्वीप में स्थानीय जीवन शैली एवं पारिस्थतिकी तंत्र नष्ट करके ‘भगवा एजेंडे’ और कॉरपोरेट हितों को थोपने की कोशिश की जा रही है।
इसमें आरोप लगाया गया है कि सुधार के नाम पर शुरू किए गए एजेंडे का क्रियान्वयन नारियल के पेड़ों को भगवा रंग से रंगकर शुरू किया गया और अब यह इस स्तर तक बढ़ गया है कि द्वीपवासियों के पारंपरिक आवास, जीवन और प्राकृतिक संबंधों को नुकसान पहुंच रहा है।
प्रस्ताव में कहा गया है कि द्वीप में अपराध की दर असाधारण रूप से कम है, इसके बावजूद गुंडा कानून लागू करने के लिए कदम उठाए गए।
प्रस्ताव में कहा गया है कि प्राधिकारी मछली पकड़ने जैसे आजीविका के पारंपरिक जरिए को नष्ट करना चाहते हैं।
इसमें आरोप लगाया गया है कि क्षेत्र के लोगों के प्राकृतिक आहार का हिस्सा बीफ को बाहर करने के प्रयास के जरिए गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने के संघ परिवार के एजेंडे को पिछले दरवाजे से लागू किया जा रहा है।
प्रस्ताव में कहा गया है कि प्रशासक ने केंद्रशासित प्रदेश के लोगों के स्थानीय जीवन और संस्कृति को धीरे-धीरे नष्ट करने का बीड़ा उठाया है।
विजयन ने प्रशासक को विभिन्न सरकारी विभागों के मामलों में हस्तक्षेप करने का विशेष अधिकार देने वाले केंद्र के कानून की निंदा की।
उन्होंने कहा कि यह अपनी पसंद के अधिकारी नियुक्त करके द्वीप के स्वाभाविक लोकतंत्र को कमजोर करने के समान है।
मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया, ‘‘लक्षद्वीप में हालिया घटनाक्रम को संघ परिवार के एजेंडे की प्रयोगशाला के रूप में देखा जाना चाहिए। वे देश के लोगों की संस्कृति, भाषा, जीवनशैली और खानपान संबंधी आदतों को अपनी विचारधारा के अनुसार बदलने की कोशिश कर रहे हैं।’’
उन्होंने कहा कि केंद्रशासित प्रदेश के लोगों को ‘‘कॉरपोरेट हितों और हिंदुवादी राजनीति’’ का गुलाम बनाने की कोशिश के खिलाफ कड़ी आवाज उठाई जानी चाहिए।
विजयन ने कहा कि यह सुनिश्चित करना केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है कि केंद्र शासित प्रदेश और उसके मूल निवासियों की विशिष्टता को संरक्षित रखा जाए। उन्होंने कहा कि प्रशासक इसे चुनौती दे रहे हैं और उन्हें उनकी जिम्मेदारियों से मुक्त किया जाना चाहिए।
विपक्षी कांग्रेस के नेता वी डी सतीशन ने प्रस्ताव का समर्थन किया और कहा कि सुधारों की आड़ में पटेल द्वारा लागू किए जा रहे एजेंडे को अरब सागर में फेंक दिया जाना चाहिए। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र कर लिख कर कहा कि प्रशासक द्वारा लाए गए ‘लक्षद्वीप विकास प्राधिकरण नियमन अधिनियम’ का मसौदा इस बात का सबूत है कि लक्षद्वीप की पारिस्थितिकीय शुचिता को कमतर करने का प्रयास किया जा रहा है। कांग्रेस महासचिव के सी वेणुगोपाल ने भी इस मामले को लेकर राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखी है। केरल के मुख्यमंत्री ने कहा, ‘लोगों के हितों को चुनौती देने वाले प्रशासक को हटाया जाना चाहिए और केंद्र को लक्षद्वीप के लोगों के जीवन और आजीविका की रक्षा के लिए तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए’.
इस बीच, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के सुरेंद्रन ने केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त प्रशासक के खिलाफ विधानसभा द्वारा पारित प्रस्ताव की आलोचना की और कहा कि उसके पास ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं है।
लगता है बंगाल की तरह यहां भी एक मोर्चा खोलकर केंद्र सरकार हिंदुत्व वादियों को ये संदेश देना चाहती है कि वह एक विशेष कौम के समर्थकों के खिलाफ सजग है। यह संदेश उ.प्र.के लिए भी हो सकता है जहां चुनाव में जीतने की जद्दोजहद जारी है। गुजरात की तरह एक विशेष कौम को यह इशारा भी हो सकता है। बहरहाल दांव-पेंच जारी है पर यह तय है कि जनता के विरोध को यदि कुचला जाता है तो एक छोटे द्वीप से उठी यह चिंगारी देश में विकराल रूप ले सकती है। वैसे भी केंद्र का हाल बेहाल है।





