शशिकांत गुप्ते
आज सीतारामजी से बाजार में भेंट हो गई। आपस में नमस्कार की औपचारिकता के बाद सीतारामजी ने पूछा क्या खरीदने निकले हो?
मैने कहा खरीदने नहीं सिर्फ भाव पूछने बाजार में आया हूँ।
मैने तो सहज ही अपने शाब्दिक भाव प्रकट किए, सुनकर सीतारामजी तो ताव खा गए।
महंगाई पर अपना क्रोध प्रकट करने लगे।
मैने उनका क्रोध को रोकने के लिए विषयांतर करते हुए पूछा आज अपने पौते के साथ बाजार आएं हों।
सीतारामजी कहने लगे इसे खिलौने चाहिए। खिलौने भी रिमोट से चलने वाले चाहिए।
इतना कहकर सीतारामजी खिलौने की दुकान की ओर बढ़ गए।
मै खाद्य तेल,दाल चावल और नींबू का भाव पूछकर स्वयं को भाग्यशाली समझकर गर्व का अनुभव कर था।
गर्व का कारण भी महत्वपूर्ण है,मै देश का औसत व्यक्ति होने के बाद भी इतना सक्षम तो हूँ कि,
मै कोई चीज भले ही खरीदने की हैसियत नहीं रखता हूँ,लेकिन बाजार में भाव पूछने की औक़ात तो है मेरी।
बाजार से घर आकर मै रिमोट से चलने वाले खिलौने के बारें सोचने लगे गया।
पहले तो रिमोट का अर्थ समझना जरूरी है।
दूरवर्ती,समय की दृष्टि से बहुत दूर,जो बेमिलनसार न हो,टी. वी. , डीवीडी,एसी आदि यंत्रों को दूर से ही चालू बंद या नियंत्रित करने वाला छोटा यंत्र, बेतार का यंत्र।
इसे परोक्ष रूप से नियंत्रण करने वाला यंत्र भी कह सकतें हैं।
बहुत से व्यापारी तो सिर्फ रिमोट ही बेंचते हैं। इन व्यापारियों के पास प्रत्येक उत्पादकों द्वारा निर्मित हर तरह के यंत्रो को नियंत्रित करने के लिए रिमोट उपलब्ध होतें हैं।
प्रायः रिमोट बैटरी से चलतें हैं।
खास बात यह है कि, रिमोट भलेही बैटरी से चलता हों लेकिन इसे चलता तो इंसान ही है।
सियासत में रिमोट शब्द का उपयोग व्यंग्यात्मक किया जाता है? सियासती रिमोट इतना सशक्त होता है कि, मज़ाल है इसके द्वारा लिए गए किसी भी निर्णय के विरुद्ध कोई कुछ बोलने की हीम्मत करें?
यह मानवी रिमोट, उंगली पर नचाना, वाली कहावत को चरितार्थ करता है।
यह सोचते हुए एक कल्पना अंतर्मन में उपस्थित हुई।
काश आमजन के हाथों भी व्यवस्था को नियंत्रित करने का रिमोट होता? महंगाई को नियंत्रित करने का कोई रिमोट कभी ईजाद होगा? बेरोजगरों को रोजगार उपलब्ध करवाने वाले कोई रिमोट होगा?
सबसे महत्वपूर्ण रिमोट तो वह होगा जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग होने से रोकेगा?
आज तो रिमोट बहुत से लोगों के लिए सैयां बन गया है। निम्न कहावत प्रत्यक्ष में चरितार्थ होते दिख रही है।
सैयां भये कोतवाल, अब डर काहे का”
ऐसा भी कोई रिमोट बनना चाहिए जो वाणी को दूषित न होने दे?
इनदिनों बुलडोज़र अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है।
बुलडोजर भलेही किसी ईंधन से चलता हो लेकिन इसे चलाने का निर्देश तो अदृश्य रिमोट से होता है। यह अदृश्य रिमोट भी कमाल का है। इसमें लगी बैटरी भलेही 40℅ से कम क्षमता रखती हो लेकिन चलती बहुत तेज है।
यह बैटरी वास्तव में जीतनी भी क्षमता से चलती हो या नहीं भी चलती हो,मात्र विज्ञापनों में इसका कोई जवाब ही नहीं हैं।
अंत में यही कह सकतें हैं। सभी वस्तुओं की अपनी क्षमता होती है।
यह शाश्वत सत्य है दुनिया में आना जाना लगा रहता है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





