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शोषण दमन के विरुद्ध बेख़ौफ़ लिखने वाले क्रांतिकारी जन कवि अवतार सिंह संधू ‘पाश’

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सत्य वीर सिंह

अवतार सिंह संधू ‘पाश’ ने खालिस्तानियों को गेहूं के खेतों में उगी खरपतवार कहा था. 1980 के दशक में भिंडररांवाले के नेतृत्व में खालिस्तानी फंडूओं का भयानक आतंक था और उनके बारे में पंजाब में ऐसा बोलने की हिम्मत कोई नहीं कर पाता था. खालिस्तानी, पाश की जान के दुश्मन हो गए थे. परिवार के कुछ लोगों की मदद से पाश अमेरिका चले गए लेकिन उनका टूरिस्ट वीज़ा था जो समाप्त हो चुका था इसलिए उन्हें अमेरिकी पुलिस ने लॉस एंजेलस हवाई अड्डे पर गिरफ्तार कर भारत भेज दिया. वे अपना वीजा नवीनीकरण के लिए जिस दिन दिल्ली जाने वाले थे उसके ठीक एक दिन पहले मतलब आज ही के दिन 23 मार्च 1988 को जब वे अपने दोस्त हंसराज के साथ जलंधर नकोदर रोड पर स्थित अपने गाँव तलवंडी सलेम में एक ट्यूब वेल पर नहा रहे थे तब ही पास के पक रही गेहूं के खेतों में छुपे खालिस्तानी आतंकियों ने उन्हें गोलियों से भून दिया. जन कवि अवतार सिंह संधू ‘पाश’ और उनके दोस्त हंसराज भी शहीद-ए-आज़म की शहादत दिवस के दिन आज ही शहीद हुए थे.

हर ब्रांड के कठमुल्ले कैसे एक होते हैं, इसका नमूना देखिए. ‘पाश’ का क़त्ल खालिस्तानियों ने किया लेकिन उनकी कविता ‘सबसे खतरनाक’ को एन सी ई आर टी की कक्षा 11 के पाठ्यक्रम से निकालने की सिफारिशें संघी ‘शिक्षाविद’ दीनानाथ बत्रा ने की. उस कालजयी कविता को पाब्लो नरूदा की कविता ‘You Start Dying Slowly’ की चोरी बताकर उन पर लेख चोरी (Plagiarism) का आरोप लगाकर बदनाम करने की कोशिश की.

प्रस्तुत है शोषण-दमन-अन्याय के विरुद्ध बेख़ौफ़ लिखने के लिए आज ही के दिन शहीद हुए जन कवि अवतार सिंह संधू ‘पाश’ की वही कालजई रचना.

सबसे ख़तरनाक

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती

बैठे-बिठाए पकड़े जाना – बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना – बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

कपट के शोर में
सही होते हुए भी दब जाना – बुरा तो है
किसी जुगनू की लौ में पढ़ना – बुरा तो है
मुट्ठियां भींचकर बस वक्‍़त निकाल लेना – बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
न होना तड़प ना सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना

सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नज़र में रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वह आंख होती है
जो सबकुछ देखती हुई भी जमी बर्फ़ होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मुहब्‍बत से चूमना भूल जाती है
जो चीज़ों से उठती अंधेपन की भाप पर ढुलक जाती है
जो रोज़मर्रा के क्रम को पीती हुई
एक लक्ष्यहीन दुहराव के उलटफेर में खो जाती है

सबसे ख़तरनाक वह चांद होता है
जो हर हत्‍याकांड के बाद
वीरान हुए आंगनों में चढ़ता है
पर आपकी आंखों को मिर्चों की तरह नहीं गड़ता है

सबसे ख़तरनाक वह गीत होता है
आपके कानों तक पहुंचने के लिए
जो मरसिए पढ़ता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर
जो गुंडों की तरह अकड़ता है

सबसे ख़तरनाक वह रात होती है
जो ज़िंदा रूह के आसमानों पर ढलती है
जिसमें सिर्फ़ उल्लू बोलते और हुआं हुआं करते गीदड़
हमेशा के अंधेरे बंद दरवाज़ों-चौगाठों पर चिपक जाते हैं

सबसे ख़तरनाक वह दिशा होती है
जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए
और उसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती।

पाश

शोषण दमन अन्याय अत्याचार के विरुद्ध बेख़ौफ़ लिखने वाले क्रांतिकारी जन कवि अवतार सिंह संधू ‘पाश’ को लाल सलाम

सत्य वीर सिंह

Ramswaroop Mantri

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