अग्नि आलोक
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धार्मिक झूठ और पाखंड : क्या आज भी हम अनपढ़, अपंगबुद्धि और जड़ हैं?

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      ~ नीलम ज्योति

   मंदिर में जाने के लिए गेट पर चप्पल जूते मोज़े चमड़े की बेल्ट सब उतारते हो. हाथ पैर धुलते हो. नोट (रूपये) क्या पवित्र हैं? ये तो सबसे गंदे और अशुद्ध हैं. जो पैसे तुम्हारे पास हैं, उन्हें तो वेश्या भी छू चुकी होती है और मुर्गा, बकरा, भैंस, गाय काटने वाले कसाई लोग भी. ये क्यों चढ़ाते हो देवी, देवता, भगवान को. और फिर क्या तुम्हारी मुद्रा (रूपये, डालर, रियाद वेगैरह) भगवान के लोक में चलती है? वहाँ कौन सी मुद्रा चलती है : सिर्फ़ तुम्हारे कर्म.

   अगर इतनी- सी भी सद्बुद्धि आ जाये तुमको, तो सबसे पहले सारे डपोरशंख तोदूँ पुजारी भागेंगे वहाँ से. कोई भी खेती-किसानी, मज़दूरी-नौकरी या व्यापार नहीं करके, दूसरों की कमाई से जीने वाले इन परजीवीयों को भी पता है की वहाँ कोई दैविक शक्ति नहीं है. उनके लिए दैवीय शक्ति सिर्फ़ तुम्हारे जेब का धन है.

   *अबे वो धर्म का धंधा करने वाले धूर्तों!*

        तुमने बोला बिना पंख के बंदर उड़ गया. हमने मान लिया. तुमने बोला बन्दर ने उड़कर आग के विशालतम गोले (सूर्य ) को निगल लिया हमने बोला हां ठीक है।

    तुमने बोला पृथ्वी गाय के सिंग पर टिकी है.  हमने बोला हां ठीक है.  तुमने बोला पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी है. हमने बोला हां ठीक है.

   तुमने बोला, ब्राम्हण ब्रम्हा के मुँह से निकला है, इसलिए श्रेष्ठ है. हमने कहा ठीक है. तुमने बोला, शुद्र ब्रम्हा के पैर से पैदा हुये है. हमने मान लिया.

    तुमनें बोला, नपुंसक दसरथ के पुत्र उनकी पटरानियों द्वारा फल खाने से, जनकपुत्री धरती के भीतर से और कौरव घी के डिब्बों से पैदा हो गए. हमनें यह भी मान लिया।

      तुमने बोला, हनुमान और कर्ण कान से पैदा हो गए.  हमनें यह भी मान लिया.  तुमने बोला, श्रृंगी ऋषि हिरनी से और हनुमान पुत्र मछली से पैदा हो गए. हमने यह भी मान लिया.

    तुमनें बोला, हिरण्याक्ष पृथ्वी को उठाकर समुद्र में घुस गया.  हमने यह भी मान लिया. तुमने बोला, विष्णू ने वराह (सुवर) का अवतार धारण कर पृथ्वी को हिरण्याक्ष से छुड़ा लिया.  हमने यह भी मान लिया.

    तुमने हत्यारे, लुटेरे, व्यभिचारी, धोखेबाज, बलात्कारी लोगो को भगवान-देवी-देवता बताया. हमने वह भी मान लिया.

   तुमने बंदरो से पत्थर तैराकर समुद्र में पूल बनवा दिया.  हमने वह भी मान लिया. तुमने जिस शेषनाग के फन पर पृथ्वी टिकी थी, उसी सांप को रस्सी बनाकर समुद्रमंथन करा दिया. पृथ्वी तब भी नहीं डूबी.  हमने वह भी मान लिया.

  तुमने एक बन्दर से सोने (धातु) की लंका (पूरा नगर) को जलवा दिया.  हमने वह भी मान लिया.

     तुमने बोला, यह पूरी दुनियाँ एक ऐसा ईश्वर चलाता है, जो खुद ब्राम्हणों के कहने पर चलता है.  हमने फिर भी मान लिया.

  तुमने बोला, यहां के पत्थर में भगवान है, मूर्ति पूजो. हम आजतक उसे भी मानते रहे.

    तुमने बोला, तुम ब्रम्हा के पैरों से पैदा हुये हो इसलिए तुम्हे कोई भी अधिकार नहीं हैं. हमसे वह भी मान लिया।

   ऐसे और भी हजारों, ऐसे तथ्य हैं जिन्हें तुमने हमें मानने पर मजबूर किया और हमने चाहे, न चाहे मान लिया।

*आखिर क्यों ?*

   क्योंकि, तुमने हमारे सोचने-समझने-जानने की ताकत (शिक्षा) तर्क, बुद्धि और विज्ञान छीनकर हमें अँधा बनाकर अपाहिज बना दिया था।

    आजतक जो तुमने हमें बताया आखिर वह सब होता कैसे था? वह सब, वैसे ही आज क्यों नही होता है? क्या वह सब, वैसे करने वाला तुम्हारा वो भगवान मर गया? अगर हाँ तो हमसे किसे पुजवा रहे हो और क्यों?

(चेतना विकास मिशन).

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