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हिन्दू~इतर धर्मों में पुनर्जन्म

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डॉ. विकास मानव   

  _बौद्ध, पारसी लोग एवं युनानी, रोमन, चीनी तथा मिश्री सभ्यताएँ सभी पुनर्जन्म में विश्वास रखते हैं, परन्तु वर्तमान ईसाई, इस्लाम तथा यहूदी धर्म के अधिकांश अनुयायियों का पुर्नजन्म में विश्वास नहीं है। विश्वास नहीं होना, विज्ञान नहीं -- विकलांगता है. पुनर्जन्म को अनगिनत घटनाएं सावित कर चुकी हैं. हमारे मानने या नहीं मानने से सच को कोई फ़र्क नहीं पड़ता._

कई पाश्चात्य विद्वानों का मत है कि द होली बाईबल, कुरान शरीफ़ एवं यहूदी ग्रन्थों में भी पुनर्जन्म के विवरण मिलते हैं। उनके विचार यथा स्थान निम्न पंक्तियों में शब्दशः (अनुवादित) उद्धृत किये जाते हैं :

युनानी सभ्यता :
“हम में से जो यह सोचते हैं कि मृत्यु बुरी है, ग़लती पर हैं। मृत्यु या स्वप्न रहित निद्रा है — जो स्पष्टतः अच्छी है , या आत्मा किसी दूसरे संसार में जाती है। मुझे मरने और पुनः मरने दो। परलोक में प्रश्न पूछने पर मृत्युदंड नहीं मिलता, निश्चित तौर पर नहीं। इसके अतिरिक्त, वहां लोग यहां से अधिक आनन्द में रहने के बावजूद, अमर होंगे।….. अब प्रस्थान की घड़ी आ गई है — मेरे मरने की, आपके जीवित रहने की। कौन सी अच्छी है, केवल ईश्वर जानता है।

  • सुकरात का न्यायाधीशों को सम्बोधन
    (हिस्ट्री ऑफ़ वेस्टर्न फ़िलास्फ़ी पृष्ठ 107 : बर्टरैंड रस्सल)

रोमन सभ्यता :
“मुझे बताते हुए शर्म आ रही है , परन्तु फिर भी बताता हूँ : मेरे शरीर पर कांटे जैसे चुभने वाले बाल उगे थे ; मैं बोल नहीं सकता था, शब्दों की बजाए घुराने की आवाज़े निकली थीं ;
मैंने अनुभव किया कि मेरा मुख कठोर हो गया है।
नाक की बजाए , मेरा थूथन था ;
और मेरा मुख भूमि की ओर झुका हुआ था ; मेरी गर्दन मांस – पेशियों से फूली हुई थी ; और मेरे हाथ , जो पात्र को उठाकर होंठों तक ले जाते हैं, भूमि पर पदचिन्ह बनाते थे। “
– सुविख्यात रोमन कवि, ओविड
केस फ़ाॅर रिइनकार्नेशन ( पृष्ठ 140 से उद्धृत ) : जो फ़िशर

मिश्री सभ्यता :
मिश्र के सुविख्यात पिरामिडों में राजाओं तथा विशिष्ट व्यक्तियों के शव ( मम्मी ) सुरक्षित रखे जाते थे। उन शवों के साथ खाद्य सामग्री तथा सुख सुविधा का समान भी रखा जाता था। उनका विश्वास था कि वे पुनर्जन्म लेंगे।
“यूनानी इतिहासकार हिरोडोटस, जो ईसा पूर्व 5वीं शताब्दी में हुए, ने मिश्री लोगों को पुनर्जन्म में विश्वास करने वाले पहले लोग माना है, जबकि स्वयं मिश्री लोगों ने अभिव्यक्त किया है कि यह ज्ञान अज्ञात काल में पूर्व से आया है। उनके अभिलेख बताते हैं कि किस प्रकार उनका देवपुरुष ओसिरिस ( Osiris) जो इस गुह्य ज्ञान की प्रतिमूर्ति है, भारत से मिश्र में चित्रित बैल पर पहुँचा।”

  • केस फ़ाॅर रिइनकार्नेशन (पृष्ठ 89 से उद्धृत ) : जो फ़िशर

चीनी सभ्यता :
“जन्म आरम्भ नहीं है ; मृत्यु अन्त नहीं है।”
— चुआँग जू
चुआँग जू , गुह्य ज्ञान के प्रवर्तक ताओ के अनुयायी, जो ईसापूर्व चतुर्थ शताब्दी में हुए, ने साकारात्मक प्रक्रिया को बल दिया है, यह कह कर :
“मानव शरीर को प्राप्त करना निस्संदेह सदा आह्लाद का विषय होना चाहिए। तथा तदुपरान्त , असंख्य जन्म ले कर , केवल अनन्त के साक्षात्कार के लिए अग्रसर होना, वह अतुल्य आनन्द अवर्णनीय है !”
( केस फ़ाॅर रिइनकार्नेशन पृष्ठ 19 : जो फ़िशर )
“आधुनिक ताओ मत की अवधारणा है कि मृत्यु के पश्चात आत्माएं जीवित रहती हैं और आत्मा दूसरे शरीर में स्थानांतरण कर लेती है। किसी जीव का कोई “अन्त ” या ” आरम्भ ” नहीं देखा गया। बल्कि , ताओ के अनुयायी पुनर्जन्म व्यवस्था को परम सत्ता से मिलन की शाश्वत प्रक्रिया मानते हैं।……मानव आत्माएँ पशु शरीर धारण कर सकती हैं और पशुओं की आत्माएं मानव शरीर धारण कर सकती हैं।””
(गूगल)

