अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

 भारत माता के असली बेटे विद्रोही कवि काजी नजरूल इस्लाम 

Share

मुनेश त्यागी 

     काजी नजरुल इस्लाम भारत के महान कवि, लेखक, साहित्यकार, नाटककार, संगीतकार और क्रांतिकारी कवि थे। उनका जन्म 24 मई 1899 को पुरुलिया बंगाल में हुआ था। वे एक बहुत ही गरीब परिवार से संबंधित थे, जिस कारण उन्हें मजहबी शिक्षा दिलाने के लिए मदरसे में दाखिल कराया गया। अपनी मेहनत से उन्होंने पढ़ना लिखना सीखा और बाद में वे बंगला के महान क्रांतिकारी कवि बने। वे इन सभी विधाओं में महान और पारंगत थे। 

     उन्होंने 3000 से ज्यादा कविताएं लिखी हैं और वे एक महान गायक थे। उन्होंने शिव, कृष्ण और सरस्वती पर भी अनेक गीतों की रचना की है। उनकी कविताओं और नाटकों के विषय मनुष्य द्वारा मनुष्य पर अत्याचार, सामाजिक अनाचार और शोषण के विरुद्ध प्रतिवाद से संबंधित थे। वे पितृसत्तात्मक सोच और मानसिकता के धुर विरोधी थे। वे इस औरत विरोधी व्यवस्था का खात्मा चाहते थे और वे महिलाओं की सब समस्याओं का खात्मा और विनाश चाहते थे। उन्होंने महिलाओं के लिए बहुत कुछ लिखा है जिसे आज आगे बढ़ाने की और महिलाओं की समस्याओं को दूर करने की जरूरत है।

     उनकी पत्नी प्रमिला देवी थीं, जिस पर हिंदू मुसलमानों में विवाद हो गया। काजी की पत्नी को लेकर हिंदु और मुसलमानों में काफी विवाद हो गया। वे लोग बोले, इसे हिंदू बनाओ, इसे मुसलमान बनाओ। इस मांग का काजी नजरुल इस्लाम ने जमकर विरोध किया और हिंदुओं और मुसलमानों को ऐसा ना करने से मना किया, मगर हिंदू और मुसलमान यह सब सुनकर ऐसा करने को तैयार नहीं थे, इस पर काजी नज़रुल इस्लाम ने क्रोधित होकर कहा,,,, “सब के सब दफा हो जाओ” और यह कहकर उन्होंने उन सारे हिन्दूओं और मुसलमानों को अपने घर से बाहर निकाल दिया।

     इस क्रांतिकारी, विद्रोही और देशभक्त शख्सियत को इतिहास ने भुला दिया है। हमारे देश की और बांग्लादेश की जनविरोधी और क्रांतिकारिता विरोधी, सांप्रदायिक ताकतों ने काजी नज़रुल इस्लाम को भुला दिया है। मगर हमारे देश की और बांग्लादेश की क्रांतिकारी और वामपंथी ताकतें उनको आज भी याद करती हैं। उनके गीतों को गाती हैं, उनके नाटकों का मंचन करती हैं और उन्हें वहां पर आज भी एक क्रांतिकारी कवि की भूमिका में याद किया जाता है। काजी नजरूल इस्लाम पश्चिमी बंगाल में आज भी एक क्रांतिकारी और विद्रोही कवि के रूप में जाने जाते हैं। वहां की जनता उन्हें इसी रूप में याद करती है।

     वे संपादक, पत्रकार, गायक और महान संगीतकार थे। परिवार में गरीबी की वजह से उन्होंने चाय बेची, मस्जिदों में अजान दी, मगर इसके चलते उन्होंने पढ़ना लिखना बंद नहीं किया। वे संस्कृत, अरबी और फारसी के मुख्य रूप से जानकार थे। उन्होंने भारतीय शास्त्रों में पुराण पढ़ें, युधिष्ठिर और कर्ण आदि को पढ़ा। गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर से वे काफी प्रभावित थे। वे शास्त्रीय संगीत में पारंगत थे। 

