सुधा सिंह
सातवीं शताब्दी की शुरूआत में राजा महेंद्र वर्मा ने एक संस्कृत नाटक लिखा था, मत्तविलास प्रहसन। उस समय भारत में पंथ या धर्म के नाम पर बौद्ध, वैष्णव, कपालिका शैव ,पाशुपत शैव और जैन सम्प्रदाय प्रमुख थे। उनके सम्प्रदायों में चल रहे आडम्बरो पर तीखा हास्य व्यंग्य इस नाटक द्वारा दर्शाया गया था।
नशे में धुत कपालिका युगल को लगता है कि उसका भोजन भिक्षा पात्र जो मानव खोपड़ी का बना है, बौद्ध भिक्षु ने चुरा लिया है। इन सभी मे खूब बहस होती है, जो धीरे धीरे एक दूसरे के धर्म पर जा पहुँचती है।
अपने भिक्षा पात्र के गायब होने का दोषी बौद्ध भिक्षु को मानते हुए उसपर कपालिका इल्जाम लगाते हैं कि वह चोर है, झूठा शराबी, मांसाहारी है, और हमेशा औरतों एक बारे में सोचता है।
भले ही उसका धर्म इसे मना करता है। और उसका पतित बौद्ध धर्म महाभारत और वेदांत से सब कुछ चुराकर बना है।
बौद्धों के साथ साथ दोनों कपालिका शैव जैनियों का भी मज़ाक उड़ाते हैं।
वहीं बौद्ध भिक्षु को पूरा विश्वास है कि पिटक ग्रन्थोंं की मूल प्रति में शराब और स्त्री समागम की अनुमति अवश्य रही होगी किन्तु बूढ़े बौद्धों ने युवा बौद्धों के विरुद्ध षड्यंत्र रचकर मूलप्रति छिपा दी।
वह उस मूल पिटक को खोजना चाहता है। या उनमें यह सब जोडऩा चाहता है।
बौद्ध भिक्षु इसी ख्याल में हमेशा मग्न रहता है।
एक दिन बौद्ध-मठ जाते हुए वह सोचता है-’अत्यंत दयालु भगवान बुद्ध ने महलों में निवास, सुन्दर सेज लगे पलंगों पर शयन, पहले प्रहर में भोजन, अपराह्म में मीठे रसों का पान, पाँचों सुगन्धों से युक्त ताम्बूल और रेशमी वस्त्रों का पहनना इत्यादि उपदेशों से भिक्षु-संघ पर कृपा करते हुए क्या स्त्री-सहवास और मदिरापान का विधान भी नहीं किया होगा? अवश्य किया होगा। अवश्य ही इन निरुत्साही तथा दुष्ट वृद्ध बौद्धोंं ने हम नवयुवकों से डाह कर पिटक-ग्रन्थों में स्त्री-सहवास और सुरापान के विधान भी नहीं किया होगा? अवश्य किया होगा। अवश्य ही इन निरुत्साही तथा दुष्ट वृद्ध बौद्धोंं ने हम नवयुवकों से डाह कर पिटक-ग्रन्थों में स्त्री-सहवास और सुरापान के विधान को अलग कर दिया है।”
अंत में खूब मारधाड़ के बाद बौद्ध भिक्षु अपना भिक्षा पात्र कपालिका को दे देता है। तभी पता चलता है कि दरअसल एक कुत्ता कपालिका का मानव खोपड़ी वाला पात्र उठा ले गया था।
“धर्म” में मतभेद सदा से रहा है। जहां एक ही “धर्म” था उस जगह लोगों ने अनेक पंथ बना दिये। लड़ाई के लिए हिन्दू को न मुस्लिम की जरूरत है न मुस्लिम को हिन्दू की। लड़ाई हमारा मूल स्वभाव है। हम आदि मानव की संतानें हैं, उनकी हिंसा बर्बरता हमारे डी एन ए में है।
उस नस्ल के वंशज हैं जो सारे युद्धों में बचे रह गए, यानि हमारे पूर्वज फिटेस्ट टू सर्वाइव थे। लेकिन लड़ाई का बहाना चाहिए। “धर्म” यानि आत्मा और “राष्ट्र” यानि ज़मीन जितना सुंदर बहाना कहाँ मिलेगा?
धर्म मुर्दा खोपड़ी की तरह है, जो अब किसी काम का नहीं। जिंदा खोपड़ी जबतक है तबतक काम की होती है। मुर्दा खोपड़ी कीड़े मकोड़ो या कुत्तों के ही काम आती है।
मुर्दे के लिए लडाई करके एक दूसरे को मुर्दा बनाने की कवायद में धर्म और राष्ट्र सबसे आसान बहाना है। खास तौर पर जब धर्म व्यक्तिगत न रहकर भीड़ का हो जाये।