यहूदी धर्म :
“हिब्रू भाषा के गिलगुल शब्द का अर्थ है स्थानांतरण, आत्मा का मृत्यु के उपरान्त दूसरे शरीर में गमन।
इनके धर्म ग्रंथ तोराह में गिलगुल का स्पष्ट वर्णन नहीं है, यदि इसे रूपक अर्थ में न लिया जाए। तथाहि, इसका वर्णन कबालाह में है जो गुह्य ज्ञान लेखकों की रहस्यमयी शिक्षाओं का संग्रह है, जिसे मध्य काल में रबीयों ने संकलित किया।
“कबालाह के अनुसार, पूर्वज यहूदी महान् पैगंबरों के पुनर्जन्म में विश्वास रखते थे :
एडम डेविड बने जिन्होंने मसीहा बनना था। ज़ोहार ( प्रभा की पुस्तक) जिसका प्रकाशन 1280 ईस्वी में हुआ , जिसमें प्रथम ईस्वी शताब्दी की शिक्षाएं संग्रहीत है, ने गिलगुल/ पुनर्जन्म का सिद्धान्त सभी आत्माओं के लिए घोषित कर दिया : ” सभी आत्माएं पुनर्जन्म सिद्धान्त के अन्तर्गत आती हैं। “
कुछ कबालाह के अनुयायियों ने यह मत प्रसारित कर दिया कि मानव पशु, पौधे यहां तक कि शिला के रूप में जन्म ले सकते हैं। “
उन्नीसवीं शताब्दी में , संशयवादी यहूदयों में कबालाह अप्रचलित हो गईं और गिलगुल की शिक्षाएं का महत्त्व समाप्त हो गया। बीसवीं शताब्दी में गिलगुल यहूदी धर्म की तीन शाखाएं — रिफॉर्म, कंज़रवेटिव और ऑर्थोडॉक्स में नहीं पढ़ाई गई, परन्तु हिसिडिक शाखा में पढ़ाई गई।
— एन्साईक्लोपीडया ऑफ़ मिस्टिकल एंड पैरानार्मल एक्सपीरियंस ( पृष्ठ 502-3 ): रोज़मेरी ऐलन गिल्ली

 यहूदी (Judaism) गुह्यज्ञान का स्रोत कबाला (Kabala) है जिसमें पुर्नजन्म या ‘गिलगुल’ (Gilgul) जो पुनरावृत्ति के लिये हिब्रु शब्द है, का उल्लेख मिलता है। यह तभी होता है जब कुछ उन्नत आत्माएँ क्रमिक रूप में पवित्र हो जाती हैं और अन्य शुद्ध आत्माओं से जा मिलती हैं। 
  _कबाला साहित्य की ‘ज़ोहर’ ( Zohar ) नामक पुस्तक जो पहली ईसवी शदाब्दी की है, में लिखा है : आत्माओं को हरहाल आदि  स्रोत (Absolute) में वापस जाना है, जहाँ से वे आई हैं। इसके लिये उन्हें पूर्णता विकसित करनी होगी जिसका बीज उनमें निहित है; यदि वे एक जीवन में यह नहीं कर पाते, उन्हें दूसरा, तीसरा एवं अन्य कई जन्म लेने होंगे जब तक वे उस स्थिति को प्राप्त नहीं करते जो कि ईश्वर-मिलन के लिये आवश्यक है।_

— द केस फॉर रीइनकारनेशन (पृष्ठ 90): जो फिशर

यहूदी धर्मग्रंथ ज़ोहर के ये शब्द गीता (6.45) के निम्न श्लोक की पुनरावृत्ति करते प्रतीत होते हैं :
अनेक- जन्म -संसिद्धस्ततो याति परां गतिम्।
अनेक जन्मों में अपने आपको पवित्र करता हुआ, परम गति को प्राप्त होता है।)
………………….
पादपाठ :
1) आत्मा का पशु, पक्षी, पौधे आदि के रूप मे जन्म लेना वैदिक मान्यताओं के अनुरूप है, परन्तु शिला रूप में जन्म अवैदिक है।
2) उपरोक्त सभी अनुवादित उद् धरणों के मूलरूप इस पोस्ट के आंग्ल भाषान्तर पोस्ट में उपलब्ध हैं।
……………….
Its English version is available on our Page :
The Vedic Trinity
The Doctrine of Reincarnation of Soul
72) Proofs of Reincarnation
( Continued )
xi) References of Reincarnation of Soul in Non – Hindu Religions. (Part 2 )
(चेतना विकास मिशन)

Ramswaroop Mantri

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