   वे अपनी जीविका चलाने के लिए और अपने परिवार को पालने के लिए फौज में भर्ती हुए। यहां उन्होंने कविता और कहानियां लिखना जारी रखा। वे औरतों की समस्याओं से काफी परेशान रहते थे और औरतों की समस्याओं पर उनकी कलम जमकर चली। उन्होंने एक रचना “विद्रोही” लिखी जो एक क्रांतिकारी कविता थी। इसके बाद उन्हें, पूरी दुनिया में “विद्रोही” के नाम से जाना जाने लगा और वे इसी नाम से विख्यात हो गए।

      उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दी, भारत की आजादी की मांग की और अंग्रेजों की गुलामी की मुखालफत की। यहीं से वे अंग्रेजों की नजरों में खटकने लगे और अपनी रचनाओं के विद्रोही तेवर के कारण अंग्रेजों ने उन्हें जेल भेज दिया। यहां वे जेल में राजनीतिक बंदियों के लिए जेल सुधार को लेकर 40 दिन तक जेल में भूख हड़ताल पर रहे और अपनी मांगों को मनवाकर ही उन्होंने अपनी भूख हड़ताल तोड़ी। उन्होंने खिलाफत आंदोलन का जमकर विरोध किया।

      उनकी किताबें प्रतिबंधित की गई, क्योंकि उनकी किताबों को लुटेरी साम्राज्यवादी अंग्रेज व्यवस्था पसंद नहीं करती थी। वह अपने लेखन में, अपनी कविताओं में, अपने नाटकों में समाजवादी और साम्यवादी विचारधारा की वकालत करते थे। उन्होंने आयरिश क्रांति और रूस की क्रांति का जोरदार और जमकर समर्थन किया और रूसी क्रांति के नारों को और वहां क्रांति द्वारा किसानों, मजदूरों, नौजवानों बुजुर्गों के लिए क्रांति के द्वारा किए गए और क्रांति द्वारा उठाए गए जनवादी, प्रगतिशील कदमों का जोरदार समर्थन किया।

     विद्रोही कवि काजी नजरुल इस्लाम में 1917 में स्थापित रूस की क्रांति का समर्थन किया और रुसी क्रांतिकारी द्वारा जो महत्वपूर्ण काम किए गए थे जैसे सबको रोटी कपड़ा मकान शिक्षा स्वास्थ्य रोजगार, सबको आधुनिक मुफ्त शिक्षा, सबको मुफ्त इलाज, सारी जमीन का राष्ट्रीयकरण, सारी जनता के बीच से गरीबी का खात्मा और विनाश, पूंजीपतियों और सामंतों की सरकार के स्थान पर मजदूरों किसानों और मेहनतकशों की सरकार आदि नीतियों का उन्होंने जमकर समर्थन किया। रुसी क्रांति ने सारी जनता को देश के लिए और सारे देश को सारी जनता के लिए विचार करना और जीना मरना सिखाया। काजी नजरुल इस्लाम रूसी क्रांति के इन अद्भुत कारनामों के दिली मुरीद हो गए थे।

     वे हिंदी संस्कृति और सभ्यता में गहन और विस्तृत जानकारी और विश्वास रखते थे। उन्होंने अपने बच्चों के नाम कृष्ण और सव्यसाची  रखे। उन्होंने सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर जनता की समस्याओं का समाधान करने का जोरदार प्रतिवाद किया। जनता की समस्याओं को दूर करने की कोशिश की और अपनी रचनाओं में इन्हें दूर करने का आह्वान किया। उन्होंने आठ सौ से ज्यादा गीत लिखे और गीत गाए। उन्होंने नाटकों में नारद की भूमिका भी की। 1972  में अपने जीवन के अंतिम दिनों में बांग्लादेश सरकार के आमंत्रण पर, वे बांग्लादेश चले गए थे जहां पर उन्हें बांग्लादेश का राष्ट्रीय कवि घोषित किया गया।

     वे एक अदाकार, रचनाकार, कलाकार और नाटककार थे। भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री की उपाधि से नवाजा। अपने जीवन के अंत काल में मानसिक रूप से पीड़ित हो गए। यहां पर बड़े अचंभे की बात है कि लोगों ने सामूहिक रूप से चंदा करके उनके बीमारी के खर्च को उठाया और यहीं पर बड़ी अचंभे की बात है कि इन मदद करने वाले लोगों में श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी शामिल थे। 

