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धार्मिक उन्माद का प्रतिरोध है कला साहित्य और शिक्षा

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हरनाम सिंह

देश में धर्म के नाम पर घ्रणा , नफरत और उन्माद ने मानवीय मूल्यों को ध्वस्त कर दिया है। धर्म और धार्मिक उन्माद दो भिन्न आस्थाएं हैं। धर्म जहां करुणा, प्रेम और अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णुता सिखाता है वहीं धर्म के नाम पर उन्माद की गतिविधियां हिंसा, नफरत, विध्वंस का कारण बनती है। इसलिए हर विवेकवान व्यक्ति को धार्मिक उन्माद का विरोध करना चाहिए। पर यह सब कैसे होगा ? यह बड़ा सवाल है।वह भी तब, जब उन्मादियों के समर्थन में राज्य सत्ता भी खड़ी हो।

विफल रही है धर्म के नाम की सत्ताएं

सोशल मीडिया पर हिंदू राष्ट्र निर्माण के नाम पर अनेक अनर्गल तथ्य हीन, तर्क हीन संविधान विरोधी सामग्री प्रसारित है। लोग बिना विचारे ऐसी सामग्री को आगे फॉरवर्ड कर देते हैं। इतिहास के सबक तो यही है कि धर्म के नाम पर बनी सत्ताएं कभी न तो स्थाई रह पाई है नहीं ऐसी कथित धार्मिक सत्ताओं ने अपनी जनता के कष्टों को दूर किया है। भारत धर्म के नाम पर विभाजन की त्रासदी को कभी भी नहीं भूल सकता है। हमारे देश के तत्कालीन नेता दुरंदेश थे, इसलिए उन्होंने भारत गणराज्य को सार्वभौम, धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित कर विकास का मार्ग चुना।

    वहीं दूसरी ओर धर्म के नाम पर बना पाकिस्तान 25 वर्षों में ही खंडित हो गया। पाकिस्तानी सेना ने अपने ही धर्मावलंबियों पर अत्याचार किए और उन्हें अलग देश बनाने के लिए विवश कर दिया। अफगानिस्तान मैं भी यही हुआ तालिबान ने अपने ही देश को धर्म के नाम पर बर्बाद कर दिया है। आज वह सारी दुनिया से कटा हुआ है। वहां की जनता विदेशी मदद पर जीवन यापन करने पर विवश है। इराक और ईरान का युद्ध हिंदू- मुसलमान की लड़ाई नहीं थी, फिर भी दोनों देश लड़े और बड़ी कीमत इराक को चुकानी पड़ी, दोनों देश समान धर्मी हैं। श्रीलंका में सिंहली- तमिल और बौद्ध- हिंदुओं के बीच सशस्त्र संघर्ष ने देश को कमजोर कर दिया। आज श्रीलंका भारी आर्थिक संकट से जूझ रहा है। धार्मिक उन्माद अपने ही देश और धर्म को बर्बाद कर देता है, यह इतिहास का सबक है। बशर्ते हम पढ़ना चाहें।

सत्ता प्राप्ति के लिए धर्म का उपयोग कैसे होता है यह पाकिस्तान की मांग करने वाले मोहम्मद अली जिन्ना के चरित्र से समझा जा सकता है। अपने जीवन काल में जिन्ना का इस्लाम से कोई खास वास्ता नहीं था। वह लगभग नास्तिक ही था। लेकिन ऐसे ही व्यक्ति ने धर्म का सहारा लेकर सत्ता प्राप्त कर ली।

 भारत में भी जब भी धर्म का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए होता है तब वह धर्मांधता में बदल जाता है। बाबरी मस्जिद विध्वंस के पूर्व लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा और पाकिस्तान निर्माण के पूर्व मोहम्मद अली जिन्ना के " डायरेक्ट एक्शन डे " के रूप में इसे समझा जा सकता है। दोनों घटनाओं का परिणाम हिंसा और कत्लेआम के रूप में सामने आया था। भारत में भी धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले अपने अनुयायियों को नए-नए प्रकल्प और नारे देकर अल्पसंख्यकों के विरुद्ध भड़काते रहते हैं। कभी लाउडस्पीकर के नाम पर तो कभी अजान, बुर्के के नाम पर। उनका नफरती प्रचार आज भी जारी है।

   लेकिन ऐसी उन्मादी भीड़ में किसी राजनेता की संतान आपने नहीं देखी होगी। वह तो किसी क्रिकेट संघ में पदाधिकारी नियुक्त होते हैं या चुनाव लड़ते हैं अथवा विदेशों में उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं। राम के नाम पर शस्त्र लेकर शोभायात्रा हो या मस्जिद के सामने हनुमान चालीसा का पाठ करना हो कहीं भी इन नेताओं की संताने, रिश्तेदार नहीं दिखाई देते। फिर यह कौन से युवा हैं जो नफरती प्रचार से प्रभावित होकर  धार्मिक राष्ट्र के दिवास्वप्न में खोकर अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं ? 

      *सामाजिक विकास में धर्म की भूमिका*

धर्म और धर्मांधता अलग-अलग सोच है। सभ्यताओं के विकास क्रम में मनुष्य ने अपने मानसिक और सामाजिक विकास के लिए जो कुछ नियम निर्धारित किए कालांतर में वे धर्म के रूप में जाने गए। धर्म ने अमानवीय और बर्बर समाज को मानवीय और करुणा जनक समाज निर्माण में बड़ी भूमिका निभाई है। इसलिए हमारे समय के श्रेष्ठ विचारक कार्ल मार्क्स ने धर्म को पीड़ित इंसान की करुण पुकार कहा है। धर्म ने मानव को नैतिक मूल्य दिए हैं। धर्म एक निजी आस्था है कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म का पालन करने के लिए स्वतंत्र है। अन्य किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि वह उसमें बाधा बने। लेकिन वर्तमान में हमारे देश में यही सब कुछ हो रहा है और समझदार लोग चुप हैं।

      धर्मांधता व्यक्ति के विवेक पर पर्दा डाल देती है। उसकी सोचने समझने की शक्ति को बाधित करती है इसीलिए धर्म को अंधता कहा गया है। धर्मांध व्यक्ति जिस समूह से नफरत करता है उसकी अच्छाइयों पर भी उसकी नजर नहीं जाती। उत्तर प्रदेश के डॉक्टर कफिल द्वारा रोगियों की  अनवरत सेवा की गई लेकिन वह मुसलमान था इसलिए उसे जेल में डाला गया प्रताड़ित किया गया। उसकी मानवीय सेवाओं को भुला दिया गया। धर्मांध शासकों ने उसकी सेवाओं को नजरअंदाज किया। सांप्रदायिकता इतनी विकसित हो गई है कि वह हर उस सच्चाई को स्वीकार करने से इंकार करती है जो अन्य धर्मावलंबियों द्वारा की जाती है। मध्य प्रदेश में भाजपा के एक बड़े नेता की पत्नी ने इस नफरत को महसूस किया, जब उसने एक मेडिकल स्टोर के मुस्लिम कर्मचारी की सराहना की।

मस्जिद और तुलसीदास

इतिहास बताता है कि गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना लोक भाषा अवधि में की थी। उस दौरान काशी के पंडितों द्वारा इस काव्य का इसलिए विरोध किया गया की तुलसीदास इसे संस्कृत में नहीं लिख रहे थे। वहां के श्रेष्ठी वर्ग से प्रताड़ित तुलसीदास ने अपने सुकून के लिए मस्जिद में सोने का जिक्र किया है। एक दोहे में तुलसीदास ने लिखा है-

तुलसी सरनाम गुलाम है राम को
जाकौं रचे सो कहे कुछ ओऊ
मांगि के खैबो, मसीत को सोईबो
लैबो को एक न दैबको दोऊ

तुलसीदास ने कभी नहीं सोचा होगा कि राम के कथित भक्त उनकी अमर रचना हनुमान चालीसा का पाठ उन्हीं मस्जिदों के सामने कर उनके ही आराम में खलल डालेंगे।

ध्यवर्ग का दोगलापन

देश का शिक्षित मध्यवर्ग व्हाट्सएप पर नफरती सामग्री फॉरवर्ड करता है, लेकिन वह अपनी संतानों को डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, आईटी प्रोफेशनल बनाना चाहता है। दरअसल वे चाहते हैं शोभा यात्रा, मस्जिदों के सामने हनुमान चालीसा का पाठ दूसरों के बच्चे करें। उनकी संताने अपना केरियर बनाएं। यही लोग धर्मांधता का विरोध करने वाले को धर्म विरोधी घोषित कर उनकी निंदा करते हैं। मध्यवर्ग का यही दोगलापन उसकी पहचान बन चुका है।

कला के पास है धर्मांधता का जवाब

हमारे शासकों के पास अल्प शिक्षित युवाओं के लिए नौकरी अथवा रोजगार की कोई योजना नहीं है। बेरोजगारों कि यह फौज शासक दल के राजनीतिक लक्ष्य पूर्ति में काम आ रही है। ऐसे गुमराह युवाओं को कला व सांस्कृतिक गतिविधियों से जोड़कर उन्हें रचनात्मक कार्यों में व्यस्त रखा जा सकता है। दूसरी ओर रोजगार, महंगाई, सस्ती शिक्षा की मांग को लेकर उन्हें संगठित करने, आंदोलन के माध्यम से भी उन्हें सांप्रदायिकता से दूर रखा जा सकता है। देश में गत वर्ष किसान आंदोलन जब तक जारी रहा तब तक देश में भाईचारा बना रहा। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में भी जब तक आजादी की लड़ाई चलती रही तब तक धर्मांधता सर नहीं उठा पाई। उन्माद का जवाब रचनात्मक गतिविधियों से दिया जा सकता है। जैसा इन दिनों देश के बड़े सांस्कृतिक संगठन भारतीय जन नाट्य संघ ( इप्टा ) द्वारा दिया जा रहा है। इप्टा द्वारा देश के पांच हिंदीभाषी राज्यों में ढाई आखर प्रेम यात्रा के माध्यम से प्रेम, सहिष्णुता आपसी सौहार्द का संदेश कलाओं के माध्यम से दिया जा रहा है । राजनीतिक दलों से ऐसे आयोजनों की अपेक्षा नहीं की जा सकती है ।

सोशल मीडिया के आगमन से पहले समाज में कविता, कहानियां, पुस्तकें ,वाचनालयों पुस्तकालयों में युवा व्यस्त रहते थे। विद्यालयों के वार्षिक आयोजनों में नाटक होते थे। प्रतिस्पर्धाएं होती थी। ऐसी गतिविधियां युवा वर्ग में भाईचारे का विस्तार करती थी।

    धार्मिक उन्माद बढ़ाना एक राजनीति है इसे समझने की जरूरत है माता-पिता अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा के साथ अच्छा मनुष्य और जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए भी प्रेरित करें, तभी देश में अमन चैन कायम रह पाएगा।

हरनाम सिंह

Ramswaroop Mantri

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