    वो कितने बड़े कलाकार थे उसे हम उनकी इस रचना से देख सकते हैं। वे कहते हैं कि ,,,

“मैं हिंदू और मुसलमानों को बर्दाश्त कर सकता हूं लेकिन चोटी वालों और दाढ़ी वालों को नहीं। चोटी हिंदुवादी नहीं है दाढ़ी इस्लाम नहीं है। चोटी पंडित की निशानी है, दाढ़ी मुला की  पहचान है। ये जो एक दूसरे के बाल नोचते जा रहे हैं, यह कुछ बालों की मेहरबानी हैं जो इन चोटियों और दाढियों में लगे हैं।”

     वे कहते हैं ,,,,”यह जो लड़ाई है वह पंडित और मुल्ला के बीच की है, हिंदू और मुसलमान के बीच कि नहीं। किसी पैगम्बर ने नहीं कहा कि “मैं सिर्फ मुसलमानों के लिए आया हूं। मैं सारी मानवता के लिए आया हूं, उजाले की तरह।” लेकिन कृष्ण भक्त कहते हैं कि “कृष्ण हिंदुओं का है, मुहम्मद सिर्फ मुसलमानों के लिए है, इसी तरह ईसाई ईसा मसीह पर हक जताते हैं।” 

    उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि कृष्ण, मोहम्मद और ईसा मसीह को सब ने अपनी-अपनी संपत्ति बना दिया है, यही सारी समस्याओं की जड़ है। लोग उजाले के लिए शोर नहीं मचा रहे, बल्कि अपने अपने मालिकाना हक के लिए लड़ रहे हैं।” काजी नजरुल इस्लाम मानवता के सच्चे हितैसी हैं। ऐसे महान विचारक धरती पर विरले ही जन्म लेते हैं। 

    उनके जीवन को और उनके कार्यों को देख कर और पढ़कर लगता है कि वे भारत माता के महान सपूत थे, भारत माता के असली लाल थे। वह गंगा जमुनी तहजीब की असली उत्पाद थे। उन्होंने गंगा जमुनी तहजीब को जिया। हिंदू और मुसलमान में भेद नहीं माना। मुसलमान पैगम्बरों और हिंदू देवी देवताओं में भेद नहीं माना। उनको देखकर लगता है कि वह तो हिंदू और मुसलमान दोनों के मिले जुले और असली प्रतिनिधि थे।

     उनकी जीवनी और कार्यों को देख और पढ़ कर हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि वे भारतीय संस्कृति के असली प्रतिनिधि हैं। उन्होंने कभी भी हिंदू या मुसलमान में भेद नहीं माना। वे हिंदू और मुसलमान दोनों को के प्रतिनिधि थे। वे हिंदू देवी देवताओं और मुसलमानों के मुहम्मद साहब में दोनों में विश्वास करते थे। हमारा मानना है की उन्हें भारत के हर छात्र छात्राओं को पढ़ना चाहिए और उन्हें भारत के सभी स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए ताकि भारत के छात्र और छात्राएं उनके अमूल्य योगदान को याद कर सकें और अपनी जिंदगी में उतार सके और ढाल सकें।

     वो कितने महान थे और भारतीय सभ्यता और संस्कृति को कितना पसंद करते थे और हिंदू मुस्लिम एकता की भावना और गंगा जमुनी तहजीब उनके अंदर कितने कूट-कूट कर भरी थी। वे हिंदू मुस्लिम नही, भारत माता के असली बेटे थे। उनकी इस महान रचना से ही उसका असली परिचय मिल जाता है,,,,,,

गाता हूं सभ्यता का गान,

जहां आकर एक हो गए सब बाधा व्यवधान,

जहां मिल रहे हैं हिंदू बौद्ध मुस्लिम इसाई 

गाता हूं उस सभ्यता का गान।

     भारत माता के असली लाल और असली बेटे काजी नजरुल इस्लाम को शत शत नमन वंदन अभिनंदन और क्रांतिकारी सलाम।

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें